सम्पादकीय : क्या ऐसे बचेंगे जंगल!!
अभी गर्मी अपने पूरे शबाब पर भी नहीं आयी है, मगर जंगलों के जलने की घटनायें शुरू हो गई हैं। यह स्वाभाविक ही है, क्योंकि इस साल जाड़ों में वर्षा बिल्कुल नहीं हो पाई। यह लगातार दूसरा साल है, जब शीतकालीन वर्षा ने धोखा दिया है। इससे नदियों में पानी कम हुआ है और धारे-नौले [...]
नाक के नीचे से पेड़ गायब
पौड़ी जनपद के सुदूरवर्ती क्षेत्रों में वृक्षों का अवैध कटान किस स्तर पर होता होगा, इसका अंदाज़ा सहज ही इस बात से लगाया जा सकता है कि जिले के मुख्यालय में ही वन विभाग की नाक के नीचे सैकड़ों पेड़ों पर आरी चला दी गयी और वन विभाग को भनक भी न लगी। या कहें [...]
क्यों बढ़ रहा है मनुष्य व जंगली जानवरों के बीच संघर्ष ?
स्याहीदेवी-शीतलाखेत के जंगलों के बचे-खुचे गुलदार, तेंदुओं ने अब निकटवर्ती ग्रामसभाओं के कुत्तों, गायों, बैलों, बकरियों को मारने के बाद अब मनुष्यों पर भी हमला शुरू कर दिया है। एक दुःखद घटना में पिछले छः महीनों में आदमखोर तेंदुए द्वारा दो मनुष्यों को अपना निवाला बना लिया गया है। जंगली जानवर द्वारा पहली बार मनुष्य [...]
वन अधिनियम की जटिलताओं को समझे बगैर संभव नहीं विकास कर पाना
प्रस्तुति : हरीश फुलारा राज्य बनने से पूर्व भारत सरकार द्वारा इस पर्वतीय क्षेत्र के विकास हेतु पहले पृथक पर्वतीय विकास परिषद तथा बाद में पर्वतीय विकास मंत्रालय द्वारा शत-प्रतिशत धनराशि की व्यवस्था की जाती थी। मगर वह पैसा उ. प्र. के मैदानी जिलों में व्यय कर दिया जाता था और पर्वतीय क्षेत्र उपेक्षित रह [...]
वन ग्रामवासी अब संगठित हो रहे हैं
भारत के 16 प्रदेशों के वनवासी, आदिवासी, मजदूर स्त्रियों तथा पुरुषों, जिन्होंने राष्ट्रीय वन-जन श्रमजीवी मंच बनाया है, ने देहरादून में जून 10 से 12 तक एक सम्मेलन कर अपना संघर्षनामा जारी किया है, जिसमें वनाश्रित समुदायों का स्वशासन स्थापित करना और उनके बाजारीकरण का विरोध करना मुख्य बातें हैं। उत्तराखंड राज्य में वनाश्रित गुज्जरों [...]
आदिवासी वन कानून को लेकर सरकार खामोश क्यों है ?
‘अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006’ एक जनवरी 2008 से पूरे देश में लागू हो गया है। लेकिन अत्यन्त आश्चर्य का विषय है कि 90 प्रतिशत से भी अधिक वन भूमि वाले उत्तराखंड में इस कानून को लेकर कोई चर्चा ही नहीं है, जबकि इस कानून के लागू [...]
जंगली सुअर लौट आये हैं
प्रस्तुति : सुनील रौतेला ताकुला विकासखंड के डोटियाल गाँव, बसौली, भैंसोड़ी व आसपास के कई गाँवों में जंगली सुअरों का आक्रमण एक बार फिर तेज हो गया है। हरे-भरे खेत गड्ढो में तब्दील हो गये हैं। आदमी से ज्यादा जानवरों का ख्याल करने वाली सरकार से ग्रामीण खासे नाराज हैं। किसान चाहे तराई के हों [...]
जंगलों के बगैर विकास की कल्पना भी नहीं की जा सकती
ग्रामीण जनता, गाँव एवं गाँवों के बारे में चारों ओर की जमीन, जंगल व जल तथा जानवर ये सब एक दूसरे के पूरक हैं। इनमें एक तरह की पारिवारिक व्यवस्था है, जहाँ दोहन व शोषण के लिये कोई स्थान नहीं है। पिछली एक सदी में जंगलों ने अपना महत्व विशेष रूप से साबित किया है। [...]
संगठित होना होगा जल, जंगल, जमीन की रक्षा के लिये
प्रस्तुति : रैमाशी रावत जल, जंगल, जमीन की रक्षा के लिये हमें संगठित होना पड़ेगा। यदि हम सत्ता से उम्मीद लगाकर आगे चलना चाहेंगे तो सिर्फ निराशा ही हाथ लगेगी। यह कहना था स्वामी अग्निवेश का। वे उमेश डोभाल स्मृति ट्रस्ट द्वारा आयोजित वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली व्याख्यानमाला में ‘वैश्वीकरण के दौर में ‘जल, जंगल, [...]
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