गंगा से
जुग बीते दजला से इक भटकी हुई लहर जब तेरे पवित्र चश्मों को छूने आई तो तेरी ममता ने फैला दीं अपनी बाहें और तेरे हरे किनारों पर तब आम और कटहल के दरख्तों से घिरे हुए खपरैलों वाले घरों के आँगन में किलकारियाँ गूँजीं मेरे पुरुखों की खेती शादाब हुई और शगुन के तेल [...]
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