वन अधिनियम की जटिलताओं को समझे बगैर संभव नहीं विकास कर पाना
प्रस्तुति : हरीश फुलारा राज्य बनने से पूर्व भारत सरकार द्वारा इस पर्वतीय क्षेत्र के विकास हेतु पहले पृथक पर्वतीय विकास परिषद तथा बाद में पर्वतीय विकास मंत्रालय द्वारा शत-प्रतिशत धनराशि की व्यवस्था की जाती थी। मगर वह पैसा उ. प्र. के मैदानी जिलों में व्यय कर दिया जाता था और पर्वतीय क्षेत्र उपेक्षित रह [...]
आदिवासी वन कानून को लेकर सरकार खामोश क्यों है ?
‘अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006’ एक जनवरी 2008 से पूरे देश में लागू हो गया है। लेकिन अत्यन्त आश्चर्य का विषय है कि 90 प्रतिशत से भी अधिक वन भूमि वाले उत्तराखंड में इस कानून को लेकर कोई चर्चा ही नहीं है, जबकि इस कानून के लागू [...]
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