रामनगर नदी बचाओ सम्मेलन
उत्तराखंड आन्दोलन जन-आकांक्षाओं के विपरीत जा रहे विकास-आयोजन एवं नीतियों के प्रति लगभग पाँच दशकों के अनवरत मोहभंग का परिणाम था। वह विरोध में उठा आम आदमी का सिंहनाद था- नकार का सिंहनाद। नकार के उस सिंहनाद ने उत्तराखंड राज्य के मामले में सामाजिक, आर्थिक, पारिस्थितिकीय, सांस्कृतिक, राजनैतिक आदि-आदि तमाम आयामों में एक नई दिशा, नई शुरूआत एवं भिन्न दृष्टि के साथ आर्थिक- सामाजिक लक्ष्यों को पुनः परिभाषित किये जाने, राजनीति व अर्थतंत्र पर निजी स्वार्थों की पकड़ को उत्तरोत्तर कमजोर करने एवं राजनैतिक- आर्थिक सत्ता के पुनर्वितरण द्वारा एक विशिष्ट जनोन्मुखी तंत्र की स्थापना का सपना संजोया था।
सपना बड़ा जरूर था, किन्तु यह समझ साथ में थी कि आर्थिक विकास की मौजूदा भ्रामक धारणाओं एवं उत्तर प्रदेश की आर्थिक- राजनैतिक कुसंस्कृति से मुक्ति पाते हुए धीमे, किन्तु सधे कदमों से बढ़ा जायेगा और जनोन्मुखी उत्तराखंड का सपना पूरा होगा। किन्तु स्थापना के सात सालों, तीन राजनैतिक दलों की चार-चार सरकारों के बाद भी आज उत्तराखंड किसी भी स्तर पर उस राजनैतिक- आर्थिक कुसंस्कृति से तो स्वयं को मुक्त नहीं ही पाता, उल्टे उत्तराखंडी समाज के एक बड़े हिस्से के जीवन पर आसन्न संकट की स्थितियाँ हैं।
इन सात सालों में तमाम सरकारी बकवास के बावजूद विकास मानक अपने पुराने दृष्टिकोण के साथ मौजूद रहे, विकास को धन व्यय करने (एवं कमाने) का तरीका ही माना जाता रहा, उत्तराखंड की विशिष्ट भौगोलिक- पारिस्थिकीय- संसाधन परिस्थिति के विपरीत लक्ष्य निर्धारित किये गये, परियोजनायें बनाई गयीं और समग्र उत्तराखंड की विकास नीति बिजली बेचेंगे, पर्यटन बेचेंगे पर केन्द्रित रही। इस सरकारी उत्तराखंड में विकास का नगरीय पूर्वाग्रह पूरी शिद्दत के साथ मौजूद है – जो धनराशि ग्रामीण समुदाय की मूलभूत जरूरतों, कृषि विकास, कार्यकारी शक्ति के पलायन को रोकने एवं युवा बेरोजगारी को कमतर करने पर लगायी जानी चाहिये थी, वह सड़कों को तीव्रगामी बनाने के लिये ‘हॉटमिक्स’ पर लगायी जाती रही है। 15 हजार से अधिक गाँवों एवं मात्र 60-70 नगरों/ कस्बों के उत्तराखंड में विकास प्राथमिकतायें ग्रामीण आवश्यकताओं के पक्ष में नहीं रही हैं। 20 लाख बेरोजगारों वाले उत्तराखंड में रोजगार के प्रति कोई चिन्तन नहीं है।
उत्तराखंड की तमाम समस्याओं का जैसे एकमात्र समाधान स्वीकारते हुए सरकारों ने बिजली बनाने एवं बेचने, तदनुसार उत्तराखंड को ऊर्जा प्रदेश बनाने का ठेका ले लिया है। जिस तरह सरकारों के लिये विकास का अर्थ रहा है कि कितनी ज्यादा धनराशि कहाँ- कहाँ से प्राप्त कर लगातार योजनाओं/ परियोजनाओं द्वारा अर्थव्यवस्था में पंप की जा सके, वैसे ही ऊर्जा प्रदेश का मतलब हो गया कि किसी भी तरह तत्काल अधिकाधिक बिजली का उत्पादन। चूँकि सब तत्काल चाहिये, अतः राज्य की भौगोलिक स्थिति, स्थलाकृति, भौतिक संरचना, पारिस्थितिकी- पर्यावरण, जलवायु, संस्कृति, स्थानीय आर्थिकी एवं सर्वोपरि जीवन गौण हो गया।
