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लेखक : नैनीताल समाचार :: अंक: 15 || 15 मार्च से 31 मार्च 2011:: वर्ष :: 34 :May 7, 2011 पर प्रकाशित
‘जो नर जीवें खेले फाग, हो हो हो लकी रे’ गिरिजा काण्डपाल खड़ी होली के अन्तर्गत महिलाओं द्वारा जो होलियाँ गाई जाती हैं, वे आमलकी (आँवला) एकादशी के दिन से प्रारम्भ हो जाती हैं। महिलायें एकादशी का व्रत रख कर आँवले के वृक्ष की पूजा करती हैं। आँवले के वृक्ष की शाख पर चीर (वस्त्र) [...]
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लेखक : नैनीताल समाचार :: अंक: 15 || 15 मार्च से 31 मार्च 2011:: वर्ष :: 34 :May 7, 2011 पर प्रकाशित
( बगरो बसन्त में इस बार प्रस्तुत है सुप्रसिद्ध साहित्यकार व पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी का उनके द्वारा साप्ताहिक प्रताप शिखर में लिखा गया (18 मार्च 1914) लेख ‘जातीय होली’ जो उनकी ‘चुनी हुई रचनाएं’ पुस्तक से लिया गया है और प्रस्तुत हैं सुप्रसिद्ध युवा कवि शिरीष मोर्य व वरिष्ठ राजनीतिज्ञ वरवर रॉव की हिन्दी [...]
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लेखक : नैनीताल समाचार :: अंक: 11 || 15 जनवरी से 31 जनवरी 2011:: वर्ष :: 34 :January 29, 2011 पर प्रकाशित
रहेंगे याद तुम्हारे गीत एक मर्मस्पर्शी व्यक्तित्व पर्वत श्रृंखलाओं में दूर-दूर तक विचरता रहेगा इस देव भूमि में, अनगिनत हृदयों में सूक्ष्म रूप से यादों के स्पन्दन में समाया रहेगा कण-कण में, जन-जन में। सरल स्वभाव आत्मीयता से भरी आँखे आने वाली नस्लों को पहाड़ों के प्रति लगाव प्रेरणा देती रहेंगी हर मन में। हर [...]
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लेखक : शिरीष कुमार मौर्य :: अंक: 09 || 15 दिसंबर से 31 दिसंबर 2010:: वर्ष :: 34 :January 23, 2011 पर प्रकाशित
कपिलेश भोज का हिंदी साहित्य में हस्तक्षेप पुराना है। उनका नाम बीस बरस पहले मैं वर्तमान साहित्य के सम्पादक मंडल में देखता था। उनकी कुछ कहानियाँ मैंने पढ़ीं। फिर ये जाना कि वे एक बेहद सक्रिय और समर्पित राजनैतिक कार्यकर्ता रहे हैं। इसे मेरी लिखत-पढ़त की सीमा ही माना जाए कि उनकी कविताओं से मेरा [...]
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लेखक : गिरीश तिवाड़ी 'गिर्दा' :: अंक: 10 || 01 जनवरी से 14 जनवरी 2010:: वर्ष :: 33 :January 9, 2010 पर प्रकाशित
वक्त का सिलसिला यों ही चलता रहा और करता रहा बागियों को सलाम ! यों गुजरता रहा रात-दिन जुल्म से हर बगावत से पाता नया इक मुकाम। अपने–अपने समय के मेरे बागियो इस समय का तुम्हारे समय को सलाम ! हर बगावत ने जो भी नया कुछ रचा- गीत, नग्मा, रुबाई, गजल को सलाम [...]
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लेखक : प्रभात उप्रेती :: अंक: 10 || 01 जनवरी से 14 जनवरी 2010:: वर्ष :: 33 :January 9, 2010 पर प्रकाशित
महेश पुनेठा का नया संग्रह ’भय अतल में’ की कविताएँ अंदर तक छूती हैं। न सर के ऊपर जाती हैं न कोफ्त पैदा करती है। हर कविता में अपनापन और घरेलूपन दिखता है और अन्य कवितायें पढ़ने के लिए विवश करता है। यह विवशता सार्थक होती है। इसमें मजा ही नहीं आता यह अंदर भी [...]
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लेखक : शिरीष कुमार मौर्य :: अंक: 11 || 15 जनवरी से 31 जनवरी 2008:: वर्ष :: 31 :January 30, 2008 पर प्रकाशित
दिवा भट्ट के कविता संकलन ‘अक्षरों के पुल’ की कवितायें महज एक स्त्री के गुनगुने भाव लोक भर की कवितायें नहीं हैं, जैसा कि आम तौर पर स्त्री लेखन में देखा जाता है। ये कवितायें दरअसल उस विचार के विरोध की कवितायें हैं, जो लेखकों को स्त्री और पुरुष के खेमों में बाँटकर देखता आया [...]
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लेखक : नैनीताल समाचार :: अंक: 10 || 01 जनवरी से 14 जनवरी 2008:: वर्ष :: 31 :January 15, 2008 पर प्रकाशित
नया साल / नयी संस्कृति वह आग नहीं है वह एक सर्वथा नयी राष्ट्रभाषा है सड़क पर अभी भी चिपचिपाता वह खून नहीं वह है एक नयी किस्म की रोशनाई जली हुई उन उजाड़ बस्तियों में आकार ले रहा है हमारा नूतन स्थापत्य पटककर मार दिया गया वह बच्चा वह हमारा भविष्य है। वे हमारे [...]
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लेखक : नैनीताल समाचार :: अंक: 01-02 || 15 अगस्त से 14 सितम्बर 2007:: वर्ष :: 31 :August 15, 2007 पर प्रकाशित
गाँधी की आँधी आई थी बीते लगभग बरस पचास अपने साथ सपन लाई थी सब कुछ होगा सब के पास वादों की लादी भर जनता आज रही है कांधें झेल अब्बर देवी, जब्बर बकरा नागड़ ध्न्निा नागर बेल – हरिवंश राय बच्चन कितने साधें हों पूरी, तुम रोज बढ़ाते जाते कौन तुम्हारी बात बने, तुम [...]
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