इस बार गिर्दा को श्रीनगर में याद किया गया
गिरीश तिवाड़ी ‘गिर्दा’ की दूसरी पुण्यतिथि पर 22 अगस्त को अखिल भारतीय किसान महासभा द्वारा श्रीनगर के नगरपालिका सभागार में एक संगोष्ठी आयोजित की गई। संगोष्ठी के आयोजन के लिये उत्तराखंड लोक वाहिनी, उत्तराखंड महिला मंच, चेतना आन्दोलन, क्रियेटिव उत्तराखंड और पहाड़ द्वारा भी अपनी सहमति दी गई थी। चूँकि गिर्दा एक जुझारू और आन्दोलनों [...]
मेरे लिये वह गिर्दा नहीं, ठसकदार ‘नानू मम्मा’ था
रमेश चन्द्र मिश्र ‘‘न जाने क्यों, होता है ये जिन्दगी के साथ ? अचानक से मन, किसी के जाने के बाद, करे फिर उसकी याद, छोटी-छोटी सी बात, न जाने क्यों?’’ यह संस्मरण लिखते समय यह गीत बार-बार मेरी चेतना को सहला रहा है। अपना बचपन और अपने मामा का तारुण्य याद आ रहा है। [...]
एक अड्डे का पलायन
‘गुल हुई जाती है अफसुर्दा सुलगती हुई शाम। धुल के निकलेगी अभी चश्म ए महताब से रात . . .’ नैनीताल क्लब चौराहा, पाँगर के विशाल पेड़ों के ठीक नीचे बहते गधेरे से सटे व्यावसायिक भवन के अंदरुनी हिस्से का एक छोटा सा कमरा, जिसकी विशालकाय खिड़की से बहते नाले का स्वर रात के सुनसान [...]
अजी वाह ! क्या बात तुम्हारी……
जनकवि गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’ का नाम आते ही जेहन में एक फक्कड़ और बेपरवाह से आदमी की छवि घूम जाती है। गिर्दा से हालांकि मेरी ज्यादा मुलाकातें नहीं हो पाई थीं, लेकिन आठ-दस जो भी मुलाकातें हुई, उसमें हर बार उनको कुछ अलग ही देखा और पाया। आज के चाटुकारिता और चरण वंदना वाले भीषण [...]
‘‘गाँव के स्तर पर संस्कृतिकर्मियों का एक नेटवर्क बनना चाहिये’’
कपिलेश भोज (गतांक से आगे) कपिलेश:- आपने अपने गीत में कहा है- ‘भोट माङणी च्वाख-चुपाड़ा जतुक छन/रात-स्यात सबनै की जेडि़या भै नाल।/उनरै सुकरम त पिड़ै रैईं आज/ आजि जाँणि अघिलि काँ जाँलें पेड़ाल !!’’…मौजूदा दौर में आपको किनसे उम्मीद है ? गिर्दा:- मित्र, रास्ता तो जनसंघर्षों का ही है। अन्ततः तो आपकी आस्था जनसंघर्षों पर [...]
उनके साथ रह कर मेरी समझदारी बहुत बढी़
पूरन चन्द्र तिवारी मैं इंटर में पढ़ता था और मेरे रूम पार्टनर रमेश जोशी व भाष्करानन्द जोशी एम.ए. में। उनसे बातचीत में मालूम पड़ा कि छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष शमशेर सिंह बिष्ट वर्तमान छात्रसंघ के खिलाफ भूख हड़ताल पर बैठे हैं। छात्र संघ स्टार पेपर मिल से अनुदान लेना चाहता था। जबकि बिष्ट पहाड़ [...]
‘‘मेरी काव्य यात्रा में ये सारे संदर्भ आपको साफ दिखायी दे सकते हैं"
कपिलेश भोज यों तो पिछले तीन दशकों में गिर्दा से समय-समय पर समाज, साहित्य, राजनीति और समसामयिक हलचलों पर विस्तृत बात-चीत बहस होती ही रही। बातचीत में उन्होंने जो-जो कहा, वह सब स्मृति में तो बना रहा लेकिन भेंटवार्ता के रूप में मैं कभी उसे व्यवस्थित रूप से दर्ज नहीं कर पाया। कुछ समय पहले [...]
जैंता एक दिन तो आलो
ज़हूर आलम (गिरदा के व्यक्तित्व के अनेक आयाम थे। एक कलाकार, एक आन्दोलनकारी या एक रंगकर्मी। उत्तराखण्ड में नाट्य परम्परा को बनाए रखने में तन, मन और धन से समर्पित वरिष्ठ रंगकर्मी और युगमंच के आधार स्तम्भ जहूर आलम ने गिरदा को अपने ढंग से महसूस करने की जो कोशिश की है, उसे यहाँ हम [...]
विराट व्यक्तित्व के धनी गिर्दा
कुलीन जोशी विश्वास नहीं होता कि गिर्दा नहीं रहे। अपनी तमाम स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों और डॉक्टरों की हिदायतों को नजरंदाज कर जोशोखरोश से लबरेज कविता पाठ करते या गीत गाते गिर्दा को जिन लोगों ने भी देखा और सुना, उन सभी के लिये गिर्दा की मृत्यु की खबर पर विश्वास कर पाना बहुत मुश्किल है। [...]

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