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सम्मेलन में पारित प्रस्ताव व कार्यक्रम 1. जल, जंगल, जमीन को बचाने और संवर्द्धित करने का पुरुषार्थ ग्रामीण इस तरह करें, ताकि उन्हें अपनी प्राकृतिक संपत्तियों पर अधिकार व प्रबंधन भाव आये। 2. भागीरथी, अलकनन्दा, सरयू और मंदाकिनी जैसी जिन नदियों पर जल विद्युत परियोजनाओं के खिलाफ आन्दोलन चल रहे हैं, वहाँ उत्तराखंड और देश भर के साथियों के साथ मिल जुलकर पदयात्रायें की जायेंगी। 3. नदियों, जंगलों और जल स्रोतों, जमीन तथा अन्य मानवाधिकारों के बारे में एक निश्चित तिथि को पूरे उत्तराखंड में ग्राम, ब्लॉक, जिला स्तर पर जनता द्वारा सरकार को ज्ञापन दिया जायेगा। 4. विभिन्न बाँधों के बारे में स्पष्ट, सही व गहरी जानकारी के लिये जन सुनवाई आयोजित की जायेंगी। 5. एक प्रतिनिधिमंडल मुख्यमंत्री के पास इस पूरे अभियान के मुद्दों व जन समुदाय के जनादेशों को लेकर जायेगा। 6. नदी महोत्सव के लिये एक तिथि घोषित कर सर्वत्र नदियों की सफाई की जायेगी। 7. नदियों में जहाँ-तहाँ से रोड़ी, बजरी व पत्थरों का व्यवसायीकरण न किया जाये। 8. उत्तराखंड की सारी पर्वत चोटियाँ चौड़ी पत्ती वाले जंगलों, याने बाँज से आच्छादित की जायें। 9. हर प्रकार के जल, जंगल संरक्षण, संवर्द्धन व अन्य विकास का नियोजन ग्रामवासी करें और उसके क्रियान्वयन में उनको रोजगार व नेतृत्व मिले। 10. महिला दिवस पर पूरे प्रदेश में महिलाओं के साथ बाँध के विरोध एवं नदियों के जल प्रवाह को बनाये रखने और बढ़ाने की बात हो। |
बिजली बनाने और पानी को रुपये में बदलने के इस खेल में तमाम लघु जल विद्युत परियोजनाओं को अलग रखते हुए 200 से अधिक मध्यम एवं बड़ी परियोजनायें निर्माणाधीन एवं प्रस्तावित हैं। इन परियोजनाओं के लिये अपनायी जा रही सुरंग-बाँधों की तकनीक ने गाँवों के अस्तित्व को खतरे में डाला है- ध्वंस का सिलसिला शुरू हो गया है। विष्णुप्रयाग परियोजना के तहत बनाई जा रही सुरंग से ध्वस्त हो गया ‘चाईं’ गाँव इस विध्वंस का प्रतीक है। सरकार/ राज्य एवं योजनाकारों के स्तर पर जिन परियोजनाओं को राज्य की समृद्धि का आधार बताया जा रहा है, जनता उनमें अपने जीवन की समाप्ति का सूत्र देख रही है। रुचिकर यह जानना है कि पानी- बिजली बेचने की सरकारी मानसिकता का मूल पानी उत्तराखंड में घट रहा है। नदियों का जल प्रवाह घटा है- नदियाँ सूख रही हैं। कारण अदूरदर्शी सरकारी नीतियों के अतिरिक्त उत्तराखंड की बदलती जीवन शैली या कहीं भी खोजे जायें जल प्रवाह के घटने को लेकर मतभेद नहीं है। पेयजल को लेकर समुदाय के बीच कलह की स्थितियाँ पूरे देश की तरह उत्तराखंड में भी सामान्य हैं। गैर हिमानी नदियों का पारिस्थितिकी तंत्र संसाधनों के अनियंत्रित दोहन के कारण क्षरित हुआ है। सूखते नौलों- धारों ने शुरूआती संकेत दिये…. गधेरों के घटते जल ने खतरे का सायरन भी बजाया, किन्तु धरती की कोख के जल की कमी की चिन्ता नहीं की गई और आज उत्तराखंडी समाज की जीवन रेखायें, नदियाँ, सूख रही हैं। हिमानी नदियों पर राज्य की गलत दोहन- नीतियों के साथ जलवायु परिवर्तन एवं ग्लोबल वार्मिंग का अतिरिक्त दबाव है।
