पहले नौकरशाही की जकड़ से मुक्त करें
ब्रिटिश हुकूमत के दौरान कमजोर कर दी गई पंचायत व्यवस्था के महत्व को आजाद भारत में फिर से स्वीकार किया गया, परन्तु आजादी के चार दशक बाद तक भी इन पर प्रभावशाली वर्गों व जातियों के कब्जे बरकरार रहे। वर्ष 1993 में 73 वें संशोधन के माध्यम से संवैधानिक रूप से महिलाओं व दलित पिछड़े [...]
खो न जायें इतने संघर्ष से प्राप्त अधिकार
प्रस्तुति : गंगा सिंह पांगती पंचायत प्रतिनिधियों को जागरूक, ईमानदार व कर्तव्यनिष्ठ होना आवश्यक है। मैं दो बार कपकोट विकासखंड के सिमगड़ी ग्राम सभा का ग्राम प्रधान रहा। तब बागेश्वर जिला नहीं बना था। तत्कालीन उ.प्र. सरकार ने 10 लाख कुआँ योजना के तहत यहाँ बिना पानी के गूल, डिग्गियाँ आदि बनाकर लाखों का बजट [...]
ग्रामीण कहाँ होता है ग्राम विकास की योजनाओं में
सरकार गाँवों में सब्सिडी वाली वित्तपोषित योजनाऐं ला रही है। यदि गाँव वाले उन योजनाओं पर अपना पैसा लगा कर या बैंक इत्यादि से कर्जा ले एक रकम खर्च करते हैं तो सरकार उन्हें उस पर लगभग 25 प्रतिशत अनुदान दे रही है। हाल में यहाँ एक सार्वभूम नाम की योजना आई, जिसमें बागवानी, ऊन [...]
डाबर की नजर से अभी ओझल है आँवले का यह जंगल
सोरघाटी से गर्ब्यांग-02 रास्ते में फिसलन थी। मैं दो तीन बार गिरा। पहली बार तो लगा कि हाथ टूट गया है। पर उसे इधर-उधर हिला कर देखा तो साबूत था। मैं अपनी ही चाल चलता हूँ। या तो आगे या पीछे। बीच में चलना अच्छा नहीं लगता। यात्रा आदमी का चरित्र सबसे ज्यादा बतलाती है। [...]
पिछली गलती न दोहरायें
प्रस्तुति : गिरीश पंत राज्य गठन के बाद पहली निर्वाचित सरकार ने त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव का गठन कर दर्जनों विभाग पंचायतों के हवाले करने की इच्छा जाहिर की। प्राथमिक शिक्षा, स्वास्थ्य आदि विभागों को पंचायतों के हवाले करने का ढिंढोरा पीटा गया। सरकार के कार्यकाल की समाप्ति तक सरकारी नुमाइंदे और कांग्रेसी छुटभैये नेता हल्ला [...]
आम सहमति से हो सकते हैं सारे काम
प्रस्तुति : बलवंत कोरंगा आम सहमति से कार्य करने में कोई दिक्कत नहीं होती, क्योंकि जिस वार्ड में काम करना हो वह काम उसी वार्ड का सदस्य करता है। कमीशन, 3.5 प्रतिशत प्रपोजल बनाने वाले जे.ई. तथा 7 से 15-16 प्रतिशत तक ऊपर के अधिकारियों को चला जाता है। विभागीय कार्यों में अधिकारियों के चक्कर [...]
सामुदायिक भागीदारी भ्रम है
प्रस्तुति : गजेन्द्र रौतेला [विनोद चन्द्र, प्रमुख क्षेत्र पंचायत विकासखंड मन्दाकिनी (अगस्त्यमुनि), रुद्रप्रयाग का कहना हैः- ] देहरादून से थोपे गये फैसलों से कई बार गैरजरूरी कार्य भी कराने पड़ जाते हैं। मसलन बजट आया होता है स्कूल के लिये,जबकि आपके गाँव के लिये शौचालय या खड़ंजों की ज्यादा जरूरत थी। ‘टॉप टू बॉटम’ व्यवहार [...]
केन्द्रीय सत्ता से कुछ टुकड़े फेंक दिया जाना विकेन्द्रीकरण नहीं
मैं बचपन में ऊँचे-ऊँचे पेड़ों पर चढ़ा करती थी। मेरा अनुभव है कि जब पेड़ पर चढ़े व्यक्ति के पैर फिसलने लगते हैं तो वह टहनियों को अधिक कस कर पकड़ने लगता है। हमारी सरकार की स्थिति भी ऐसी ही है। वास्तव में उनके पाँव इस देश की धरती पर जमे नहीं हैं (यह किसी [...]
परिचर्चा: अवसर मिले तो अत्यन्त कारगर हो सकती हैं पंचायतें
इस अंक के लिये हमने पंचायत प्रतिनिधियों तथा पंचायती राज में रुचि लेने वाले व्यक्तियों को एक प्रश्नावली भेजी थी, जिसमें निम्न प्रश्न थे:- 1. क्या अपने कार्यकाल के दौरान आपने यह महसूस किया कि पंचायतों में विकास कार्य करने की क्षमता है और यदि पंचायतों को अपने निर्णय स्वयं लेने तथा अधिक बड़े स्तर [...]
18 सितम्बर: नैनीताल स्वच्छता दिवस
प्रस्तुति : कार्यालय प्रतिनिधि ऑस्ट्रेलियाई नागरिक रेम्को वान सांटेन ( देखें ‘नैनीताल समाचार’ वर्ष 30, अंक 17 / 15 से 30 अप्रेल 2007) के सुझाव पर नैनीताल के नागरिकों ने इस वर्ष 18 सितम्बर को ‘नैनीताल स्वच्छता दिवस’ मनाने की तैयारियाँ शुरू कर दी हैं। इस अभियान में स्कूलों ने ही नहीं, धार्मिक संस्थाओं ने [...]
आपकी टिप्पणीयाँ