होली बागेश्वर की
बागेश्वर में खड़ी होली का अपना एक अलग ही अंदाज रहा है। बताया जाता है कि यहां बागनाथ मंदिर में पहले शिवरात्रि को रात में खड़ी होली का आयोजन होता था, जिसमें सतराली (सातगांव), ताकुला के होल्यारों का भी आगमन होता था। स्थानीय होल्यारों के साथ रात भर होलियाँ गाई जाती थीं। खड़ी होली गाने [...]
लोक और शास्त्र का अद्भुत समन्वय है होली
विकृत होते सांस्कृतिक परिवेश के बीच जब हम कुमाऊँ अंचल की होली परम्परा की ओर नजर दौड़ाते हैं, तो सुखद आश्चर्य होता है। एक विशुद्ध परम्परा की इस होली गायकी ने यहाँ के लोक जीवन में स्वाभाविक रूप से प्रवेश कर लिया और शास्त्रीयता की जटिलता और प्रारम्भिक ज्ञान के अभाव के बीच जिस तरह [...]
थरूवाटी होली
लाभरिया (शरीर) मेरो भीगे रे साँवरिया मेरो भीगे रे वो छोड़ो आवे मेघ या बाढ़ के आवे मेघ ऐसे किते बदलिया उमड़ी रे राजस्थान से आये महाराणा प्रताप के वशंज कहलाने, वाला, थारू समुदाय में होली पर्व का विशिष्ट स्थान है। उत्तराखंड के भाबर और तराई में बसे इस समुदाय में होली लगभग एक महीना [...]
पौड़ी की होलियों की जान थे दयासागर धस्माना
गढ़ राजवंश के रूप में टिहरी एक समृद्ध सांस्कृतिक केन्द्र के रूप में जाना जाता था। होली सहित अन्य सांस्कृतिक गतिविधियाँ यहाँ से पूरे पहाड़ में फैलीं। अंग्रेजों के आगमन (1815 ई) के पश्चात् श्रीनगर, पौड़ी, रुद्रप्रयाग, दुगड्डा, देवप्रयाग की पहचान भी सांस्कृतिक केन्द्रों के रूप में हुई। इस दौर में सड़क यातायात एवं संचार [...]
होली दमित भावनाओं का रेचन है.. मगर संस्कृति की ठेकेदारी ?
बसंत पंचमी आ गयी थी। इस उपलक्ष्य में कवि सम्मेलन के बाद बौद्धिकों ने आर्थिक मंदी, ग्लोबल वार्मिग का मोर्चा खोल दिया था। एक कविता पर अच्छी चर्चा हुई थी, जिसमें कहा गया था कि चेहरे पीले हो गये हैं, रुमाल पीले हों न हों। एक किसान कवि कह रहे थे, अरे साहब कैसा बसंत, [...]
रंग तो कई हैं पर अपना रंग हल्का
गंगोलीहाट की होली देखने का मौका पहले-पहल मुझे वर्ष 1993 में मिला जब मेरी पहली नियुक्ति इस क्षेत्र में हुई। उस वर्ष उपराड़ा में कवि गुमानी पर एक कार्यक्रम हुआ था जिसमें कुमाऊँ भर से अनेक विद्वान साहित्यकार इतिहासकार व संस्कृतिकर्मी यहाँ एकत्रित हुए थे। एक अच्छी शुरूआत थी परंतु न जाने क्यों आगे नहीं [...]
सरकार की मदद के बगैर भी हर साल खिलते हैं बसन्तोत्सव के रंग
रामनगर में होने वाले वसंतोत्सव में हर साल की तरह प्रदेश के विभिन्न स्थानों से आये लोक कलाकारों ने ऐसा रंग बिखेरा कि पाँच दिनों तक रामनगर उत्तराखंड की लोक संस्कृति में सराबोर हो गया। गौरतलब है कि प्रतिवर्ष कुमाऊँ व गढ़वाल की संस्कृति के संगम माने जाने वाले रामनगर में वसंत पंचमी के अवसर [...]
उत्तरायणी मेला: इस बार मौसम भी रूठा रहा
इस बार बागेश्वर के सरकारी उत्तरायणी मेले के आयोजन को लेकर शुरूआत में प्रशासन असमंजस में फँसा रहा। अन्ततः जैसे- तैसे में ‘मेला समिति’ का गठन हुआ और शासन से दस लाख रुपये आने की भनक पड़ी तो वर्ष भर सोयी रहने वाली नगरपालिका परिषद् भी सक्रिय हो गयी। गली, मुहल्ले, सड़कें, नालियाँ साफ होने [...]
मरोज त्यौहार: यहाँ माघ में भी मांस खाया जाता है
प्रस्तुति : कमलेश ‘कुँवर’ यमुना घाटी के जौनसार भाबर, जौनपुर व रवाँई क्षेत्र में मनाये जाने वाला मरोज या आघ त्यौहार मकर संक्रान्ति से प्रारम्भ होकर पूरे माघ महीने तक चलता है। यहाँ मकर संक्रांति के अगले दिन क्षेत्र के प्रत्येक घर में बकरा काटा जाता है तथा उसके माँस को विभिन्न टुकड़ों में काटकर [...]
जीव जगत से बच्चों का अपनापा जोड़ने का पर्व है घुघुतिया
प्रस्तुति : मोहित सनवाल सांस्कृतिक रूप से बेहद समृद्ध उत्तराखंड के कुमाऊँ अंचल में संक्रान्तियों का विशेष महत्व है। यहाँ गते के अनुसार हर माह के प्रारम्भ को संक्रांत कहा जाता है। लगभग हर संक्रांत को कोई न कोई त्यौहार मनाया जाता है, जैसे चैत संक्रांत में फुलदेई, वैशाख में बिखौती संक्रांत, श्रावण में हरेला, [...]
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