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लेखक : गजेन्द्र पाठक :: अंक: 17 || 15 अप्रेल से 30 अप्रेल 2011:: वर्ष :: 34 :May 29, 2011 पर प्रकाशित
स्याहीदेवी, शीतलाखेत में तेंदुओं के हमले से पिछले डेढ़ वर्ष में एक युवक तथा चार मासूम बच्चों की जानें गई हैं। शासन-प्रशासन तथा वन विभाग मृतकों के परिजनों को मुआवजा देकर तथा तेंदुओं को गोली मारने या पिंजरे में बंद कर देने तक ही सीमित रह गये हैं। तेंदुओं के नरभक्षी होने के कारणों की [...]
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लेखक : कैलाश कोरंगा :: अंक: 10 || 01 जनवरी से 14 जनवरी 2011:: वर्ष :: 34 :January 25, 2011 पर प्रकाशित
अस्कोट और निकटवर्ती धारचुला-मुनस्यारी विकास हेतु छटपटा रहे हैं। प्राकृतिक आपदा से यहाँ का जनजीवन त्रस्त है। पुनर्वास की नीति स्पष्ट न होने से सरकार की इस गंभीर समस्या में कोई दिलचस्पी नहीं है। उन्हें मालूम है कि दैवीय आपदा पर्वतीय भूभाग में आती रहती है। उनके मकबरे को कोई खतरा नहीं है। बस कुदाल [...]
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लेखक : राधा बहन :: अंक: 21 || 15 जून से 30 जून 2010:: वर्ष :: 33 :June 30, 2010 पर प्रकाशित
गर्मियों में मन को अत्यन्त व्यथित करने वाला एक दृश्य उत्तराखण्ड हिमालय में चारों ओर दिखाई देता है। वह है, वनों को निर्दयतापूर्वक नष्ट करती हुई वनाग्नि की धधकती लाल लपलपाती लपटें और उनसे उठते धुएँ के गुबार। यहाँ की खूबसूरत वादियाँ मानो कार्बन डाइ ऑक्साइड के गैस चैम्बर्स बन जाती हैं। पर मानव का [...]
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लेखक : नैनीताल समाचार :: अंक: 21 || 15 जून से 30 जून 2010:: वर्ष :: 33 :June 29, 2010 पर प्रकाशित
प्रस्तुति : हरीश फुलारा बढ़ते प्रदूषण एवं उससे मानव जीवन पर पड़ रहे कुप्रभाव को कम करने हेतु भारत सरकार द्वारा वर्ष 1980 में वन अधिनियम लागू किया गया। इसके अन्तर्गत वन भूमि पर गैर वानिकी कार्य बिना भारत सरकार की पूर्वानुमति के नहीं किये जा सकते। नीति निर्धारकों द्वारा इसका दुरुपयोग किये जाने के [...]
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लेखक : नैनीताल समाचार :: अंक: 19 || 15 मई से 31 मई 2010:: वर्ष :: 33 :May 28, 2010 पर प्रकाशित
15 से 30 अप्रेल के अंक के संपादकीय के द्वितीय पैराग्राफ की पहली तीन पंक्तियों ‘‘जंगलों की आग से होने वाले नुकसान की समीक्षा करना यहाँ मतलब नहीं है। यह एक कुदरती चीज़ है। अतः हो सकता है कि इससे प्रकारान्तर में जंगलों के पुनर्सृजन में कुछ मदद भी मिलती हो।’’ को कई बार पढ़ने [...]
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लेखक : नैनीताल समाचार :: अंक: 19 || 15 मई से 31 मई 2010:: वर्ष :: 33 :May 28, 2010 पर प्रकाशित
हेमन्त तिवारी बागेश्वर जिले में हिमालयी बुग्यालों के साथ ही जंगलों में फैली आग के सामने वन विभाग हर वर्ष बौना साबित होता है। प्रतिवर्ष सैकड़ों हेक्टेयर जंगल जलकर स्वाहा हो जाते हैं। वन जलते रहते हैं और वन महकमा गोष्ठियाँ करने में मशगूल हो जाता है। एक अनुमान के मुताबिक अभी तक जिले में [...]
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लेखक : राजीव लोचन साह :: अंक: 17 || 15 अप्रेल से 30 अप्रेल 2010:: वर्ष :: 33 :April 27, 2010 पर प्रकाशित
अभी गर्मी अपने पूरे शबाब पर भी नहीं आयी है, मगर जंगलों के जलने की घटनायें शुरू हो गई हैं। यह स्वाभाविक ही है, क्योंकि इस साल जाड़ों में वर्षा बिल्कुल नहीं हो पाई। यह लगातार दूसरा साल है, जब शीतकालीन वर्षा ने धोखा दिया है। इससे नदियों में पानी कम हुआ है और धारे-नौले [...]
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लेखक : अरविंद मुद्गल :: अंक: 17 || 15 अप्रेल से 30 अप्रेल 2010:: वर्ष :: 33 :April 27, 2010 पर प्रकाशित
गर्मी की शुरूआत में ही कंडोलिया में लगी भीषण आग ने इतना विकराल रूप धारण कर लिया कि प्रशासन उसके सामने बौना हो गया। शहर में उपलब्ध एक मात्र फायर टेंडर अपना सब कुछ झोंक के खाली हो गया, लेकिन वनाग्नि का तांडव चलता रहा। जिलाधिकारी और स्थानीय विधायक मोबाइल पर श्रीनगर व और अन्य [...]
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लेखक : महेश जोशी :: अंक: 17 || 15 अप्रेल से 30 अप्रेल 2010:: वर्ष :: 33 :April 26, 2010 पर प्रकाशित
अल्मोड़ा जिला मुख्यालय से 15 किमी के फासले में स्थित विनसर वन्यजीव विहार के जंगल में पिछले दस-पन्द्रह दिनों के अन्तराल में दो बार आग लग चुकी है और करीब डेढ़ सौ हैक्टेयर जंगल खाक हो चुका है। मई 1988 में बिनसर के 45.59 वर्ग किमी. वन क्षेत्र को ‘वन्य जीव विहार’ घोषित कर देने [...]
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