प्रस्तुति : एल. मोहन
उत्तराखंड खबर सार
वैसे तो राज्य की अनेकों पत्र पत्रिकाओं को निकलते हुए दसियों साल पूरे हो गये हैं किन्तु अपने को जनता का रहनुमा कहलाने वाले पत्र न तो जनता तक ही जाते हैं और न उनको पाठकों से कोई मतलब होता है। बहुत कम ही आपने दस साल या बीस साल के लम्बे सोपान को याद करने का साहस कर पाते हैं।
लेकिन बीती 20 जून की सायं को गढ़वाली पाक्षिक पत्र ‘ उत्तराखंड खबर सार’ ने अपने 10 साल पूरा होने पर अपने पाठकों, लेखकों व जनता के बीच जाकर जो समारोह किया वह लम्बे समय तक याद किया जायेगा। गढ़वाली भाषा के उन्नयन को लेकर दस साल से निकल रहे इस पत्र ने जिस सादगी व भव्यता से इसे किया उसकी किसी को उम्मीद नहीं थी। पौड़ी के संस्कृति भवन प्रेक्षागृह में दर्शक व श्रोता इस कार्यक्रम में अन्त तक बने रहे। श्रोताओं ने तीन सत्रों में हुए इस कार्यक्रम के हर सत्र को तन्मयता से सुना व देखा व आनन्द उठाया। इसमें एक विचार गोष्ठी, सांस्कृतिक कार्यक्रम व सबसे प्रमुख भाषाई कवि सम्मेलन रहा। इसमें खबर-सार की दस साल की यात्रा पूरे होने पर एक स्मारिका के साथ खबर सार के विशेष अंक का विमोचन किया गया। इसके अतिरिक्त विद्यादत्त शर्मा की पुस्तक ‘दर्पण’, ओमप्रकाश सेमवाल की गढ़वाली कहानियों, ‘मेरी पुफू’ का विमोचन हुआ। नवगीतकार व गायिका कु. पुष्पा के कैसेट ‘द्वी घड़ी बैठीक’ का विमोचन गीतकार नरेन्द्रसिंह नेगी द्वारा किया गया।
समारोह के प्रारम्भ में खबर सार पत्र के मुख्य संपादक बिमल नेगी ने अखबार की दस साल की यात्रा के बारे में अपनी बात रखते हुए कहा कि लोगों के प्रयास के बावजूद हम अभी तक अपनी भाषा को महत्व नहीं दे पा रहे हैं। आज यूनेस्को हमें अवगत करा रहा है कि हमारी लोकभाषायें खतरे में हैं, जब कि हमें स्वयं इसका अहसास होना चाहिये था। खबर सार के संपादक त्रिभुवन उनियाल ने कहा कि पत्र की दस साल यात्रा में अनेक लेखकों को मंच प्रदान किया जिनका आज भी इससे अटूट नाता बना है।
एक समाचार खबर सार से
संस्कृति भवन प्रेक्षागृह में गोष्ठी में गढ़वाली भाषा के भविष्य विषय पर मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए गढ़वाली भाषा के विद्वान और मूर्धन्य साहित्यकार भगवती प्रसाद नौटियाल ने कहा कि हर भाषा का अपना ही आनन्द है। किसी भी साहित्य के रसास्वादन के लिये उस परिवेश की भाषा की जानकारी होना आवश्यक है। मसलन आज कई विद्वानों की दूसरी भाषाओं की कृतियां तो हम पढ़ते हैं किन्तु उनमें मौलिकता नहीं होती है। इसलिये शरत साहित्य का वास्तविक मर्म तक जाने के लिये कई लोगों ने बंगला सीखी। उन्होंने कहा कि आज हर प्रान्त का आदमी अपनी भाषा में बात करता है किन्तु गढ़वाली अपनी भाषा में बात करना अपनी तौहीन समझता है। अच्छा हो कि हम लोग आगामी 2011 की जनगणना के समय अपनी भाषा को गढ़वाली दर्ज करें ताकि इसे संविधान की आठवीं अनुसूची में लाने के लिये दबाव बनाया जा सके। गढ़वाली में लिखने वाले लोग जब तक लिखते रहेंगे तब तक यह भाषा भी आगे बढ़ती रहेगी। कार्यक्रम कि अध्यक्षता करते हुए पुराविद् डॉ. यशवन्त सिंह कठोच ने कहा कि गढ़वाल महासभा द्वारा जो गढ़वाली-हिन्दी का शब्द कोश तैयार हो रहा है उसमें प्रचलित शब्दों के साथ उन पुराने शब्दों, जिनका आज प्रचलन नहीं रहा को भी शामिल किया जाना चाहिये।
तीसरे सत्र में हुए गढ़वाली कवि सम्मेलन को लम्बे समय तक याद किया जायेगा जिसमें गढ़वाली के शीर्ष कवियों ने भिन्न-भिन्न शैली में लिखी कविताओं से श्रोताओं का सरोबार किया। इनमें लोकगायक नरेन्द्र सिंह नेगी, नागेन्द्र नीलाम्बरम, बीना बैंजवाल, जयपालसिंह रावत, ललित केशवान, कु पुष्पा, श्रीमती नीता कुकरेती, सतीश बलोदी के अलावा संचालक द्वय गणेश खुगशाल गणी एवं वीरेन्द्र पँवार आदि ने अपनी कविताओं का वाचन किया। आंचलिक बोली में इतनी विविधिता को सुनकर श्रोता बाग-बाग हो गये। कार्यक्रम में गिरीश तिवारी ‘गिरदा’ की कमी अवश्य खल रही थी।
‘Uttarakhand Khabarsaar’ Garhwali bhasha ki jo sewa kar raha hai, uske liye ise hamesha yaad kiya jayega….aaj hamari bhashayein Garhwali aur Kumaoni lupt hoti ja rahi hain….ya sirf geeton tak seemit ho gayi hain…inhe bachaana hai to inmey adhik se adik sahitya srijan karna hoga…aur bahut saari patra-patrikayein-posters-calenders etc prakaashan bhi hona chahiye….bahut achha laga ye padhkar ki aaj bhi hamari apni Matrabhasha ko bachaney k liye prayaas kiye jaa rahe hain….
khabarsar se purana rista tha lekin kuch saalon se bichhd sa gaya hu, pardesh me jo aa gaya hu, aaj jabki moble and internet technology high updated hai, uttarakhan khabarsar ko bhi pure himalay me hi nahi balki sahrii pathko tak bhi pahuchna chahi tha,karan kya hai? pata nahi. dhad and uttarakhan khabarsar hame fir paharon ki taazi hawa or apnepan se rubaru karaye… is ummed me subhechhu… suraj pal “mani” delhi.