समग्रतः इस पर्वतीय भूभाग में जीवन पर संकट है, जीविका खतरे में है और नदी-घाटियों के ग्रामीण जनजीवन पर आसन्न संकट है। उत्तराखंड के नदी- घाटी जनजीवन/ सभ्यता/संस्कृति पर यह आसन्न संकट वर्तमान में सरकारी प्राथमिकताओं में नहीं है- राज्य लोक के खिलाफ खड़ा दिखाई देता है। राजतंत्र के दौर तक में जिस जल पर समुदाय का अधिकार बना रहा, परम्परायें जिस संसाधन के समुदायीकरण की रहीं, वह जल (जंगल और जमीन) मौजूदा शासन- व्यवस्था में राज्य की सम्पत्ति हो गया। जनतंत्र में सबसे पहले जनोन्मुखी तंत्र को विस्थापित बनाया गया। परिणामतः आज के उत्तराखंड के सरकारी सोच और उत्तराखंडी समाज के हित आमने- सामने खड़े हैं।
इतिहास गवाह है कि लोक और सत्ता जब भी आमने- सामने खड़े हुए हैं, लोक मुखर हुआ है और सत्ता की जन विरोधी सोच एवं नीतियों के प्रतिकार हेतु सन्नद्ध हुआ है। उत्तराखंड राज्य ऐसी ही परिस्थिति का परिणाम था। आज फिर वैसी ही कठिन परिस्थिति है। परिणामतः जन सरोकारों से सम्बन्धित संगठनों, व्यक्तियों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं के नेतृत्व में जन आंदोलनों की इस धरती से ‘नदी बचाओ वर्ष: 2008’ की लोक घोषणा के अन्तर्गत नदी बचाओ अभियानों का सूत्रपात हुआ है। 1 से 15 जनवरी तक उत्तराखंड की पन्द्रह नदियों एवं गाड़- गधेरों में पदयात्रायें हुई हैं। तटवर्ती ग्रामीण समुदायों से गहन सम्पर्क एवं संवाद स्थापित हुआ है। लोगों तक जनविरोधी सरकारी सोच एवं समुदाय पर मौजूद संकट की वास्तविकता को ले जाने का यह सिलसिला, जिसे अभी वर्ष भर जारी रहना है, ‘कोसी नदी बचाओ अभियान’ के स्वाभाविक पारायण स्थल रामनगर में 16 तथा 17 जनवरी 2008 को नदी बचाओ सम्मेलन के रूप में सामने आया।
पहले दिन जनकवि गिर्दा के गीतों से सम्मेलन की शुरूआत हुई। अपने आधार वक्तव्य में ‘कोसी बचाओ अभियान’ का नेतृत्व कर रहीं, गांधी शांति प्रतिष्ठान की अध्यक्ष सुश्री राधा बहन ने सम्मेलन को ‘जल मिलन’ नाम दिया। जल मिलन कलश में रखे गये विविध नदियों के संयुक्त जल के सम्मुख उत्तराखंड की नदी- घाटियों के दर्द एवं चिन्ता को पूरी तरलता के साथ सामने रखते हुए राधा बहन का मानना था कि समस्या समाधान जल, जंगल, जमीन पर समुदाय के स्वामित्व एवं प्रबंधन में है ताकि नदी- घाटियों से जनजीवन के विस्थापन की आशंका निर्मूल हो। 