तब की जैसी होली अब कहाँ…
होली शब्द सुनते ही मन में शरारत और हरारत एक साथ शुरू हो जाती है। रंगों का यह त्यौहार कुछ ऐसा ही है। लेकिन मेरे गाँव की होली तो अजीब थी। हर घर में होली का त्यौहार मिट्टी, गोबर तथा कीचड़ के पानी को एक-दूसरे पर डालकर मनाया जाता था। मुझे लगता है तब गाँव [...]
मेरी स्मृति में ताजा है सतराली की होली
हेम चन्द्र लोहनी मेरा बचपन अल्मोड़ा से 16 मील दूर सतराली में बीता। सतराली की होली प्रसिद्ध थी। बसन्त पंचमी से होली गायन आरम्भ होता था। ढोलक में जौ चढ़ाकर रात्रि में किसी चौपाल में अलाव के आगे होली गाई जाती थी। बच्चे दिन में लकड़ी के बड़े टुकड़े एकत्रित करते। ये गीत वैष्णवपदी होते [...]
बसन्त आ गया है
बसन्त आ गया है। पतझड़ वाले आड़ू-पयाँ के वृक्षों पर नई कोंपल आ गई हैं, लक्-दक् फूल खिल चुके हैं, एक नया जीवन नया राग-रंग नई उमंग संग लेकर बसन्त आ गया है। तिड़ा हुआ मुँह फटे हुये पैर भयभीत करती शीतलहर, दुःखों के बाद सुख का ऐहसास एक नया जीवन नया राग-रंग नई उमंग [...]
शराब के प्रचलन ने पहुँचाया होली परम्परा को आघात
बसन्त के आगमन के साथ ही लोगों के जीवन में एक बहार सी आने लगी है। प्रकृति मनों को रिझाने में लगी है। मन में उमंग व उल्लास के भाव जाग रहे हैं। होठों में मधुर संगीत उतर आया है। होली आने में अभी वक्त है लेकिन होली के बोल अनायास होठों पर आने लगे [...]
फरसौली: बुजुर्गों के साथ ही चली गई होली की रंगत
नन्द किशोर भगत उन्नीस सौ पचास-साठ के दशक में एक समय रहा जब ग्राम फरसौली, भवाली में होलियारों/ र्कीतनकारों की एक टीम होती थी जिसे हम/हमारे हम उम्र उक्त अवधि तक देखते रह, उनके साथ होली खेलते रहे। वह होली अब उन्हीं होलियारों के साथ विदा हो गई है। ग्राम लेख (फरसौली) के पं. जय [...]
राज्य बनने के बाद हुए पलायन से फीका पड़ा होली का रंग
भैरव लखचौरा सल्ट क्षेत्र में प्राचीन समय से ही होली का त्यौहार उल्लास पूर्वक मनाने की परम्परा रही है। यह क्षेत्र हालांकि कुमाऊँ का सीमान्त क्षेत्र है यहाँ से गढ़वाल की सीमा प्रारम्भ होती है। सामाजिक रूप से सल्ट का गढ़वाल से प्रगाढ़ व रोटी-बेटी के रिश्ते रहे हैं परंतु सांस्कृतिक दृष्टि से देखा जाये [...]
आपत काल बिरस भयो फागुन… …उचित होय सो की जै
बोनासाही आमों व देसी लीचियों में बौर आ गई हैं। लाई-सरसों, मूली और धनियाँ के फूलों से घरबाड़े और खेत भरे हुए हैं। तोतों और गोंतालों की चहचहाहट से यूक्लिप्टस का पेड़ चारबाग स्टेशन की तरह शोरियाया हुआ है परन्तु कोयल नहीं दिख रही। हेमंत में, काले कौवों और कोयलों के झुण्ड बाबा रामदेव के [...]
सौल कठौल : हुक्काराम और बजट
इधर पिछली बार की तरह हुक्काराम जी बजट की सम्भावित घोषणाओं की चर्चा में आते ही सक्रिय हो गये हैं। कुछ लाल बत्ती जनित चिन्तायें उनके गले में फाँस की तरह अटक जाती हैं-पूछने पर वह इस अटकन को कुछ यों बया करते हैं…इधर बड़ी सरकार एक दम पराई है। लोकल सरकार तो अपनी ठैरी। [...]
होली के गीत, कवितायें
शाहना हिया में बसे नंदलाल सजनियाँ प्रान हमारे अब परबस हो गये मुकुट मुरलिया ‘चारु’ पीताम्बर, अलक, तिलक, वनमाल नैनन मग उतरे घट भीतर, बावरी भईं ब्रजबाल सजनियाँ, प्रान हमारे अब परबस हो गये धमार डारो री मोहन पर रंग खेलन आये होरी लला, वृषभान लली संग अबीर गुलाल मलो इनके मुख गरवा में [...]
गीत एवं नाटक प्रभाग में देखा उनका समर्पण
महेश चन्द्र जोशी 42 वर्ष पूर्व 1968 में जब मैं गीत और नाटक प्रभाग के नैनीताल केन्द्र में परफॉरमर के पद पर नियुक्त हुआ, तभी गिरीश तिवाड़ी के साथ परिचय हुआ। तब गिर्दा कार्यक्रम में बाजा बजाया करते थे व कमेंट्री किया करते थे। फिर समय के साथ प्रभाग में अनेक कार्यक्रमों का निर्माण हुआ। [...]
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