बगरो बसंत है-होली 2008
[बगरो बसंत में इस बार प्रस्तुत है ‘नया ज्ञानोदय’ के विशेषांक ‘बिन पानी सब सून’ में प्रकाशित अष्टभुजा शुक्ल का रम्य निबंध - पानी पर पटकथा तथा महाकवि कालीदास के मेघदूत का काव्यानुवाद का एक अंश जिसका रुपान्तर केशव प्रसाद मिश्र ने किया है। साथ ही स्व. खड़क सिंह खनी की आत्मकथा - ‘सूरज को [...]
अब मीडिया से संचालित हो रहे हैं त्यौहार
पिछले पांच सालों में जिस तेजी से स्थानीय स्तर के समाचारों का चस्का गली-मोहल्लों में लगा है, उसने अब हमारे त्यौहारों को भी समाचार बना डाला है। समाचार होना अच्छी बात है लेकिन पेज रंगीन करने वाली पत्रकारिता के हाथों त्यौहारों का संचालन निश्चित रूप से तमाशा बनकर एक दिन सबको चिढ़ायेगा। जिसकी शुरूआत हो [...]
रंग तो कई हैं पर अपना रंग हल्का
गंगोलीहाट की होली देखने का मौका पहले-पहल मुझे वर्ष 1993 में मिला जब मेरी पहली नियुक्ति इस क्षेत्र में हुई। उस वर्ष उपराड़ा में कवि गुमानी पर एक कार्यक्रम हुआ था जिसमें कुमाऊँ भर से अनेक विद्वान साहित्यकार इतिहासकार व संस्कृतिकर्मी यहाँ एकत्रित हुए थे। एक अच्छी शुरूआत थी परंतु न जाने क्यों आगे नहीं [...]
हाँ रे गोरी सब रस चूनर भीजि रयो
तलाऊ खेतों में गेहूँ और मसूर की अगेती फसल गदरा कर फूल रही है। जौ में पियाली आ गई है। उनके दानों में भरा हुआ दूध पुष्ट हुआ कि नहीं? झंखाड़ की आग में अधजला भूँजकर देखना ‘होरा’ कहलाता है। परन्तु स्वाद तो आग में नहीं जीभ में रख कर देखने की चीज है। दाँतों [...]
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