लेखक : नैनीताल समाचार :: अंक: 23 || 15 जुलाई से 31 जुलाई 2011:: वर्ष :: 34 :August 15, 2011 पर प्रकाशित
कमल जोशी सिमतोला के साथ पुराना रिश्ता है। इको पार्क बनने से पहले भी अल्मोड़ा शहर के समीप स्थित यह खूबसूरत पहाड़ी मेरे जैसे एकांतप्रिय व घुमक्कड़ स्वभाव के लोगों को आकर्षित करती रही है। चीड़, देवदार, बाँज और अकेशिया के पेड़ों के बीच पगडंडियों पर चलकर पपरसली से सिमतोला की पहाड़ी पर चढ़ना, चिडि़यों [...]
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लेखक : हरीश चन्द्र चंदोला :: अंक: 21 || 15 जून से 30 जून 2010:: वर्ष :: 33 :June 30, 2010 पर प्रकाशित
बदरीनाथ धाम में बढ़ती यात्रियों की संख्या तथा विशेष अतिथि (वी.आई.पी) को बिना लाइन में लगे दर्शन कराने पर यात्रियों तथा पुलिस दल के बीच 10 जून को मारपीट हो गई, जिसमें एक महिला को काफी चोट आई. इसके प्रतिरोध में धाम में एक दिन की हड़ताल हो गई। मंदिर में प्रवेश का एक द्वार [...]
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लेखक : कैलाश कोरंगा :: अंक: 20 || 01 जून से 14 जून 2010:: वर्ष :: 33 :June 14, 2010 पर प्रकाशित
‘बिराण बनै गेछ, यो बिराण बनै गेछ, यो मालपा को डाना, हे काली मैया तेरी महिमा छ महान,’ गीत आज भी पूरी कारुणिकता के साथ उत्तराखण्ड में सुना जाता है। लोकगायक फकीर चन्द चिन्याल ने अपने मधुर कण्ठ से इस गीत द्वारा मालपा के मृतकों को श्रद्धांजलि अर्पित की थी। 17 अगस्त 1998 की काली [...]
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लेखक : महेश बवाड़ी :: अंक: 08 || 01 दिसम्बर से 14 दिसम्बर 2008:: वर्ष :: 32 :December 1, 2008 पर प्रकाशित
एक बार फिर जीप सरपट उतार पर दौड़ रही थी। गर्मी लगातार बढ़ती जा रही थी। खाने का असर अब नींद के रूप में हो रहा था। हम एक- दूसरे के कंधों पर टिक या एक-दूसरे को धकेलते हुए झपकियाँ ले रहे थे, मगर मनिया मुस्तैदी से अपने काम को अंजाम दे रहा था। सेराघाट [...]
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लेखक : प्रदीप तिवारी :: अंक: 13 || 15 फरवरी से 29 फरवरी 2008:: वर्ष :: 31 :February 29, 2008 पर प्रकाशित
घने देवदार, बाँज, बुरांश, थुनेर के वृक्षों के बीच अत्यंत शोभनीय मक्कू मठ का इतिहास प्रथम शताब्दी पूर्व माना जाता है। मार्कण्डेय ऋषि की तपस्थली कहा जाने वाला यह क्षेत्र देवासुर संग्राम और आर्य व अनार्य जातियों की संघर्ष गाथायें अपने में समेटे हुए है। प्राचीन आदिवासी मौर जातियाँ ग्रीष्म काल में अपने पशुओं के [...]
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लेखक : प्रभात उप्रेती :: अंक: 08 || 01 दिसंबर से 14 दिसंबर 2007:: वर्ष :: 31 :December 14, 2007 पर प्रकाशित
सोरघाटी से गर्ब्यांग.अन्तिम किस्त सोरघाटी से गर्ब्यांग-08 [ पिछ्ले अंक से आगे] सुबह वापसी। यात्रा व तलाश दोनों समानार्थी हैं। अर्थ देने की कोशिश में कितना अनर्थ हो जाता है कभी और कभी अर्थ ही खो जाता है। और अपनी यात्रा में अर्थ खोता हूँ, अपने को भी। दूसरों की तलाश में ही मिलता है [...]
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लेखक : प्रभात उप्रेती :: अंक: 07 || 15 नवंबर से 30 नवंबर 2007:: वर्ष :: 31 :November 15, 2007 पर प्रकाशित
सोरघाटी से गर्ब्यांग-07 [ पिछ्ले अंक से आगे] धड़कते दिल से हम साढे़ बारह बजे पहुँचे कैम्प। इंस्पैक्टर को धन्यवाद देने पर एक सरदारजी, जो कुर्सी पर विराजित थे बोले, ‘‘वह नहीं हैं, चले गये हैं आर्मी में। आज दुर्गा पूजा है। अब तुम जाओ…।’’ उन्होंने ऐसे आदेश दिये, जैसे हम उन्हें सैल्यूट करने आये [...]
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लेखक : प्रभात उप्रेती :: अंक: 06 || 01 नवंबर से 14 नवंबर 2007:: वर्ष :: 31 :November 1, 2007 पर प्रकाशित
सोरघाटी से गर्ब्यांग-06 [ पिछ्ले अंक से आगे] छियालेक की चढ़ाई। धूप अभी नहीं है। ठंड कुनकुनी है। हमने गर्म कपड़े पहिन लिये हैं। हम धीरे-धीरे चढ़ते हैं। अभी लोगों ने चलना शुरू नहीं किया है। रास्ते में बिल्कुल खट्टा फल शंखदाना मिलता है। पूरी डाल है उसकी। पतली डाल में मोतियों सा पिरोया हुआ। [...]
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लेखक : प्रभात उप्रेती :: अंक: 05 || 15 अक्टूबर से 31 अक्टूबर 2007:: वर्ष :: 31 :October 15, 2007 पर प्रकाशित
सोरघाटी से गर्ब्यांग-05 [ पिछ्ले अंक से आगे] जीप अपनी प्रकृति के अनुसार भरने की प्रक्रिया में आठ बजे ही चली। नौ बजे पहुँचे घटाबगड़। अब पैदल था। खच्चर, घोड़े, लोगों का आना-जाना, लीद बकरी की मैंण की सूँघ में वापस आया चमोली का माइग्रेटिंग कॉलेज गमसाली। चमोली तिब्बत सीमाँत का प्रदेश, जहाँ हमारे सारे [...]
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लेखक : प्रभात उप्रेती :: अंक: 04 || 01 अक्टूबर से 14 अक्टूबर 2007:: वर्ष :: 31 :October 10, 2007 पर प्रकाशित
सोरघाटी से गर्ब्यांग-04 [ पिछ्ले अंक से आगे] विचार था आसपास भ्रमण करते धौली प्रोजेक्ट भी देख लिया जाय। तभी बहुत से बड़े लोग आ जाते हैं राजी जनजाति के। गगन सिंह रजवार इस क्षेत्र के विधायक हैं। वे कहते हैं- आप हमारे इलाके में आये हैं। बताइये किस चीज की आवश्यकता है। कढ़े हुए [...]
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