बची राम कौंसवाल
भाजपा से जीत कर अपनी सीट छोड़ कर बहुगुणा के लिये रास्ता बना देने वाले विधायक किरण मंडल से बंगाली समुदाय के लोग पूछते हैं-‘‘कहाँ गया था?’’ जवाब होता है, ‘‘कहीं नहीं।’’ ‘‘क्या लाया?’’ ‘‘कुछ नहीं।’’ फिर भी अफवाहें हैं कि दस करोड़ रुपये का खेल रहा। बहरहाल इस संदर्भ में उत्तराखण्ड सरकार द्वारा पट्टेधारकों की भूमि पर भूमिधरी दिये जाने के लिए एक विवादास्पद शासनादेश तो जारी कर ही दिया गया है।
विभाजन के बाद पूर्वी बंगाल से आये विस्थापितों को तराई में गवर्नमेंट ग्रान्ट एक्ट-1895 के अन्तर्गत कृषि भूमि के पट्टे दिये गये थे। पट्टों की भूमि का सुधार तथा समुचित प्रबंध का कार्य राज्य सरकार के सुपुर्द था। तत्कालीन अधिकारियों ने अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी नहीं कीं। खासकर बाढ़ सुरक्षा का ठोस इंतजाम न किये जाने से निर्धन किसानों की सालोंसाल की मेहनत बाढ़ चौपट करती रही। संस्थागत ऋणों के अभाव में किसान सूदखोरों के शिकंजे में फँस गये। उनकी आजीविका तथा जीवन जीने की समस्याओं का फायदा उठाने के लिए पैसे वालों ने निर्मम व अमानवीय तरीके से उनकी जमीनों की लूट की। बाद के दिनों में वे भूमि वापस करने में बेईमानी करने लगे तो दोनों पक्षों में खूनी संघर्ष बढ़े। तत्कालीन राज्य सरकारों ने हस्तक्षेप भी किये, लेकिन शासन ने अपने वर्ग चरित्र के अनुरूप सूदखोरों की लूट को जारी रखने दिया। अब बहुगुणा सरकार द्वारा 30 मई 2012 को जारी शासनादेश में भी कुछ शर्तों के साथ भूमिधरी देने के निहितार्थ में शासक-शोषक वर्ग के स्वार्थ ही सर्वोपरि लगते हैं। गवर्नमेंट ग्रान्ट एक्ट 1895 के तहत पूरे राज्य में अस्सी हजार से अधिक पट्टों की लाखों एकड़ जमीन पर भू माफिया, रियल स्टेट के कारोबारियों, गरीब किसानों की भूमि हड़पने वाले सूदखोर महाजन व अन्य उद्योगपति कारपोरेट घरानों की नजरें गड़ी हैं। वे चाहते हैं कि पट्टों की भूमि भूमिधरी में आकर संक्रमणीय हो जाये। इस शासनादेश के बाद लाखों एकड़ भूमि भूराजस्व के सामान्य नियमों के अनुकूल भूमिधरी में तब्दील होकर विधिक रूप से क्रय-विक्रय के लिए अनुमन्य हो जायेगी।
मगर सितारगंज विधानसभा क्षेत्र के अन्तर्गत शक्तिफार्म के जिन एक दर्जन से अधिक विस्थापितों के गाँवों से मुख्यमंत्री ‘वोट’ हासिल करना चाहते हैं, वहाँ के बंगालियों से औने-पौने दामों पर दबंग सूदखोर महाजनों द्वारा लूटी गई भूमि को कब्जामुक्त कर वास्तविक पट्टाधारक को वापस दिलवाने का कोई प्रावधान तो शासनादेश में दिखाई नहीं देता! इतना ही है कि इसका पाठ अप्रत्यक्ष रूप से भू अभिलेखों में की गई गैर कानूनी छेड़छाड़ को रद्द कर पट्टा मूल स्वरूप में बहाल करने का संकेत देता है। अर्थात् पट्टाधारक की भूमि का वह रकबा जो वर्ग 20 में लेकर भू अभिलेख व पट्टे में अंकित किया गया था पूरी तरह निरस्त समझा जा सकता है। किन्तु भूमि पर सूदखोर के भौतिक कब्जे को खत्म कैसे किया जायेगा, इस पर राजाज्ञा चुप है। कुल मिला कर पट्टाधारक बनाम सूदखोर का संघर्ष कायम है। इसे राजस्व विभाग अथवा जिला प्रशासन की इच्छा-शक्ति से ही खत्म किया जा सकता है।
यह भूमि विवाद 1972-73 में राजस्व विभाग की मिलीभगत से खतरनाक मोड़ पर पहुँच गया था। तब उ. प्र. सरकार ने 19 मई, 1973 को राजाज्ञा जारी कर जिला प्रशासन को निर्देश देकर पट्टों की भूमि के अन्तरण को समाप्त कर उनकी हिफाजत बनाये रखने को कहा था। इस शासनादेश में स्पष्ट किया गया था कि-
‘‘पट्टेदार, दी गई भूमि को न शिकमी उठा सकता है और न हस्तांतरित कर सकता है, क्योंकि यह भूमि बंगाली विस्थापितों को आजीविका का साधन उपलब्ध कराने के लिए दी गई थी। कतिपय पट्टाधारकों ने यदि देय लगान का दस या बीस गुना धन जमा करके भूमिधर की हैसियत से अन्तरण किया भी है तो ऐसा अन्तरण अवैधानिक है।’’
क्या बहुगुणा सरकार की ताजा राजाज्ञा पर उपर्युक्त राजाज्ञा अड़चन पैदा नहीं करती ? यदि नहीं करती तो उसका उल्लेख क्यों नहीं है ? 1967 में भी नैनीताल के जिलाधिकारी को निर्देशित किया था कि -
‘‘विधिक प्रावधानों के अनुसार उक्त भूमि पर क्रय-विक्रय का अधिकार प्राप्त नहीं है तथा इस आधार पर मुख्तारनामा /इकरारनामा या रजिस्ट्री बैनामा का कोई औचित्य नहीं है तथा आबंटित परिवारों के सदस्यों के अतिरिक्त अन्य किसी व्यक्ति का आबंटित भूमि पर कब्जा नियम के विरुद्ध है।’’
उत्तराखंड की किसान सभा जरूरी समझती है कि राज्य सरकार लम्बे समय से लटके हुए इस भूमि विवाद को तुरन्त समाप्त करने के लिये शासनादेश में यथोचित संशोधन करे ताकि बंगाली विस्थापितों की आबंटित पट्टों की भूमि का कुल रकबा पट्टाधारक को बहाल हो।