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लेखक : नैनीताल समाचार :: अंक: 05 || 15 अक्टूबर से 31 अक्टूबर 2011:: वर्ष :: 35 :October 30, 2011 पर प्रकाशित
ए. अग्रवाल वर्षा तो पहले के वर्षों, अर्थात् 1960 के दशक में भी ऐसी ही होती थी। कई-कई दिनों तक वर्षा की झड़ी लगी रहती थी। लेकिन तब इतना नुकसान नहीं होता था। तब इतने साधन सड़क साफ करने के नहीं होते थे। मैनपॉवर से ही काम किया जाता था, तब भी सड़क जल्दी खोल [...]
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लेखक : विशेष प्रतिनिधि :: अंक: 05 || 15 अक्टूबर से 31 अक्टूबर 2011:: वर्ष :: 35 :October 30, 2011 पर प्रकाशित
सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिये मानवीय संवेदनाओं का कोई मतलब नहीं होता है। यदि आपका कोई जुगाड़ न हो तो सरकारी योजना का वास्तविक लाभ मिलने का कोई मतलब नहीं उठता है! ठीक ऐसा ही हो रहा है पौड़ी जिले के कलजीखाल विकास खण्ड की मनियारस्यूँ पट्टी के अनेकों गावों में जहाँ अनेक [...]
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लेखक : नैनीताल समाचार :: अंक: 01-02 || 15 अगस्त से 14 सितम्बर 2011:: वर्ष :: 35 :September 18, 2011 पर प्रकाशित
प्रवीण भट्ट सप्ताह भर पहले तक देहरादून से 20 किमी दूर सहस्त्रधारा के निकट कारलीगाड़ गांव हरे भरे लहलहाते खेतों के बीच बसा दो सौ की आबादी वाला एक सम्पन्न गांव था। गांव के किनारे बहने वाली बुलड़ी नदी ने अब उसे बड़े-बड़े पत्थरों और मलबे के ढेर में बदल दिया है। 22 अगस्त को [...]
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लेखक : प्रेम पंचोली :: अंक: 01-02 || 15 अगस्त से 14 सितम्बर 2011:: वर्ष :: 35 :September 17, 2011 पर प्रकाशित
यमुनोत्री से लेकर जमुना पुल तक लगभग 90 किमी. और गंगोत्री से लेकर धरासू तक लगभग 120 किमी. का रास्ता इन दिनों अत्यन्त संवेदनशील है। अब तक दोनों तीर्थो के मार्ग नहीं खुल पाये हैं। बाहर से आये तीर्थ यात्री तो परेशान हैं ही, स्थानीय लोगों की भी मुसीबतें कम नहीं है। उत्तरकाशी जनपद के [...]
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लेखक : महेश जोशी :: अंक: 01-02 || 15 अगस्त से 14 सितम्बर 2011:: वर्ष :: 35 :September 17, 2011 पर प्रकाशित
आँकडे़ बतलाते हैं कि पूरे विश्व के स्तर पर 6 प्रतिशत की दर से आपदाएँ बढ़ रही हैं और इसमें मरने वाले 80 प्रतिशत गरीब तथा 20 प्रतिशत अमीर लोग होते हैं। मगर तथाकथित विकास योजनाओं से हम कितनी आपदाओं को जन्म दे रहे हैं, इस पर हमारा ध्यान भी नहीं जाता। गाड़-गधेरों में लापरवाही [...]
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लेखक : बृजेन्द्र लुण्ठी :: अंक: 01-02 || 15 अगस्त से 14 सितम्बर 2011:: वर्ष :: 35 :September 17, 2011 पर प्रकाशित
पूरे भारतवर्ष में उत्तराखण्ड तीसरा राज्य है, जहाँ आपदा की घटनाओं से निपटने के लिए अलग विभाग गठित किया गया है। ऑस्ट्रेलियन मॉडल पर गठित किया गया यह विभाग आपदाओं के प्रति जनजागरूकता के नाम पर करोड़ों रुपये की बर्बादी कर रहा है। इस सीमान्त में आपदाओं का लम्बा इतिहास है। 1977 में तवाघाट में [...]
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लेखक : सतीश जोशी 'सत्तू' :: अंक: 01-02 || 15 अगस्त से 14 सितम्बर 2011:: वर्ष :: 35 :September 17, 2011 पर प्रकाशित
इस साल अतिवृष्टि से जन हानि की सूचनाएँ कम हैं, लेकिन करोड़ों रुपए की सरकारी एवं निजी परिसंपत्तियों को नुकसान पहुँचा है। अकेले चंपावत जिले में ही सौ करोड़ रुपए से अधिक की क्षति का आंकलन अब तक किया जा चुका है। जिला मुख्यालय एवं विभिन्न तहसील मुख्यालयों में बनाए गए आपदा नियंत्रण कक्षों में [...]
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लेखक : नैनीताल समाचार :: अंक: 01-02 || 15 अगस्त से 14 सितम्बर 2011:: वर्ष :: 35 :September 17, 2011 पर प्रकाशित
ईश्वर जोशी विगत वर्ष की अतिवृष्टि से हुए नुकसान की भरपाई की दिशा में सरकार द्वारा किये गये प्रयास निराशाजनक रहे हैं। भविष्य में होने वाली किसी आपदा से होने वाले नुकसान को कम किया जा सके, इसके लिए भी सरकार गम्भीर नहीं दिखायी देती। तमाम सरकारी दावों की पोल अतिवृष्टि के मात्र दो माह [...]
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लेखक : महेश जोशी :: अंक: 01-02 || 15 अगस्त से 14 सितम्बर 2011:: वर्ष :: 35 :September 17, 2011 पर प्रकाशित
भूकंप, सुनामी, ज्वालामुखी फटने, भूस्खलन, जमीन के धँसने, हिमस्खलन के अतिरिक्त मौसम परिवर्तन और तापमान बढ़ने से अंधड़, बाढ़, सूखा, दुर्भिक्ष आदि के रूप में आपदाएँ आती हैं। कुमाऊँ विश्वविद्यालय में भू विज्ञान विभाग के अध्यक्ष प्रो. चारु चन्द्र पन्त बताते हैं कि हिमालय की चार हजार किमी. श्रृंखला अत्यधिक संवेदनशील है। पृथ्वी की नवीनतम [...]
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लेखक : दिनेश पंत :: अंक: 01-02 || 15 अगस्त से 14 सितम्बर 2011:: वर्ष :: 35 :September 17, 2011 पर प्रकाशित
राज्य में गठित आपदा प्रबंधन एवं न्यूनीकरण इकाई ने इन दस सालों में जो एकमात्र काम किया, वह था दो सौ गाँवों को भूस्खलन की दृष्टि से संवेदनशील घोषित करना। मगर यह तंत्र आपदा के मुहाने में बसे गाँवों के लिए कोई कारगर योजना नहीं बना पाया और जमीन का प्रबंध न हो पाने से [...]
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