वह व्यवहार ही क्या, जिसमें कहीं प्रेम न हो
सोरघाटी से गर्ब्यांग-03 [ पिछ्ले अंक से आगे] आगे डुगरा गाँव वालों की भी पानी की शिकायत- सूखे नल हैं। छियासठ मवासे के डोकना गाँव वाले कहते हैं -‘‘नौले धारे पूरे सूख गये हैं। एमएलए जी आते नहीं हैं। अब सुना आने वाले हैं, चुनाव जो आ गये हैं….।’’ हम रास्ता पूछते हुए चलते रहे। [...]
डाबर की नजर से अभी ओझल है आँवले का यह जंगल
सोरघाटी से गर्ब्यांग-02 रास्ते में फिसलन थी। मैं दो तीन बार गिरा। पहली बार तो लगा कि हाथ टूट गया है। पर उसे इधर-उधर हिला कर देखा तो साबूत था। मैं अपनी ही चाल चलता हूँ। या तो आगे या पीछे। बीच में चलना अच्छा नहीं लगता। यात्रा आदमी का चरित्र सबसे ज्यादा बतलाती है। [...]
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