चमोली जिले में एक राजमार्ग ही गायब हुआ !
सीमा सड़क संगठन राष्ट्रीय राजमार्ग 58 की लगभग चार किलोमीटर सड़क खा गया है। यह घटना जोशीमठ की है, जो लगभग 500 किलोमीटर लंबे दिल्ली-बदरीनाथ राजमार्ग पर स्थित है, बदरीनाथ से 40 किलोमीटर पहले। यहाँ यदि पूछिए कि राष्ट्रीय राजमार्ग कहाँ है तो कोई नहीं बता पायेगा। सीमा सड़क संगठन का जोशीमठ से पाँच किलोमीटर [...]
यह कैसा गांव भूमि हस्तांतरण
सरकारी खातों में अधिकारियों की मनमानी से किसकी भूमि किसके नाम की जाती है, इसका एक उदाहरण हाल में जोशीमठ के रैगाँव, अब रविग्राम में मिला। इस गाँव की 21.119 हेक्टेयर या लगभग 211 नाली भूमि उत्तर प्रदेश सरकार के सिंचाई विभाग ने 1970 के दशक में विष्णुप्रयाग जल विद्युत परियोजना के लिए वहाँ के [...]
तराई में खूनी जंग के आसार
थारुओं की जमीन का मामला भारत-नेपाल सीमा से लगी तराई की पट्टी में थारू एवं गैर थारू लोगों के बीच वर्षों से चला आ रहा भूमि विवाद गहराता जा रहा है। जनजाति के लोग मानते हैं कि गैर थारू भू-माफिया ने ऊँची राजनैतिक पहुँच और दादागिरी के बूते उनकी जमीनों पर कब्जा कर लिया है। [...]
फौज ने ही बेच डाली सरहदी भूमि !
फौज को क्या भूमि बेचने का अधिकार है? और क्या वह इसमें ब्यापार कर पैसा कमाने का काम कर सकती है? यह दोनों काम उसने भारत की सीमा के अंतिम गाँव ‘माणा’ में किया। यह जनजाति क्षेत्र है, जहाँ भूमि बिक्री पर संवैधानिक रोक है। इस गाँव की 26 नाली (5,200 वर्ग मीटर) भूमि फौज [...]
प्राग फार्म के पट्टे निरस्त कर उद्योगपतियों को देने की तैयारी तो नही
यहाँ तराई में पैर फैलाये काफी लम्बे समय से चर्चित एवं विवादित बड़े कृषि फार्मों के दिन लदते हुए दिखाई दे रहे हैं। तराई के आबाद न होने के कारण पूर्व में तराई की यह जमीनें अंग्रेज सरकार बहादुर द्वारा सेना के सेवा निवृत्त अधिकारियों, महानगरों के बड़े उद्योगपतियों और उन सभी लोगों को फरोकदिली [...]
तीन विभागों के झगड़े में फँसा है एक गाँव
शारदा सागर डाम के निर्माण के बाद सिसैया गाँव की शेष बची 392 एकड़ भूमि राजस्व विभाग को सौंपे जाने के बाद इसका गजट नोटीफिकेशन नहीं हो सका है। फलस्वरूप लगभग 200 परिवारों के कब्जे में होने के बाद भी यह जमीन राजस्व विभाग, वन विभाग तथा कैनाल विभाग के बीच त्रिशंकु बनी है। राजस्व [...]
औली बुग्याल में भारी निर्माण क्यों हो रहे हैं ?
लगभग 10 वर्ष पूर्व, 20 अक्टूबर 1996 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने फैसला दिया था कि हिमालय की ऊँची घास की ढलानों और चरागाहों पर मकान या किसी अन्य प्रकार का निर्माण नहीं होना चाहिए, क्योंकि उससे वहाँ का वातावरण दूषित होता है और पर्यावरण की क्षति होती है। न्यायालय ने आदेश दिया था कि [...]
समस्या का समाधान नहीं है भू अध्यादेश
कांग्रेस सरकार द्वारा दो बार, पहला 12 सितम्बर 2003 को और दूसरा 15 जनवरी 2004 को, भू अध्यादेश लाये जाने के बाद भाजपा की खंडूरी सरकार भी 2 मई 2007 को एक नया भू अध्यादेश ले आई। क्या माना जाये कि राज्य की राजनीति में जमीन का सवाल सचमुच प्राथमिकता में आ गया है ? [...]
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