जोशीमठ विकासखंड स्थित करीब 125 परिवारों वाले चाँई गाँव में हो रहे भू-धँसाव से 400 मेगावाट क्षमता की विष्णुप्रयाग जल विद्युत परियोजना पर फिर सवाल उठने लगे हैं। उत्तराखंड सरकार ने वाडिया हिमालयन भूगर्भ संस्थान के वैज्ञानिकों के अलावा भारतीय भूगर्भ संस्थान (जी.एस.आई.) और आपदा न्यूनीकरण एवं प्रबंधन केन्द्र के विशेषज्ञों को चाँईं गाँव में हो रहे भू-धँसाव की जाँच-पड़ताल करने भेज दिया है। प्रभावित गाँव के बाशिंदों के अन्यत्र रहने की व्यवस्था करने के निर्देश भी शासन द्वारा जिलाधिकारी चमोली को दिये गये हैं।
चाँई गाँव विष्णुप्रयाग जल विद्युत परियोजना के पावर हाऊस के ठीक ऊपर बसा है। परियोजना निर्माण के दौर से ही ग्रामीण खतरे की आशंका से अपनी सुरक्षा को लेकर आवाज उठाने लगे थे। तब शासन-प्रशासन बहरा हो गया था, लेकिन अब जब वास्तविक खतरा ग्रामीणों के ऊपर मँडराने लगा तो जिला प्रशासन के साथ ही राज्य सरकार भी हरकत में आ गया। लगातार हो रहे भूस्खलन में मकान धँसने के कारण चार परिवार पहले ही गाँव छोड़ चुके हैं। 33 अन्य मकानों में दरारें पड़ जाने से वे रहने योग्य नहीं रह गये हैं। जिला प्रशासन के अनुसार चाँईं गाँव के निचले हिस्से में जमीन धँस रही है, जिससे पूरे गाँव को खतरा उत्पन्न हो गया है। जोशीमठ नगर स्थित रेलवे आरक्षण केन्द्र में शिविर की व्यवस्था की गयी है, किन्तु खबर लिखे जाने तक वहाँ रहने कोई भी परिवार नहीं गया था। ग्राम प्रधान प्रताप लाल द्वारा जिला प्रशासन को ज्ञापन सौंपकर ग्रामीणों के विस्थापन की माँग की गई है। उनका कहना है भूस्खलन के कारण घर तो टूट ही रहे हैं, साथ ही इस परियोजना की विद्युत लाईन के तार खेतों में झूलने से खड़ी फसल कटने से रह गई है।
ग्रामीणों का कहना है विष्णुप्रयाग जल विद्युत परियोजना की 12 किमी. लम्बी सुरंग से पानी रिसने के कारण गाँव धँस रहा है। लेकिन परियोजना का संचालन कर रही जयप्रकाश एसोसिएट्स के प्रशासनिक अधिकारी ब्रिगेडियर रणवीर सिंह पानी के रिसाव की आशंका को नकारते हैं। ग्रामीणों का यह भी कहना है कि गाँव के 100 मी. नीचे जमीन के अंदर पहाड़ काटकर 6 मंजिला पावर हाउस बनाया गया है। पहाड़ के अंदर इतनी बड़ी इमारत बनाने के लिये भारी विस्फोटकों का प्रयोग किया गया था, जिनसे कैम्प के आसपास का पहाड़ी हिस्सा कमजोर हो गया। इस परियोजना की बिजली को मुजफ्फरनगर में उत्तरी ग्रिड में मिलाने के लिये बनाई गई ट्रांसमिशन लाइन के 6 टावर चाँई गाँव के आसपास हैं। इनमें से टावर संख्या 3 भी भूस्खलन की चपेट में है। जानकारों के अनुसार यह खतरा चाँई गाँव के अलावा पूरी विद्युत परियोजना के लिये बन गया है।
फिलहाल चाँई गाँव में हो रहे भूस्खलन से राज्य सरकार हरकत में तो आ गई है, पर क्या इस घटना से वह शेष निर्माणाधीन विद्युत परियोजनाओं से भविष्य में होने वाले खतरों पर विचार भी करेगी ? जगह-जगह इन परियोजनाओं के विरोध में मुखर ग्रामीणों की व्यथा सुनेगी और उनको उजड़ने से बचायेगी ?