लेखक : नैनीताल समाचार :: अंक: 04 || 01 अक्टूबर से 14 अक्टूबर 2011:: वर्ष :: 35 :October 15, 2011 पर प्रकाशित
प्रस्तुति :हरीश भट्ट उत्तराखंड में भूमि का मसला अत्यन्त महत्वपूर्ण है। 87 प्रतिशत पर्वतीय भूभाग वाले राज्य में भूमि इतनी कम है कि वह बढ़ती जनसंख्या और नगरों-कस्बों के विकास की जरूरतों को पूर्ण करने में असमर्थ है। आज जिस जमीन पर माफियाओं, नौकरशाहों व राजनेताओं की नजरें हैं, उसे मानव के रहने योग्य बनाने [...]
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लेखक : नैनीताल समाचार :: अंक: 01-02 || 15 अगस्त से 14 सितम्बर 2011:: वर्ष :: 35 :September 18, 2011 पर प्रकाशित
राकेश कुमार मालवीय आजादी के बाद से भारत में अब तक साढ़े तीन हजार परियोजनाओं के नाम पर लगभग दस करोड़ लोगों को विस्थापित किया जा चुका है। लेकिन सरकार को अब होश आया है कि विस्थापितों की जीविका की क्षति, पुनर्वास-पुनस्र्थापन एवं मुआवजा उपलब्ध कराने हेतु एक राष्ट्रीय कानून का अभाव है। यानि इतने [...]
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लेखक : राजीव लोचन साह :: अंक: 01-02 || 15 अगस्त से 14 सितम्बर 2011:: वर्ष :: 35 :September 14, 2011 पर प्रकाशित
इस अंक के साथ ‘नैनीताल समाचार’ अपने 34 वर्ष पूरे कर 35वें वर्ष में प्रविष्ट हो रहा है। हमारा यह जनमबार अंक ‘आपदा का एक वर्ष’ के रूप में प्रस्तुत है। इस एक साल में दो बड़ी आपदाओं से हमारा सामना हुआ। पहली आपदा जो ‘समाचार’ के लिये एकदम निजी तरह की थी, वह थी [...]
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लेखक : हरीश चन्द्र चंदोला :: अंक: 23 || 15 जुलाई से 31 जुलाई 2011:: वर्ष :: 34 :August 15, 2011 पर प्रकाशित
उत्तराखंड का नाम राज्य सरकार ने ‘देव भूमि’ कर दिया है। देश भर के दैनिकों तथा पत्रिकाओं में राज्य सरकार की उपलब्धियों के विज्ञापनों की जो झड़ियाँ लगी हैं उन सबमें उसका नाम दिया गया है ‘देव भूमि’! क्यों है यह ’देव भूमि’ ? इसलिये कि यहाँ प्राचीन काल में लोग तपस्या करने आते थे [...]
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लेखक : नैनीताल समाचार :: अंक: 10 || 01 जनवरी से 14 जनवरी 2011:: वर्ष :: 34 :January 26, 2011 पर प्रकाशित
तड़ित घिल्डियाल उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद से पौड़ी नगर की घोर उपेक्षा के कारण स्थानीय जनता बेहद हताश है। उल्लेखनीय है कि इसी नगर से पहली बार राज्य की लड़ाई को गति मिली थी। यह नगर राज्य आन्दोलन की उर्वर धरती थी इसलिये नगर के लोगों ने सेाचा था कि राज्य बनने के बाद [...]
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लेखक : गणेश रावत :: अंक: 22 || 01 जुलाई से 14 जुलाई 2010:: वर्ष :: 33 :July 19, 2010 पर प्रकाशित
विडम्बना ही कहा जाएगा कि जिस राज्य का मुख्यमंत्री खुद को कवि, साहित्यकार और पत्रकार कहलाने में गौरवान्वित होता हो, उसी राज्य में कला, साहित्य व संस्कृति को संरक्षण देने का काम हाशिए पर है। इसका जीता-जागता सबूत प्रदेश में साहित्य, कला और संस्कृति परिषद का अब तक गठन न हो पाना है। 6 साल [...]
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लेखक : नैनीताल समाचार :: अंक: 18 || 01 मई से 14 मई 2010:: वर्ष :: 33 :May 16, 2010 पर प्रकाशित
प्रस्तुति : नवीन जोशी अंग्रेजों के जमाने की अनूठी व्यवस्था 150 से अधिक वर्षों तक सफलता के साथ चलने के बाद बीती 30 मार्च से तकरीबन इतिहास बन गई है। पूरे देश से इतर उत्तराखंड राज्य के केवल पहाड़ी अंचलों में कानून व्यवस्था को कमोबेश सफलता से निभाते हुए सामान्यतया ‘गांधी पुलिस’ कही जाने वाली [...]
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लेखक : नैनीताल समाचार :: अंक: 18 || 01 मई से 14 मई 2010:: वर्ष :: 33 :May 4, 2010 पर प्रकाशित
प्रस्तुति : हरीश चन्द्र फुलारा उत्तराखंड के 10 पर्वतीय जिलों की जनता का बहुत बड़ा कर्ज भारतवर्ष पर है। यहाँ के अधिकांश परिवारों की माताओं ने अपने कम से कम एक सपूत को सीमाओं की रक्षा एवं आन्तरिक सुरक्षा के लिए देश को समर्पित किया है तो परिवार के अन्य सदस्यों द्वारा अपनी जान को [...]
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लेखक : नैनीताल समाचार :: अंक: 16 || 01 अप्रेल से 14 अप्रेल 2010:: वर्ष :: 33 :April 11, 2010 पर प्रकाशित
उ.प्र. के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह द्वारा 27 प्रतिशत आरक्षण उत्तराखंड पर बलात थोपने के कारण 1994 में जन आंदोलन पृथक राज्य के लिये ज्यादा उग्र हुआ। 42 से अधिक लोगों के शहीद व हजारों लोगों के जेल जाने तथा महिलाओं पर मुजफ्फरनगर में ज्यादतियाँ होने के फलस्वरूप 2000 में पृथक राज्य बना। उ.प्र. के [...]
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लेखक : पुरुषोत्तम शर्मा :: अंक: 16 || 01 अप्रेल से 14 अप्रेल 2010:: वर्ष :: 33 :April 11, 2010 पर प्रकाशित
अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परम्परागत वनवासी (वन अधिकारों की मान्यता) कानून उत्तराखंड में नवम्बर 2008 से लागू किया गया है। मगर इस कानून के दायरे में आने वाले लाभार्थियों के चुनाव ने राज्य सरकार और राज्य की अन्य शासक वर्गीय राजनीतिक पार्टियों की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिये हैं। इन सवालों पर रोशनी [...]
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