’आधुनिक दौर में रंगमंच की प्रासंगिकता’ विषय पर गोष्ठी के साथ ‘शैलनट’ रुद्रपुर की एक माह की नाट्य कार्यशाला का जनता इण्टर कालेज, रुद्रपुर में उद्घाटन हुआ। इस अवसर पर रुद्रपुर महाविद्यालय के प्राध्यापक डॉ. सुभाष वर्मा ने कहा कि जीवन में रंगमंच तो हर वक्त मौजूद है। इसलिए यह विधा हमेशा प्रासंगिक है। हल्द्वानी शैलनट के अध्यक्ष राजीव शर्मा ने बताया कि शैलनट ने अभी तक दस कार्यशालायें लगायी हैं और चौदह नाटकों की प्रस्तुति दी है।
गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहीं नगरपालिका की अध्यक्ष मीना शर्मा ने भारतीय मूल्यों पर व संस्कृति को बचाने के लिये रंगमंच की जरूरत जताई। उनके पति अनिल शर्मा, जो विगत तीस सालों से रुद्रपुर की रामलीला से जुड़े हैं और स्वयं भी राम का पात्र अभिनीत कर चुके हैं, ने कहा कि रंगमंच हमें पहचान देता है। कार्यशाला निदेशक, भारतीय नाट्य अकादमी के स्नातक डॉ. अभिजीत मंडल ने आशा व्यक्त की कि वर्कशाप में आये लोग एक माह बाद अपने में बड़ा बदलाव महसूस करेंगे। सिनेमा से लेकर टीवी में जो भी है, वह थियेटर का ही रूप है। थियेटर कला का पूरा माध्यम है। यहाँ नृत्य, गायन, अभिनय, लेखन, पेंटिंग, लाइट सब कुछ है। इतनी पूर्णविधा और कोई नहीं।
गोष्ठी के मुख्य वक्ता प्रो. प्रभात उप्रेती ने कहा कि भरत मुनि ने नाटक का उद्देश्य मनोरंजन और आनन्द बतलाया। इसलिए आनन्द और उसमें जो बाधक है, उसके लिए संघर्ष जरूरी हैं। आज आनन्द पर गहरी चोट है। थियेटर इसके लिए कुछ कर सकता है। आज के भ्रष्टाचार, वैश्वीकरण और अमेरिकीकरण में नाटक की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है। इप्टा ने वामपंथियों को अच्छी मदद दी। उत्तराखंड आंदोलन में विभिन्न थियेटरों की प्रस्तुति ने अच्छा काम किया। शैलनट, जिसे एनएसडीयन रंगकर्मी श्रीश डोभाल ने उत्तरकाशी से प्रारम्भ किया, ने उत्तराखंड में जन- जागरण का काम किया। मुख्य अतिथि जनता इण्टर कालेज के अध्यक्ष पवन अगुवा ने उम्मीद जाहिर की कि इस थियेटर जैसी विधा से इस कंकरीट के जंगल में कुछ तो उठेगा। अंत में कार्यशाला के संयोजक डॉ. डी.एन. भट्ट ने धन्यवाद देते हुए कहा कि रंगमंच एक जनून होता है। इसे हर कोई नही निभा सकता। लेकिन दर्शकों की शाबासी से महसूस होता है कि हमारा जनून सार्थक रहा। गोष्ठी में खेमकरण सुमन, हेम पंत, शंकर मेहरा, ज्योति गांधी, अहिल्या मिश्रा, सरस्वती आदि भी शामिल हुए। संचालन युवा पत्रकार रूपेश कुमार सिंह ने किया।