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लेखक : नैनीताल समाचार :: अंक: 06 || 01 नवंबर से 14 नवंबर 2011:: वर्ष :: 35 :November 15, 2011 पर प्रकाशित
बिजू नेगी मूलतः जैविक प्रदेश उत्तराखण्ड का कृषि विभाग किसानों को रासायनिक उर्वरक़़ मुफ्त मे बाँट रहा है। बगैर किसी सार्वजनिक चर्चा या सूचना के यह प्रसाद ‘पोषक सुरक्षा हेतु तदन्य मोटा अनाज विकास पहल’ के अन्तर्गत चुपचाप बाँटा जा रहा है। किसानों को प्रदर्शन के तौर पर डी.ए.पी., यूरिया, जिंक जैसे रासायनिक उर्वरकों के [...]
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लेखक : गजेन्द्र पाठक :: अंक: 24 || 01 अगस्त से 14 अगस्त 2011:: वर्ष :: 34 :September 2, 2011 पर प्रकाशित
बाँज पर्यावरण संतुलन, जैवविविधता एवं जल संरक्षण की दृष्टि से महत्वपूर्ण वृक्ष है। इस सदाबहार वृक्ष की जड़ से लेकर तने तक का प्रत्येक भाग किसी न किसी रूप में उपयोगी है, अतः इसे पहाड़ का कल्प वृक्ष भी कहा जाता है। ग्लोबल वॉर्मिंग एवं जलवायु परिवर्तन के वर्तमान दौर में इस वृक्ष का महत्व [...]
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लेखक : नैनीताल समाचार :: अंक: 23 || 15 जुलाई से 31 जुलाई 2011:: वर्ष :: 34 :August 15, 2011 पर प्रकाशित
प्रस्तुति: राजेन्द्र तिवारी औद्योगीकरण के प्रसार से पिछले 50 वर्षो में कृषि योग्य भूमि के क्षेत्रफल में लगातार कमी हो रही है। मगर खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में श्रीविधि (System of Rice Intensification – SRI)वरदान साबित हो सकती है। उत्तराखण्ड के पहाड़ी भूभाग के परिपे्रक्ष्य में कृषि जोतें छोटी एवं बिखरी होने के साथ-साथ कुल [...]
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लेखक : कैलाश चन्द्र पपनै :: अंक: 09 || 15 दिसंबर से 31 दिसंबर 2010:: वर्ष :: 34 :January 24, 2011 पर प्रकाशित
अगर बारिश कम हो तो गर्मियों में उत्तराखंड में असाधारण जल संकट पैदा हो जाता है। पिछले साल हिमपात न होने से इस बार गर्मियों में नदियों में जल प्रवाह कम रहा था। गर्मियों में प्रमुख ग्लेशियरों पर आधारित भागीरथी और अलकनन्दा जैसी नदियों में जल प्रवाह में 50 प्रतिशत की कमी आ गई थी। [...]
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लेखक : नैनीताल समाचार :: अंक: 21 || 15 जून से 30 जून 2010:: वर्ष :: 33 :June 30, 2010 पर प्रकाशित
प्रस्तुति : माधवानन्द मैनाली ‘मधु’ मडुआ, गहत, पहाड़ी आलू, भट्ट, पहाड़ी गाय का दूध, घी और गौमूत्र आदि पहाड़ी उत्पादों ने बाजार में अपना प्रभुत्व जमाना आरम्भ कर दिया है। अब चुनौती है कि इनके उत्पादन को किस प्रकार आगे बढ़ाया जाये। उत्तराखण्ड के 55.66 लाख हेक्टेअर क्षेत्रफल में 34.66 हेक्टेअर वन क्षेत्र है। बंजर [...]
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लेखक : विजय जड़धारी :: अंक: 20 || 01 जून से 14 जून 2010:: वर्ष :: 33 :June 7, 2010 पर प्रकाशित
‘बीज बचाओ आंदोलन’ द्वारा 29-30अप्रैल 2010 को खाड़ी एवं नागणी में आयोजित गोष्ठी में समाजसेवियों, किसानों वैज्ञानिकों एवं बुद्धिजीवियों ने दो दिन के विचार विमर्श के बाद अनेक प्रस्ताव पास किए। यह माँग की गयी कि उत्तराखण्ड में जैविक कृषि को बढ़ावा देने के लिये अतिरिक्त सब्सिडी दी जाये। यहाँ रासायनिक खादों एवं कीटनाशकों का [...]
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लेखक : ग़िरिजा पांडे :: अंक: 08 || 01 दिसंबर से 14 दिसंबर 2009:: वर्ष :: 33 :December 9, 2009 पर प्रकाशित
अक्टूबर के महीने नोबेल समिति द्वारा प्रो. इलिनोर ओस्ट्राम और ओलिवर विलियमसन को संयुक्त रूप से अर्थशास्त्र के नोबेल पुरस्कार के लिये चुना जाना अनेक मायनों में महत्वपूर्ण है। अर्थशास्त्र के क्षेत्र में पहली बार एक महिला को यह पुरस्कार मिल रहा था और वह भी उस राजनीति शास्त्री को, जिसने अर्थशास्त्रियों के वर्चस्व को [...]
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लेखक : जुगल किशोर पांडे :: अंक: 03 || 15 सितम्बर से 30 सितम्बर 2009:: वर्ष :: 33 :September 22, 2009 पर प्रकाशित
ग्रामीण परिवेश में रह रहे लोगों की अपने देवी देवताओं को मानने की परम्परा लम्बे समय से चली आ रही है। पिथौरागढ़ के कुमौड़ गाँव में आयोजित हिलजात्रा पर्व पर लखिया भूत को पूजने के साथ ही उसे प्रसन्न भी किया जाता है। हिलजात्रा आयोजन समिति के अध्यक्ष गोबिन्द सिंह महर (गोपू) के अनुसार हिलजात्रा [...]
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लेखक : पंकज शर्मा :: अंक: 24 || 01 अगस्त से 14 अगस्त 2009:: वर्ष :: 32 :August 1, 2009 पर प्रकाशित
घराटों के रख-रखाव एवं पुरातन सभ्यता के संवाहक उत्तराखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यरत इन घराटों के संरक्षण को लेकर शासन-प्रशासन कितना संजीदा है, इसका पता इस बात से मिलता है कि पहाड़ों में अधिकांश घराट बंद हो चुके हैं। या जो हैं, वे भी बंद होने के कगार पर खड़े हैं। हाल के कुछ [...]
Posted in विविध | Tagged energy, energy saving, gharat, hydro power, traditional methods |
लेखक : विशेष प्रतिनिधि :: अंक: 23 || 15 जुलाई से 31 मार्च 2009:: वर्ष :: 32 :July 15, 2009 पर प्रकाशित
उत्तराखंड में इस साल अब तक पानी की स्थिति बहुत विकट रही है। जाड़ों में बहुत कम हिमपात होने के कारण सन् 2009 की गर्मियों में बर्फ पिघलने से मिलने वाले पानी की बहुत कमी रही। हिमनद से बनने वाली भागीरथी और अलकनन्दा जैसी नदियों में गर्मियों में पानी का औसत प्रवाह लगभग 50 प्रतिशत [...]
Posted in पर्यावरण, विशेषांक, हरेला-अंक | Tagged environment article, save water, traditional methods, water, water crisis, पर्यावरण |
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