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लेखक : इंद्रेश मैखुरी :: अंक: 21 || 15 जून से 30 जून 2011:: वर्ष :: 34 :July 19, 2011 पर प्रकाशित
उत्तराखंड के तराई-भाबर के वनग्रामों तथा खत्तों में रहने वाले वन गूजरों और पर्वतीय मूल के लोगों को देश की आजादी के 65 वर्ष बाद भी बुनियादी नागरिक अधिकार तक हासिल नहीं हैं। पंचायतीराज व्यवस्था इनके लिये दूर की कौड़ी है और मनरेगा जैसी योजनायें भी लगता है कि इनके लिये नहीं बनी है। वनाधिकार [...]
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लेखक : नैनीताल समाचार :: अंक: 20 || 01 जून से 14 जून 2011:: वर्ष :: 34 :July 18, 2011 पर प्रकाशित
विगत दिनों देहरादून में ‘वनाधिकार कानून: स्थिति और सम्भावनाएं’ विषय पर दो दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन ‘उत्तराखण्ड वन पंचायत संघर्ष मोर्चा’ द्वारा किया गया। संगोष्ठी का संचालन करते हुए मोर्चा के संयोजक तरुण जोशी ने बताया कि उत्तराखंड में ‘वनाधिकार कानून’ पाँच साल बाद भी पूरी तरह लागू नहीं हुआ है। जबकि देश के कई [...]
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लेखक : नैनीताल समाचार :: अंक: 13 || 15 फरवरी से 28 फरवरी 2011:: वर्ष :: 34 :March 1, 2011 पर प्रकाशित
गिरिजा पाठक 2 फरवरी, 2011 को अखिल भारतीय किसान सभा के नेतृत्व में वनवासियों-खत्तावासियों ने एकता रैली के माध्यम से बिन्दुखत्ता को राजस्वग्राम का दर्जा देने, बिखरे हुए छोटे-छोटे खत्तों का एकीकरण कर उन्हें वनाधिकार कानून 2006 के तहत लिये जाने, वन गूजरों एवं खत्तावासियों का उत्पीड़न बन्द करने और उनसे अवैध वसूली पर रोक [...]
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लेखक : नैनीताल समाचार :: अंक: 21 || 15 जून से 30 जून 2010:: वर्ष :: 33 :June 29, 2010 पर प्रकाशित
प्रस्तुति : हरीश फुलारा बढ़ते प्रदूषण एवं उससे मानव जीवन पर पड़ रहे कुप्रभाव को कम करने हेतु भारत सरकार द्वारा वर्ष 1980 में वन अधिनियम लागू किया गया। इसके अन्तर्गत वन भूमि पर गैर वानिकी कार्य बिना भारत सरकार की पूर्वानुमति के नहीं किये जा सकते। नीति निर्धारकों द्वारा इसका दुरुपयोग किये जाने के [...]
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लेखक : रोहित जोशी :: अंक: 19 || 15 मई से 31 मई 2010:: वर्ष :: 33 :May 27, 2010 पर प्रकाशित
उत्तराखण्ड का तकरीबन 45 फीसदी भाग वनों से ढँका पड़ा है। अगर उच्च हिमालय की वनस्पतिरहित, सदा हिमाच्छादित चोटियों को छोड़ दिया जाये, तो वन यहाँ के 66 फीसदी क्षेत्रफल को घेरे हैं। भारत में कुल क्षेत्रफल का 33 फीसदी वन क्षेत्र होना पर्याप्त माना गया है। इस दृष्टि से हम एक समृद्ध राज्य हैं। [...]
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लेखक : पुरुषोत्तम शर्मा :: अंक: 16 || 01 अप्रेल से 14 अप्रेल 2010:: वर्ष :: 33 :April 11, 2010 पर प्रकाशित
अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परम्परागत वनवासी (वन अधिकारों की मान्यता) कानून उत्तराखंड में नवम्बर 2008 से लागू किया गया है। मगर इस कानून के दायरे में आने वाले लाभार्थियों के चुनाव ने राज्य सरकार और राज्य की अन्य शासक वर्गीय राजनीतिक पार्टियों की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिये हैं। इन सवालों पर रोशनी [...]
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