2003 के बाद के वर्षों में बौरारो घाटी के महिला मंडलों की सक्रियता से कोसी बचाओ अभियान को मिली सफलता को अपनी प्रेरणा का स्रोत बताते हुए राधा बहन ने कहा कि उत्तराखंड की नदियाँ केवल उत्तराखंड की ही नहीं, वरन् उत्तर भारत की जीवन रेखायें हैं। शिशु एवं संवेदनशील पर्वत हिमालय की उपत्यका में जीवनयापन कर रहे लोगों को प्रकृति से सहकारयुक्त जीवन का संदेश देते हुए राधा बहन ने नदी बचाओ अभियान को लड़ाई नहीं, रचना कहा। समुदाय के स्वतंत्रतापूर्वक स्वाभिमानयुक्त जीवन के प्राकृतिक जन अधिकार को रेखांकित करते हुए उन्होंने समाज की समाज के प्रति वफादारी के साथ राज्य और सरकार को भी समुदाय के प्रति वफादार होने का संदेश दिया। उनकी स्थापना थी कि उत्तराखंड में जल, जंगल, जमीन के प्रश्न पर राज्य और समाज का सहकार संभव है ओर इसके लिये आवश्यक है कि समाज राज्य/सरकार को अपना मालिकाना स्वरूप दिखाये; राज्य से निवेदन की नहीं, वरन् लोकादेश की मानसिकता में आये।
लोक विज्ञान संस्थान, देहरादून के निदेशक डॉ. रवि चोपड़ा ने इंगित किया कि अंग्रेजों के आने से पूर्व पार्वत्य नदियों सम्बन्धी स्वामित्व एवं दायित्व व्यवहारतः स्थानीय समुदायों के पास था। ब्रिटिश शासन काल में हुआ व्यवस्था परिवर्तन आजादी के बाद भी जारी रहा और चूँकि कानूनी तौर पर समुदाय का कुछ नहीं है, संसाधन सरकारी मनमानी का शिकार हैं। नदियाँ बाँधी जा रही हैं, 220 बाँध निर्माणाधीन प्रस्तावित हैं, जबकि परियोजनाओं सम्बन्धी आवश्यक जानकारियाँ एवं आँकड़े अनुपस्थित हैं। सुरंग बाँधों की तकनीक पर प्रश्नचिन्ह है। नदियों पर बाँधों की श्रृंखला के प्रस्ताव हैं। यह सब भूकम्प की दृष्टि से संवेदनशील इस इलाके में कभी भी ऐसी व्यापक जनहानि को आधार दे सकता है, जो मात्र उत्तराखंड तक सीमित नहीं रहेगी। डॉ. चोपड़ा ने सुरंग बाँधों के कारण नदी के प्राकृतिक प्रवाह पथ के जनजीवन, जीविका एवं पारिस्थितिकी पर दुष्प्रभावों की चर्चा करते हुए प्रश्न उठाया कि विद्युत परियोजनाओं को लेकर सरकार इतनी हड़बड़ी में क्यों है ? लोग मानते हैं कि दलगत राजनीति कमाने के फेर में है। उनका मत था कि परियोजनायें गहन विश्लेषण एवं जन सहभागिता के साथ, पारदर्शी तरीके से, स्थानीय समुदायों की वास्तविक सहमति के बाद एक ऐसी तकनीक को अपनाकर प्रारंभ की जानी चाहिये, जिसमें किसी प्रकार की हानि की न्यूनतम आशंका हो।
इन आधारक वक्तव्यों के बाद विविध नदी-घाटी अभियानों/ पदयात्राओं के अनुभवों को परस्पर बाँटने के सिलसिले के अन्तर्गत भागीरथी के सुरेश भाई ने सरकार की नदी घाटियों को बेचने की मानसिकता का जिक्र किया। उनका मानना था कि जल विद्युत परियोजनाओं से 22 लाख लोग दुष्प्रभावित होंगे। ऊर्जा प्रदेश के नाम पर पारम्परिक जल संस्कृति एवं संसाधन- संरक्षण को नकारते हुए तमाम सरकारी नीतियाँ निजी क्षेत्र के हितों को केन्द्र में रख कर बनाई जा रही हैं- सरकार की वफादारी निजी क्षेत्र के प्रति है।
| उत्तराखंड की नदियों में प्रस्तावित जल विद्युत परियोजनायें में से 194 के बारे में थोड़ी- बहुत सूचनायें उपलब्ध हैं। इनमें से 40 परियोजनाओं को अभी बेचा जाना शेष है। 35 परियोजनायें चालू हो चुकी बतायी जा रही हैं और 5 की स्थिति अस्पष्ट है। 114 परियोजनायें निर्माण के विभिन्न चरणों में हैं। टिहरी, विष्णुप्रयाग और धौलीगंगा सहित जो परियोजनायें चालू हो गई हैं, उनसे 1257.55 मेगावाट बिजली का उत्पादन होने का दावा किया जा रहा है। लेकिन आश्चर्य है कि इस साल की अभूतपूर्व ठंड में प्रदेश के लाखों लोग बिजली न होने से ठिठुर रहे हैं।
