उत्तराखण्ड आन्दोलन की पृष्ठभूमि पर आधारित उपन्यास यमुना से चर्चित त्रेपनसिंह चौहान का नया कहानी संग्रह यश पब्लिकेशन से 2009 में आया है- दरवाजे के पीछे। सामन्ती शासन के तले कराहती टिहरी पर प्रख्यात कथाकार विद्यासागर नौटियाल निरन्तर लिखते रहे। त्रेपनसिंह चौहान लोकतंत्र के हाथों उजड़ती टिहरी की व्यथा-कथा लिख रहे हैं। बीसवीं सदी की शुरूआत में उत्तराखण्ड में ब्रिटिश हुकूमत की स्थापना के साथ टिहरी नगर बसाया गया और इक्कीसवीं सदी के लगते-लगते जल-समाधि लेने को मजबूर हुआ। राज्य बनने के बाद भी उत्तराखण्ड में कई समस्याएँ, जिन्हें त्रेपन ने बड़े ही मार्मिक ढंग से उठाया है।
अतीत के सरोवर में, मेरा भी कोई होता, भात की भीख, वे भी चले गये, प्लॉट इस संग्रह की आदि ऐसी ही कहानियाँ हैं, जो विस्थापन, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, मुआवजा, रिश्तों में आई खटास, अपने डूबते गाँवों के प्रति मोह आदि को छूती हैं। टिहरी बाँध के बनने से मानवीय मूल्यों में आई गिरावट भी यहाँ देखी जा सकती है। कह सकते हैं कि विकास के प्रतीक टिहरी बाँध की अन्तर्कथाओं को ये कहानियाँ सुनाती हैं। वहाँ पिता की मृत्यु की कामना कर रहे पुत्र हैं जो सोचते हैं कि पिता के मरने से उन्हें एक की जगह तीन प्लॉट मिल जायेंगे (प्लॉट)। सुबधा है जो डूबती हुई टिहरी में अपना अतीत खोज रही है (अतीत के सरोवर में) और विक्षिप्त स्थिति में पहुँचा हुआ रुक्मू प्रसाद उर्फ रुक्मू झल्ला है, जो कभी रोता है तो कभी हँसता है (वे भी चले गये)।
हर छोटी-बड़ी योजना की तरह टिहरी बाँध परियोजना भी बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार का सबब बनी। एकाकी सुशीला का देवर जमीन का मुआवजा लेकर गाँव छोड़कर चला गया है। मकान का मुआवजा लेने की कोशिश में वह जूनियर इंजीनियर को अपने बचे-खुचे गहने दे डालती है पर उसके हाथ कुछ नहीं लगता। उसके जेहन में यही सवाल अटका रह जाता है कि जब उसका मृत पति स्वर्ग से आकर मुआवजा ले सकता है तो उस जीविता को क्यों नहीं मिल सकता (मेरा भी कोई होता)। संकट की स्थितियों में मानवीय मूल्यों का भी ह्रास होता है। टिहरी जब डूब रही थी सब आपाधापी में थे। उनके पास किसी के दुःख को सुनने का समय नहीं था। उनका अपना दुःख ही इतना भारी था कि दूसरे का दुःख छोटा ही लगता। ऐसी तमाम घटनाएँ हैं, जिन्हें ये कहानियाँ आने वाली पीढ़ियों को बताने में समर्थ होंगी। लम्बी कहानियों के इस दौर में एक दो को छोड़कर इस संग्रह की बाकी कहानियाँ आकार में छोटी होने के बावजूद असर पैदा करती हैं।
बन्या, एक बाप का पैदा होना, कुकुर गति ऐसी ही कहानियाँ हैं, जिनके अन्त में एक उम्मीद भी पैदा की गई है। पहाड़ से रोजगार की तलाश में मुम्बई पहुँचे युवा हनुमान चाल की 10 गुणा 10 की सीलन भरी खोली में रहते हैं। उनके कन्धों पर कई जिन्दगियों को चलाने का भार है जो उनसे सैकड़ों किमी दूर किसी न किसी गाँव में हैं। जिनका परिवार घरों में पल रहा है, वे बच्चों से मिलनेवाली खुशी से वंचित रह जाते हैं। भानु जब अपनी तीसरी सन्तान को बढ़ते हुए देखता है तब उसके भीतर एक बाप जन्म लेता है (एक बाप का पैदा होना)। भानु तब निश्चय करता है कि वह अपने गाँव लौटेगा। वह सोचता है, गाँव में रहकर भी भूख के खिलाफ लड़ा जा सकता है। 1991 के भूकम्प में अपने परिवार को खो चुका जामुकी गाँव का बन्या कैसे दिल्ली की झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले ड्राइवर करतार सिंह के परिवार का सदस्य बन जाता है, इस बात को बताने वाली कहानी बन्या मनुष्य-मनुष्य के बीच रिश्ते जुड़ने की कहानी है। अपने अपने स्वर्ग में चाँदू गाय और भुर्या गाय के बहाने आज के शहरी जीवन की विडम्बनाओं को दर्शाया गया है।
कुछ कहानियाँ ऐसी भी हैं जिनका कथ्य कई बार दोहराया जा चुका है। जैसे-दरवाजे के पीछे, बड़ा भाई, ठूँठ आदि जिनमें भ्रष्टाचार, परिवार के लिए बड़े भाई का कर्तव्यपालन, बेटे-बहू द्वारा वृद्ध पिता की उपेक्षा जैसी बातें कही गई हैं। कुछ कहानियों के शीर्षक उनके कथ्य को कमजोर बना दे रहे हैं, जैसे मेरा भी कोई होता।
ये सभी कथानकों वाली कहानियाँ हैं जिनमें कि घटनाक्रम हैं या कह सकते हैं कि परिस्थितिजन्य कहानियाँ हैं जो अपने समाज और परिवेष को समझने के लिए हैं- एक खास तरह का समाज और उसका परिवेश। पहाड़ का जीवन इनके मूल में है। भाषा में उस समाज को पकड़ने में लेखक को कहीं भी दिक्कत नहीं हुई है। इन कहानियों में लोग जिस भाषा का व्यवहार कर रहे हैं, उसमें वे बिल्कुल भी अजनबी नहीं प्रतीत होते। वे अपने गाँव-घर के बीच चलते-फिरते, बोलते-बतियाते दिखाई देते हैं। कहीं भी उनके व्यवहार में बनावटीपन नहीं आने पाया है। कुल मिलाकर कह सकते हैं कि ये कहानियाँ लेखक की संभावनाओं की ओर संकेत करती हैं।
























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