होली के गीत, कवितायें
शाहना हिया में बसे नंदलाल सजनियाँ प्रान हमारे अब परबस हो गये मुकुट मुरलिया ‘चारु’ पीताम्बर, अलक, तिलक, वनमाल नैनन मग उतरे घट भीतर, बावरी भईं ब्रजबाल सजनियाँ, प्रान हमारे अब परबस हो गये धमार डारो री मोहन पर रंग खेलन आये होरी लला, वृषभान लली संग अबीर गुलाल मलो इनके मुख गरवा में [...]
बसंत पंचमी: सरस्वती, रति और कामदेव पूजन का पर्व
माया पांडे ‘‘सर्वप्रथम भगवान श्री कृष्ण ने उन सरस्वती की पूजा की, जिनके प्रसाद से मूर्ख व्यक्ति भी पंडित बन जाता है। श्री कृष्ण ने वरदान देते हुए सरस्वती से कहा कि प्रत्येक ब्रह्माण्ड में माघ शुक्ल पंचमी (बसंत पंचमी) के दिन विद्यारंभ के शुभ अवसर पर बड़े गौरव के साथ तुम्हारी विशाल पूजा होगी। [...]
खेती-बाड़ी से जुड़ा है हरेला त्यौहार
प्रस्तुति : माया पाण्डे कुमाऊँ में हरियाला वर्ष में तीन बार मनाने का प्रचलन है- चैत, आश्विन एवं सावन के महिने में। चैत के महिने में नवरात्रि में देवी के नाम से हरियाला बोया जाता है। सावन में शिव-पार्वती की पूजा के प्रतीक डिकारे बनाये जाते हैं। शिव-पार्वती को हरित आसन में बैठने के लिये [...]
इस तरह मनाई जाती है नंधौर घाटी में होली
होली गाने व मनाने के तरीकों में जो अंतर कुमाऊँ में अलग-अलग जिलों में व इलाकों में है वही अंतर नंधौर घाटी में भी है। यहाँ पुरुष ही होली गाते हैं। वसंत ऋतु अपने साथ अनेक रंगों को भी लाती है। किसानों को खेती के काम से भी इसी समय अधिकतर राहत रहती है, इसलिये [...]
बगरो बसंत है : घायल वसन्त और होली
(‘बगरो बसंत है’ में इस बार सुधी पाठकों के लिये प्रस्तुत है प्रख्यात व्यंग्यकार हरिशंकर परसाईं की व्यंग्य रचना ‘घायल वसन्त’ तथा उपाध्याय बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’ की कविता ‘होली ) घायल वसन्त कल वसन्तोत्सव था। कवि वसन्त के आगमन की सूचना पा रहा था- ‘प्रिय, फिर आया मादक वसन्त।’ मैंने सोचा, जिसे वसन्त के आने [...]
सौल कठौल: सतरंगी छलड़ी कैका घर
बीसवीं सदी का आखिरी दशक लोकल कमान से लेकर हाई कमान तक हुक्काराम के संघर्ष की कहानी अब हमारे लिये कम रोचक नहीं रही। एक बार अनजाने में हमने उन्हें अनसुना कर दिया तो उन्होंने हमें विरोधी गुट वालों की सूची में शामिल कर हमारी छलड़ी कर दी। तब से हमारी मेजबानी का तरीका ही [...]
यो वसन्त हो कैका घर जाये ?
मेरे गाँव में वसन्त हर्षोल्लास और त्यौहार समारोह लेकर आता था। सरसों का फूलना, पादपों में नये कोंपल आना, फूलों का खिलना, पक्षियों का कूजन कुमाऊँ में ऊँचाई और निचाई के अनुसार आगे-पीछे होता रहता है, किन्तु प्रकृति के सँवरने-सजने में देर सबेर भले ही हो जाये, हमारे गाँव के दो कदीमी ऋतु रैंण गाने [...]
छटा अद्भुत बन आई, शंभू ने आज होली मचाई
होली आ गयी। हर साल आती है। इस बार जरा जल्दी आयी। मैं स्वभाव से घरघुस्सू किसम का हूँ। कोई भी त्यौहार, खास कर होली उत्सवप्रिय आदमी के लिए है। हर त्यौहार में पता नहीं मेरा मन क्यों बुझ सा जाता है। होली में तो सशंकित भी रहता हूँ। भला क्यों, नहीं समझ पाता। भाभी [...]
वह उत्तरायणी अब कहाँ… ?
उत्तरायणी और बागेश्वर ये दोनों ही नाम एक दूसरे के पर्याय रहे हैं। उत्तरायणी, उतरैणी अथवा उतरैण सूर्य के उत्तरी अयन में प्रवेश का दिन है। इस भौगोलिक घटना का बागेश्वर के लिए विशिष्ट ऐतिहासिक, धार्मिक व ब्यापारिक महत्व रहा है। बागेश्वर में उत्तरायणी पर मेला आयोजन की शुरुआत कब हुई इसका कोई ठीक प्रमाण [...]

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