वे उत्तराखण्ड के सवालों से शिद्दत से जुड़े थे
शंकर सिंह भाटिया जब कोई समाज नेताओं द्वारा ठगा जाता है और निहित स्वार्थों के लिए उसका औजार के रूप में उपयोग किया जाता है, तब उस समाज को गुमानी, गौर्दा और गिर्दा जैसे जन कवियों की जरूरत होती है। जो समाज को बता सकें कि वह जिस दिशा में जा रहा है, वह ठीक [...]
पलायन के सवाल को केन्द्र में लाने की कोशिश
प्रस्तुति : जगदीश जोशी युवा कहानीकार दिनेश कर्नाटक का उपन्यास ‘फिर वही सवाल’ जहाँ एक ओर पर्वतीय क्षेत्र की आर्थिक, राजनीतिक एवं सामाजिक विसंगतियों का विश्लेषण करता है वहीं पलायन में ही प्रगति तलाशने की प्रवृत्ति से भी मोहभंग कराता है। कहानी का नायक कमलेश अपने पिता धरम सिंह के ही पदचिन्हों पर चलता है। [...]
सम्पादकीय : जनता सचेत रहे…
मार्च आ गया है। एक और वित्तीय वर्ष समाप्त होने को है। वार्षिक कर्मकाण्ड की तरह करोड़ों रुपये का लेन-देन निपटाया जायेगा। कुछ विभागों का बजट कम पड़ेगा और अधिकांश विभागों को बजट की बची हुई धनराशि वापिस करनी पडेगी जिसका उन्हें मलाल ही होगा। आंकड़ों के हेर-फेर से चीजों को मन चाहा रूप दे [...]
तो ऐसी रही बागेश्वर जनपद की विकास यात्रा
उत्तराखंड राज्य के गठन से पूर्व ही सितंबर 1997 में बागेश्वर जिले की स्थापना हो गई थी। तब से जिले का विकास मंथर गति तथा अनियोजित रूप से हो रहा है। राज्य बनने के बाद आशा की एक किरण दिखाई दी थी, लेकिन सत्ता का सुख भोग रहे नेताओं ने जिले की सुध नहीं ली। [...]
इस बिखराव से निखर भी सकता है उत्तराखण्ड क्रांति दल
उत्तराखंड की भारतीय जनता पार्टी सरकार से उत्तराखंड क्रांति दल द्वारा समर्थन वापस लेना एक स्वागतयोग्य घटना है। हालाँकि यह कदम बहुत देर से उठाया गया और इसके कारण दल के भीतर तनाव भी बहुत हैं। हो सकता है कि इस निर्णय से पार्टी दोफाड़ ही हो जाये। क्योंकि जिन लोगों के होठों पर खून [...]
सम्पादकीय : क्या ऐसा उत्तराखंड जरूरी है ?
उत्तराखंड राज्य की स्थापना को दस साल हो गये हैं। विकास की नीति, भ्रष्टाचार, लूट-खसोट तथा कुशासन के मामले में यह देश के अन्य राज्यों से कतई अलग नहीं रहा है। जनता को बरगलाने के लिये विकास के जो आँकड़े दिये जाने की परम्परा है, उस पर यदि हम विश्वास कर भी लें तो छानबीन [...]
निज भाषा उन्नति अहै , सब उन्नति को मूल
मुख्यधारा के अखबारों में प्रायः घटनायें एक सामान्य ब्यौरे के रूप में होती हैं। उनका विश्लेषण प्रायः नहीं होता। कुछ घटनाओं में उसे सचमुच चटखारे लेने का मौका मिल जाता है, जैसे देहरादून में कार्यरत इंजीनियर राजेश गुलाटी द्वारा अपनी पत्नी अनुपमा की हत्या कर उसके शव को डीप फ्रीजर में रखकर धीरे-धीरे शव के [...]
हाँ, दस साल हो गये हैं राज्य बने
दस साल! दस साल का होने जा रहा है उत्तराखंड इस 9 नवम्बर को। एक बच्चा बचपन पार कर किशोरावस्था में प्रवेश कर रहा है। एक समाज के लिये कितना महत्वपूर्ण पड़ाव है यह ? लेकिन कहीं कोई उत्साह है क्या ? 9 नवम्बर आयेगा….राज्य का स्थापना दिवस। सब कुछ उसी कर्मकांड की तरह होगा। [...]
सम्पादकीय: पहाड़ को पहाड़ जैसा ही बना रहना चाहिये
31 मार्च 2010 को उत्तराखंड सरकार ने एक शासनादेश जारी किया और 28 मई 2010 को उसे रद्द भी कर दिया। ऐसा क्यों ? 31 मार्च को जारी शासनादेश में सरकार ने राज्य में अन्य पिछड़ा वर्ग के स्थायी निवास प्रमाण पत्र के लिये वर्ष 2005 की ‘कट ऑफ डेट’ तय की थी। यह शासनादेश [...]
क्या अब भी नहीं मिलेंगी परिसम्पत्तियाँ
उत्तराखंड को उत्तर प्रदेश से अपनी परिसम्पत्तियाँ मिलने की जो उम्मीदें जगी थीं, वे जल्दी ही धूमिल पड़ गईं। 29 जून को नैनीताल हाइकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में उत्तर प्रदेश को निर्देश दिये कि वह उत्तराखंड की सिंचाई परिसपत्तियां उसे लौटाये। कोर्ट ने उत्तराखंड राज्य गठन से ठीक दो दिन पूर्व 7 नवम्बर 2000 [...]
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