मास्साब
(वर्ष 2001 में आकाशवाणी अल्मोड़ा में पढ़ी गई गिर्दा को समर्पित यह कविता उन्हें सुनाई भी गयी थी। इसे उन्होंने पसंद किया। -सम्पादक) मास्साब ! नहीं ठहरा आपके बस का न आप जी ही पाये ढंग से ना ही मरने दिया आपको अपने खूबसूरत सपनों ने आप तो जुगाली कर सकते थे करते भी रहे [...]
पानी के दिन
पहाड़ों पर पानी के दिन हैं और नींद में चल रही हवा। छुए जाने के भय से बच-बच कर इधर-उधर भाग रहे हैं बादल रोमांचित। बहुत भागमभाग का समय है तेजी से नीचे की ओर दौड़ रही हैं गायें रंभाती थनों में आंदोलित हो रहा है अनुराग बछड़ों का। ऊपर बसेरे की ओर लौटती चिड़िया [...]
बाबा हम तुम्हें बहुत याद करते हैं
इस साल इत्तफाक ऐसा हुआ कि एक ओर 35 साल पहले का 25 जून 1975, इमर्जेंसी वाला दिन याद आ रहा था तो दूसरी ओर 26 जून, ज्येष्ठ पूर्णिमा बाबा नागार्जुन का जन्मदिन। वह भी शताब्दी वर्ष। इस पर इन सब बातों को खचोरने के लिये बनारस से प्रो. वाचस्पति का फोन। तो जाहिर है [...]
अलविदा! राजू भाई, अलविदा!
अलविदा! राजू भाई, अलविदा! नश्वर देह त्यागने से पूर्व सतीहरी ने किया था सचेत खबर कभी भी मिल सकती है तुम्हारे जुदा होने की उनकी आँखों से मैंने देखी तुम्हारे नेत्रों की चमक और सुने अधखुले होंठों से निकले स्वर जो आह्वान कर रहे थे एकजुट होने का उन विध्वंसकारियों के खिलाफ जो रच रहे [...]
एक औरत
उसने अपनी जिन्दगी में सिर्फ तीन पहाड़ देखे सामने का पहाड़ जिसमें पसरी है जिन्दगी बायें तरफ का पहाड़, जो ढँका है चीड़ों से और वह पहाड़ जिसमें आबाद है उसका गाँव उसने सिर्फ दो ही पट्टियाँ देखीं, मायके और ससुराल की. गाँव के नीचे बहती नदी से उसे खासा लगाव है क्योंकि वह बहकर [...]
ये कैसी श्रद्धांजलि!
हम पर किये गये जुल्मों का प्रतीक है प्रताप मारा गया पुलिस की गोली से 3 अक्टूबर उन्नीस सौ चौरानब्बे हर साल 2 मिनट का मौन रख कर अपनी श्रद्धांजलि प्रकट करते आ रहे हैं हम तब से। जो भी श्रद्धांजली देते हैं हम आज दुश्मन के खिलाफ अपने भीतर के गुस्से में हम जोड़ [...]
कितना अच्छा होता
अगर बच्चे दौड़ते हुए स्कूल आते दमकते चेहरों, ऊर्जावान पैरों और प्रश्नों से भरे मस्तिष्क के साथ अनगिनत मस्तिष्कों से उछलते असंख्य प्रश्न और छलकते प्रश्नों को समेटते शिक्षक आगे-आगे पीछे-पीछे साथ-साथ कितना अच्छा होता अगर पढ़ाते समय शिक्षक की आँखों में चमक होती और जाती बच्चों की आँखों तक और फिर उनके मन तक [...]
तुम नज़रें उठाने लगती हो तो…..
तुम नज़रें उठाने लगती हो तो धड़कने लगता है इस दुनिया का रुपहला दिल, हे भारतमाता ! नारंगी खुशबू उड़ती है और मैं बंद कर देता हूँ अमरकोश तुम्हारा अर्थ करने का व्यर्थ प्रयास आसपास रूपहला दिल यहाँ आसपास नारंगी खुशबू यहाँ और जिसे ग़रीबी की नहीं कोई पहचान वह दस गुना अमीरी भी यहाँ [...]
है किसका अधिकार नदी पर
(धुन-नदी जमुना के तीर कदम चढ़ी) चलो नदी तट वार चलो रे चलो नदी तट पार चलो रे,करें यात्रा नदियों की नदी वार तट पार चलो रे,करें यात्रा नदियों की इन नदियों के अगल-बगल ही जीवन का विस्तार,चलो रे करें यात्रा नदियों की आज इन्हीं नदियों के ऊपर पड़ी है मारामार, चलो रे करें यात्रा [...]
मेरि कोसि हरै गे कोसि
जोड़ – आम-बुबु सुणूँ छी गदगदानी ऊँ छी रामनङर पुजूँ छी कौशिकै की कूँ छी पिनाथ बै ऊँ छी मेरि कोसि हरै गे कोसि। कौशिकै की कूँ छी मेरि कोसि हरै गे कोसि।। क्या रोपै लगूँ छी मेरि कोसि हरै गे कोसि। क्या स्यारा छजूँ छी मेरि कोसि हरै गे कोसि।। घट-कुला रिङू छी मेरि [...]
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