योजना आयोग की उस दफ्न फाइल को निकालो
वर्ष 1992 में हिमालय क्षेत्र के विकास की संभावनाओं को लेकर एक समिति गठित की गई थी, जिसके अध्यक्ष योजना आयोग के सदस्य जेड. कासिम थे। अन्य सदस्य थे, जे.एन. पाटिल, जे. एस. बजाज, प्रो. हर्ष गुप्ता, डॉ. ए.एन. पुरोहित और डॉ. खड्गसिंह वल्दिया को भी इसमें शामिल किया गया था। इस समिति द्वारा सौंपी [...]
परेशान जनता को बहला रहा है वन विभाग
बंदरों को मारने की मिलेगी अनुमति-’’बंदरों से परेशान लोगों को यह खबर राहत पहुँचा सकती है, शासन ने जानमाल के साथ सम्पत्ति को नुकसान पहुँचाने वाले बंदरों को मारने की अनुमति देने का फैसला किया है। ’’ (अमर उजाला, 4 मार्च, 2012)। नहीं रहेगा भालू गुलदार का डर- ’’गुलदार, भालू ओर हाथी समेत अन्य जंगली [...]
ऐसे तो नहीं हो पायेगी खाद्य सुरक्षा
ईश्वर जोशी संसद में पेश किये जा चुके ‘राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक 2011’ के मसौदे को राजनैतिक दलों, नागरिक समूहों एवं बुद्धिजीवियों ने सिरे से खारिज कर दिया है। विधेयक में छिटपुट योजनाओं के जरिये खाद्य सुरक्षा जैसे गंभीर समस्या का सतही हल ढूँढने का प्रयास किया गया है। वैश्वीकरण के दौर में पिछले दो [...]
भू कानून की मौत
प्रस्तुति :हरीश भट्ट उत्तराखंड में भूमि का मसला अत्यन्त महत्वपूर्ण है। 87 प्रतिशत पर्वतीय भूभाग वाले राज्य में भूमि इतनी कम है कि वह बढ़ती जनसंख्या और नगरों-कस्बों के विकास की जरूरतों को पूर्ण करने में असमर्थ है। आज जिस जमीन पर माफियाओं, नौकरशाहों व राजनेताओं की नजरें हैं, उसे मानव के रहने योग्य बनाने [...]
परियोजना, विस्थापन और पुनर्वास
राकेश कुमार मालवीय आजादी के बाद से भारत में अब तक साढ़े तीन हजार परियोजनाओं के नाम पर लगभग दस करोड़ लोगों को विस्थापित किया जा चुका है। लेकिन सरकार को अब होश आया है कि विस्थापितों की जीविका की क्षति, पुनर्वास-पुनस्र्थापन एवं मुआवजा उपलब्ध कराने हेतु एक राष्ट्रीय कानून का अभाव है। यानि इतने [...]
हमारा कॉलम : आँसू पोंछने की अनिच्छा और हिस्सा खा जाने की अमानवीयता
इस अंक के साथ ‘नैनीताल समाचार’ अपने 34 वर्ष पूरे कर 35वें वर्ष में प्रविष्ट हो रहा है। हमारा यह जनमबार अंक ‘आपदा का एक वर्ष’ के रूप में प्रस्तुत है। इस एक साल में दो बड़ी आपदाओं से हमारा सामना हुआ। पहली आपदा जो ‘समाचार’ के लिये एकदम निजी तरह की थी, वह थी [...]
क्या महज आस्था के कारण यह देवभूमि है ?
उत्तराखंड का नाम राज्य सरकार ने ‘देव भूमि’ कर दिया है। देश भर के दैनिकों तथा पत्रिकाओं में राज्य सरकार की उपलब्धियों के विज्ञापनों की जो झड़ियाँ लगी हैं उन सबमें उसका नाम दिया गया है ‘देव भूमि’! क्यों है यह ’देव भूमि’ ? इसलिये कि यहाँ प्राचीन काल में लोग तपस्या करने आते थे [...]
राज्य गठन के बाद और पिछड़ गया है पौड़ी
तड़ित घिल्डियाल उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद से पौड़ी नगर की घोर उपेक्षा के कारण स्थानीय जनता बेहद हताश है। उल्लेखनीय है कि इसी नगर से पहली बार राज्य की लड़ाई को गति मिली थी। यह नगर राज्य आन्दोलन की उर्वर धरती थी इसलिये नगर के लोगों ने सेाचा था कि राज्य बनने के बाद [...]
क्यों बेपरवाह है सरकार साहित्य और संस्कृति के विकास को लेकर ?
विडम्बना ही कहा जाएगा कि जिस राज्य का मुख्यमंत्री खुद को कवि, साहित्यकार और पत्रकार कहलाने में गौरवान्वित होता हो, उसी राज्य में कला, साहित्य व संस्कृति को संरक्षण देने का काम हाशिए पर है। इसका जीता-जागता सबूत प्रदेश में साहित्य, कला और संस्कृति परिषद का अब तक गठन न हो पाना है। 6 साल [...]
आखिरी साँसें गिन रही है गांधी पुलिस
प्रस्तुति : नवीन जोशी अंग्रेजों के जमाने की अनूठी व्यवस्था 150 से अधिक वर्षों तक सफलता के साथ चलने के बाद बीती 30 मार्च से तकरीबन इतिहास बन गई है। पूरे देश से इतर उत्तराखंड राज्य के केवल पहाड़ी अंचलों में कानून व्यवस्था को कमोबेश सफलता से निभाते हुए सामान्यतया ‘गांधी पुलिस’ कही जाने वाली [...]
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