प्रसतुति : ए.बी.उप्रेती
उत्तराखंड के सीमावर्ती क्षेत्र की समस्यायें खुली किताब की तरह हैं। इनका अध्ययन करना उतना जरूरी नहीं है, जितना अहर्निश रड़ते-बगते, दबते-दबाते इन पहाड़ों की संवेदनशीलता की ओर ध्यान देने की जरूरत है। देखने की जरूरत है कि यहाँ के गाँव के गाँव क्यों रीते होते जा रहे हैं। सबकी प्यास बुझाने वाले ये अहर्निश झरते पहाड़ क्यों प्यासे हैं, क्यों नहीं इन्हें आज भी पता कि इन्हें आजाद हुए साठ साल से भी अधिक समय हो गया है और क्यों नहीं पता कि उत्तराखंड राज्य बने दस साल पूरे हो चुके हैं ?क्यों नहीं पहुँचा है वह सर्वांगीण विकास करने वाले राजनीतिबाजों के विकास का हल्का झोंका भी ?
भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता और राज्य सभा सदस्य तरुण विजय का मिलम ग्लेशियर जाना और सीमान्त की नैसर्गिक छटा के दर्शन के लिए जाना समझ में आता है। हिमालय के इस अलौकिक दर्शन के लिए तो देवता भी लालायित रहे हैं। यह बात भी समझ में आती है कि चुनावों के मद्देनजर सीमान्त के मरे-खपे लोगों को भी अपनी ओर खींचा जाए। लेकिन यह बात समझ नहीं आती कि इसी बहाने यह बताने की कोशिश की जाए कि देश की सीमायें असुरक्षित हैं,जवानों के पास आधुनिक हथियारों का अभाव है।
वैसे भी इस अंचल की सीमायें पूरी तरह शांत हैं। नेपाल के साथ तमाम माओवादी घटनाओं के बावजूद भी रोटी-बेटी का सम्बन्ध है और चीन से लगी सीमा से भी किसी विशेष प्रकार की घुसपैठ की बात सामने नहीं आयी है। भारत तिब्बत व्यापार और कैलास-मानसरोवर यात्रा बदस्तूर जारी है। हाँ, यह बात ठीक है कि चीन की तरफ से सड़कों का जाल बिछाया जा रहा है। लेकिन यह बात इस यात्रा के दौरान ही तो पता नहीं चली है और न इस यात्रा के साथ इसकी कोई प्रासंगिकता है। अपनी सीमाओं को मजबूत व सुरक्षित बनाने और चीन की ओर से हो रहे विकास कार्यों की समीक्षा तो रोज ही होती आ रही है।इसके साथ ही अपनी सेना को कमजोर समझ लेना और आम जन के बीच सेना के पास आधुनिक हथियारों की कमी बताना सेना के जवानों और आम लोगों के मनोबल को कम करने के अलावा कुछ नहीं लगता है।
पहाड़ के तमाम संवेदनशील लोग पहाड़ों की चिन्ता पर पोथियों पर पोथियाँ लिख कर थक चुके हैं और कोई भी सरकार ऐसी नहीं है, जिसके सामने उन्होंने अपनी इस चिन्ता को व्यक्त न किया हो। तब तरुण विजय ऐसी कौन सी रिपोर्ट मुनस्यारी से मिलम तक के इस 57 किमी. यात्रा पथ की प्रस्तुत करने जा रहे हैं, जहाँ विशेषकर मानव बस्तियाँ ही नहीं हैं। वे मर्तोली में पहुँच कर कहते हैं कि यहाँ पचास रुपये किलो नमक है। बहुत खूब ! उन्हें आज पता चला। यहाँ तो सब चीज का यही हाल है। और हाँ, उन्हें यह शायद किसी ने नहीं बताया होगा कि यहाँ के पुराने व्यापारी ही सारे पहाड़ों को भेड़ों पर लाद कर नमक उपलब्ध कराया करते थे।
हिमालय की संवेदनशीलता से छेड़छाड़ रोके जाने की गुहार तो रोज ही भूवैज्ञानिक करते आये हैं, तब उसका उपाय उनकी सरकार ने क्या सोचा है ? अलबत्ता इस तरह का शोर राजनीतिबाजों की चोंचलेबाजी और हनक का एक नमूना जरूर कहे जा सकते हैं।