अंक: 13 || 15 फरवरी से 28 फरवरी 2013 – 1
उलटबासियाँ पानी बिच मीन पियासी खेतों बिच भूख-उदासी ये उलटबासियाँ नहीं कबीरा खालिस चाल सियासी पानी बिच मीन पियासी लोहे का सर पाँव काठ के बीस बरस में हुए साठ के मेरे ग्राम निवासी कबिरा झोपड़ पट्टी वासी पानी बिच मीन पियासी सोया बच्चा गाये लोरी पहरेदार करे है चोरी जुर्म करे है न्याय-निवारण न्याय [...]
अंक: 11 || 15 जनवरी से 31 जनवरी 2013 – 1
सम्पादकीय : कैसी व्यवस्था चाहते हैं हम! यह सकारात्मक बात है कि दिल्ली गैंग रेप को लेकर पनपा राष्ट्रीय आक्रोश थोड़ा कमजोर भले ही पड़ा हो, तीन सप्ताह बाद भी खत्म नहीं हुआ है। इससे महिला हिंसा का मामला पहली बार व्यापक चर्चा के केन्द्र में आया है। बलात्कार की सुनवाई के लिये फास्ट ट्रैक [...]
अंक: 07 || 15 नवंबर से 30 नवंबर 2012 – 1
[समयाभाव के कारण यह पूरा अंक दो भागों में अपलोड किया गया है, असुविधा के लिये खेद है। कृपया पूरा पढें। ] गैरसैण में विधान भवन की घोषणा की सरकार ने : पुरुषोत्तम असनोड़ा विजय बहुगुणा सरकार द्वारा गैरसैंण में की गई बहु प्रतीक्षित कैबिनेट बैठक में गैरसैंण में विधान सभा निर्माण का निर्णय लेकर [...]
सम्पादकीय : राजनीति का एक कुरूप चेहरा
रामसिंह कैड़ा क्षेत्रीय राजनीति का एक कुरूप चेहरा है। केन्द्रीय राजनीति में या कुछ बड़े प्रदेशों की राजनीति में कॉरपोरेट पैसे का बोलबाला है तो उत्तर प्रदेश या बिहार जैसे प्रदेशों में बाहुबलियों का। मगर उत्तराखंड जैसे छोटे प्रदेशों, जहाँ कॉरपोरेशन उतने भीतर तक घुसपैठ नहीं कर सके हैं और अपराध भी अपेक्षाकृत कम हैं, [...]
सम्पादकीय : जुदा राहें गड़बड़ाता सच….
महज डेढ़ साल के भीतर अण्णा हजारे और अरविन्द केजरीवाल के रास्ते जुदा हो जाना भारतीय जनान्दोलनों के इतिहास की एक और दुःखद घटना है। अप्रेल 2011 में जब अण्णा साहब एक धूमकेतु की तरह भारतीय आकाश में प्रकट हुए थे और मीडिया की कृपा से देश के पढ़े-लिखे मध्यवर्ग ने उन्हें गांधी के नये [...]
सम्पादकीय : बरसात उत्तराखंड में उम्मीद से ज्यादा आतंक!
बरसात उत्तराखंड में उम्मीद से ज्यादा आतंक का पैगाम लेकर आती है। इसी बरसात में उत्तरकाशी के बाद अभी-अभी कपकोट और उखीमठ से भूस्खलन और जबर्दस्त जनहानि के समाचार मिले हैं। अभी घटना ताजी है और इसीलिये उसका दुःख और निराशा सर्वत्र महसूस किये जा सकते हैं। लेकिन कुछ ही महीनों में यह दुर्घटनायें भुला [...]
संपादकीय : विष-वमन में "मैं पीछे क्यों रहूँ" मानसिकता
भाजपा के टिकट पर जीते काशीपुर के अकाली विधायक हरभजन सिंह चीमा के इस बयान कि सरकार तराईवासियों की उपेक्षा कर रही है और पहाड़वासी तराई पर बोझ बन गये हैं, एक बबाल पैदा हो गया है। चीमा और तिलक राज बेहड़ जैसे लोग पहाड़ विरोधी उस जहरीले सोच के प्रतिनिधि हैं, जिसने मायावती से [...]
सम्पादकीय : यह राजनीति आमूल बदली जाये….
हमारे लोकतंत्र का विद्रूप दो ताजा घटनाओं से बहुत साफ दिखाई देता है। जिस दिन सरकार ने पेट्रोल की कीमत एकमुश्त साढ़े सात रुपये बढ़ा दी और सारा देश गुस्से से उबल पड़ा, उसी रोज पेट्रोल की कीमत बढ़ने से शेयर बाजार खुशी से इतना बौरा गया कि सेंसेक्स ने एक ही झटके में 274 [...]
सम्पादकीय : आज के तेज और बेचैन जीवन में खुल कर हँसने की उम्मीद
हमारी संसद के 60 साल पूरे हो रहे हैं और इन साठ सालों में हमारी संसद का स्तर कितना नीचे गिरा है, इसका प्रमाण देने की बहुत जरूरत नहीं है। जब भी संसद के बारे में कोई सवाल किया जाता है तो अपना आचरण और संसद की गरिमा को सुधारने की कोशिश करने के बदले [...]
सम्पादकीय : कच्छा-बंडी बनाने वाले हमें कंगाल बना कर चलते बनें और हम ….
ऐसा लग रहा है कि तमाम रोने-धोने, नाराजी और मान मनौवल के बाद अन्ततः विजय बहुगुणा के नेतृत्व में बनी कांग्रेस की नई सरकार ने काम करना शुरू कर दिया है। लेकिन चीजें एकदम जिस तरह शुरू हुई हैं, उससे आगे के लिये उम्मीद जगने के बदले एक भय लगने लगा है। सबसे पहले एक [...]
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