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लेखक : एल. एम. कोठियाल :: अंक: 15 || 15 मार्च से 31 मार्च 2011:: वर्ष :: 34 :May 8, 2011 पर प्रकाशित
बदलाव का असर पौड़ी पर भी पड़ा है। संचार माध्यमों व आधुनिकता की बयार ने यहाँ की रवायतों, संस्कृति व सम्बन्ध तक को धो कर रख दिया है। अब यहाँ के समाज में वह आत्मीयता नहीं दिखती है और न वह परम्पराओं को आगे बढ़ाने को इच्छुक हैं जो वर्षों से चली आ रही थीं। [...]
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लेखक : नैनीताल समाचार :: अंक: 15 || 15 मार्च से 31 मार्च 2011:: वर्ष :: 34 :May 7, 2011 पर प्रकाशित
बरस दीवाली बरसे फाग, जो नर जीवे खेले आज, हो हो होलक रे बरस दीवाली बरसे फाग, जो नर जीवे खेले आज, हो हो होलक रे नैनीताल समाचार के सुधी पाठक, विज्ञापनदाता, सहयोगी, समय से पाठकों तक नहीं पहुँचाने वाला डाक विभाग व तल्लीताल पोस्ट ऑफिस वाले जी रौं लाख सौ बरीस…हो हो होलक रे [...]
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लेखक : नैनीताल समाचार :: अंक: 15 || 15 मार्च से 31 मार्च 2011:: वर्ष :: 34 :May 7, 2011 पर प्रकाशित
फिर बसन्त फिर होली आई रस बरसा रंग बिखरा चूनर रंगी, फागुन लहराई कुछ बुरांस कुछ टेसु टपके राख हुए गुलमोहर रंगीले कुछ पलाश डाली से टूटे हवा ले उड़ी स्वप्न सजीले बादल घिर आये मन भीतर बहुत दिनों तक उमेड़े-घुमड़े रुक न सके फिर किसी जतन से फिर-फिर छलके, फिर-फिर बरसे धुल सा गया [...]
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लेखक : नैनीताल समाचार :: अंक: 15 || 15 मार्च से 31 मार्च 2011:: वर्ष :: 34 :May 7, 2011 पर प्रकाशित
संसद में खेलें एक घड़ी (मथुरा में खेलें एक घड़ी की तर्ज पर) संसद में खेलें एक घड़ी, संसद में खेलें एक घड़ी काहे के सिर पर मुकुट विराजै, काहे के सिर पर है पगड़ी ।। संसद में… ‘सोनिया‘ के सिर पर मुकुट विराजै, ‘मनमोहन‘ के सिर पर है पगड़ी ।। संसद में… काहे के [...]
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लेखक : घनश्याम जोशी :: अंक: 15 || 15 मार्च से 31 मार्च 2011:: वर्ष :: 34 :May 7, 2011 पर प्रकाशित
होली शब्द सुनते ही मन में शरारत और हरारत एक साथ शुरू हो जाती है। रंगों का यह त्यौहार कुछ ऐसा ही है। लेकिन मेरे गाँव की होली तो अजीब थी। हर घर में होली का त्यौहार मिट्टी, गोबर तथा कीचड़ के पानी को एक-दूसरे पर डालकर मनाया जाता था। मुझे लगता है तब गाँव [...]
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लेखक : नैनीताल समाचार :: अंक: 15 || 15 मार्च से 31 मार्च 2011:: वर्ष :: 34 :May 7, 2011 पर प्रकाशित
हेम चन्द्र लोहनी मेरा बचपन अल्मोड़ा से 16 मील दूर सतराली में बीता। सतराली की होली प्रसिद्ध थी। बसन्त पंचमी से होली गायन आरम्भ होता था। ढोलक में जौ चढ़ाकर रात्रि में किसी चौपाल में अलाव के आगे होली गाई जाती थी। बच्चे दिन में लकड़ी के बड़े टुकड़े एकत्रित करते। ये गीत वैष्णवपदी होते [...]
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लेखक : नैनीताल समाचार :: अंक: 15 || 15 मार्च से 31 मार्च 2011:: वर्ष :: 34 :May 7, 2011 पर प्रकाशित
बसन्त आ गया है। पतझड़ वाले आड़ू-पयाँ के वृक्षों पर नई कोंपल आ गई हैं, लक्-दक् फूल खिल चुके हैं, एक नया जीवन नया राग-रंग नई उमंग संग लेकर बसन्त आ गया है। तिड़ा हुआ मुँह फटे हुये पैर भयभीत करती शीतलहर, दुःखों के बाद सुख का ऐहसास एक नया जीवन नया राग-रंग नई उमंग [...]
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लेखक : दिनेश पंत :: अंक: 15 || 15 मार्च से 31 मार्च 2011:: वर्ष :: 34 :May 7, 2011 पर प्रकाशित
बसन्त के आगमन के साथ ही लोगों के जीवन में एक बहार सी आने लगी है। प्रकृति मनों को रिझाने में लगी है। मन में उमंग व उल्लास के भाव जाग रहे हैं। होठों में मधुर संगीत उतर आया है। होली आने में अभी वक्त है लेकिन होली के बोल अनायास होठों पर आने लगे [...]
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लेखक : नैनीताल समाचार :: अंक: 13 || 15 फरवरी से 28 फरवरी 2010:: वर्ष :: 33 :February 24, 2010 पर प्रकाशित
शंभु ने आज होली मचाई। इत दल साज्यो शिव शंकर ने, उत दल गिरिजा लाई। रंग गुलाल चलें दोउ दल में, शोभा ललित बनाई-सखी छवि वरणि न जाई। शंभु ने आज होरी मचाई गिरिजा झपट चली सखियन ते शंकर सन्मुख आई। भर पिचकारी दृगन में मारी मुख से लख मुसकाई।। देख शिव रूप लुभाई शंभु [...]
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लेखक : राजीव लोचन साह :: अंक: 13 || 15 फरवरी से 28 फरवरी 2010:: वर्ष :: 33 :February 24, 2010 पर प्रकाशित
एक बार फिर होलियाँ सामने हैं। सामाजिक सद्भाव का यह एक विलक्षण पर्व है, जिसमें हास्य होता है, लेकिन कटुता नहीं होती। व्यंग्य होता है, मगर उससे कोई रंजिश नहीं जनमती। अश्लीलता होती है, लेकिन वह सहज भाव से स्वीकार कर ली जाती है। काश, होली से इतर भी हमारे समाज में ऐसी सहिष्णुता, इतनी [...]
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