लेखक : प्रयाग जोशी :: अंक: 15 || 15 मार्च से 31 मार्च 2011:: वर्ष :: 34 :May 7, 2011 पर प्रकाशित
बोनासाही आमों व देसी लीचियों में बौर आ गई हैं। लाई-सरसों, मूली और धनियाँ के फूलों से घरबाड़े और खेत भरे हुए हैं। तोतों और गोंतालों की चहचहाहट से यूक्लिप्टस का पेड़ चारबाग स्टेशन की तरह शोरियाया हुआ है परन्तु कोयल नहीं दिख रही। हेमंत में, काले कौवों और कोयलों के झुण्ड बाबा रामदेव के [...]
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लेखक : नैनीताल समाचार :: अंक: 15 || 15 मार्च से 31 मार्च 2011:: वर्ष :: 34 :May 6, 2011 पर प्रकाशित
शाहना हिया में बसे नंदलाल सजनियाँ प्रान हमारे अब परबस हो गये मुकुट मुरलिया ‘चारु’ पीताम्बर, अलक, तिलक, वनमाल नैनन मग उतरे घट भीतर, बावरी भईं ब्रजबाल सजनियाँ, प्रान हमारे अब परबस हो गये धमार डारो री मोहन पर रंग खेलन आये होरी लला, वृषभान लली संग अबीर गुलाल मलो इनके मुख गरवा में [...]
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लेखक : नैनीताल समाचार :: अंक: 13 || 15 फरवरी से 28 फरवरी 2010:: वर्ष :: 33 :February 24, 2010 पर प्रकाशित
शंभु ने आज होली मचाई। इत दल साज्यो शिव शंकर ने, उत दल गिरिजा लाई। रंग गुलाल चलें दोउ दल में, शोभा ललित बनाई-सखी छवि वरणि न जाई। शंभु ने आज होरी मचाई गिरिजा झपट चली सखियन ते शंकर सन्मुख आई। भर पिचकारी दृगन में मारी मुख से लख मुसकाई।। देख शिव रूप लुभाई शंभु [...]
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लेखक : पंकज पांडे :: अंक: 13-14 || 15 फरवरी से 14 मार्च 2009:: वर्ष :: 32 :February 15, 2009 पर प्रकाशित
बागेश्वर में खड़ी होली का अपना एक अलग ही अंदाज रहा है। बताया जाता है कि यहां बागनाथ मंदिर में पहले शिवरात्रि को रात में खड़ी होली का आयोजन होता था, जिसमें सतराली (सातगांव), ताकुला के होल्यारों का भी आगमन होता था। स्थानीय होल्यारों के साथ रात भर होलियाँ गाई जाती थीं। खड़ी होली गाने [...]
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लेखक : राजीव लोचन साह :: अंक: 13-14 || 15 फरवरी से 14 मार्च 2009:: वर्ष :: 32 :February 15, 2009 पर प्रकाशित
होली खम्माज कैसे हो इरविन इतबार तुम्हार, हमें धोखे मिले हैं बार बार। इनके सहयोग से नहीं बनेगी, बुलाये जो तुमने दरबार दार। अब लल्लो चप्पो से नहिं चलेगी, भारत सभालैगो कारबार। बाराजोरी कर कहीं प्रीत हुई है, चाहे धमकी दो साहब हजार बार। जब जिन गर्व किया है जग में, अन्त में गये सब [...]
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लेखक : महेश पुनेठा :: अंक: 15 || 15 मार्च से 31 मार्च 2008:: वर्ष :: 31 :March 30, 2008 पर प्रकाशित
गंगोलीहाट की होली देखने का मौका पहले-पहल मुझे वर्ष 1993 में मिला जब मेरी पहली नियुक्ति इस क्षेत्र में हुई। उस वर्ष उपराड़ा में कवि गुमानी पर एक कार्यक्रम हुआ था जिसमें कुमाऊँ भर से अनेक विद्वान साहित्यकार इतिहासकार व संस्कृतिकर्मी यहाँ एकत्रित हुए थे। एक अच्छी शुरूआत थी परंतु न जाने क्यों आगे नहीं [...]
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लेखक : प्रभात उप्रेती :: अंक: 15 || 15 मार्च से 31 मार्च 2008:: वर्ष :: 31 :March 30, 2008 पर प्रकाशित
तलाऊ खेतों में गेहूँ और मसूर की अगेती फसल गदरा कर फूल रही है। जौ में पियाली आ गई है। उनके दानों में भरा हुआ दूध पुष्ट हुआ कि नहीं? झंखाड़ की आग में अधजला भूँजकर देखना ‘होरा’ कहलाता है। परन्तु स्वाद तो आग में नहीं जीभ में रख कर देखने की चीज है। दाँतों [...]
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