जल विद्युत परियोजनाओं को बेचने की सरकार की उतावली को जानकार लोग अगले वर्ष होने वाले लोकसभा चुनावों के लिये धन बटोरने की एक कवायद के रूप में देख रहे हैं। यह हड़बड़ी इस रूप में देखी जा रही है कि सरकार यह भी जाँच-पड़ताल नहीं कर रही है कि परियोजनायें लगाने वाली कम्पनी के पास न्यूनतम आवश्यक विशेषज्ञता भी है कि नहीं। इसीलिये कानपुर की मोहन स्टील्स और रायपुर की जुबिली स्टील कम्पनी को ही नहीं, कृष्णा निटवियर को भी जल विद्युत परियोजनायें बेची गई हैं। जाँघिया-बंडी बनाने वाली यह कम्पनी अब अपर जिम्बागाड़ (पिथौरागढ़) में 7.7 मेगावाट तथा टौंस नदी पर मोरी-हनोल में 63 मेगावाट की परियोजनायें लगाने जा रही है। कोई ताज्जुब नहीं कि ऐसी कम्पनियाँ परियोजनायें लगाने से ज्यादा उत्सुक इन्हें अच्छे दामों में आगे किसी अन्य को बेच देने के लिये हों। समाचार पत्रों में पिछले दिनों में ऐसी खबरें छपी भी थीं। पानी का मालिकाना हक भी अब जमीन की तरह ‘हस्तान्तरणीय’ हो गया है! |
लक्ष्मी आश्रम, कौसानी की बसंती बहन ने बौरारो क्षेत्र की महिलाओं द्वारा कोसी को बचाने के लिये छेड़ी गई मुहिम का जिक्र किया। इसी क्रम में प्रेम पंचोली ने टोंस और यमुना, भुवन जोशी ने पनार, बची सिंह बिष्ट ने सरयू, देवेन्द्र दत्त ने जलकुर, राजेन्द्र सिंह ने अलकनन्दा, राजेन्द्र सिंह ने गगास, रघु तिवाड़ी ने पश्चिमी रामगंगा, किशन राणा ने गोमती-रामगंगा, आत्माराम बहुगुणा ने मंदाकिनी, अवतार सिंह रावत ने भिलंगना और राजीव लोचन साह ने बलिया में की गई पदयात्राओं के अनुभव सुनाये। सत्र का संचालन करते हुए शेखर पाठक ने कहा कि इन अनुभवों से साबित हुआ है कि उत्तराखंड आन्दोलन के मूल में जो सवाल थे, वे अभी हल नहीं हुए हैं। जल का प्रश्न जंगल और जमीन से अलग नहीं है। उत्तराखंड की मात्र 7 प्रतिशत जमीन कृषि भूमि है, जो पर्वतीय क्षेत्र में तीन प्रतिशत रह जाती है। उत्तराखंड के आम आदमी का दर्द सरकार का दर्द न बना, तो यहाँ भी पूर्वोत्तर जैसी विद्रोह की स्थितियाँ पैदा हो सकती हैं।
17 जनवरी को दूसरे सत्र में अपने विचार व्यक्त करते हुए हिमालय सेवा संघ के मनोज पाण्डेय ने कहा कि अब ज्ञापनों की नहीं, प्रत्यक्ष प्रतिकार की जरूरत है। विश्व नागरिक मंच के मुकेश बहुगुणा ने नदी-घाटियों पर आये संकट का मूल चिन्तन और जीवन शैली पर आये पश्चिमी प्रभाव को माना। ऐसा ही विचार कर्नाटक के एस. आर. हिरेमठ का भी था। हिमाचल प्रदेश के सुखदेव का कहना था कि जल, जंगल और जमीन के सवाल वास्तविक पंचायती राज्य से ही हल हो सकते हैं। गोष्ठी में शिरकत करते हुए पूर्व विधायक प्रदीप उपाध्याय और नारायण पाल ने पानी के सवाल को विधायिका के स्तर पर हल करने के लिये अपनी ओर से हर संभव सहयोग का वचन दिया।
बिलारी (मुरादाबाद) से आये युवा भारत के राकेश रफीक ने जनता की किसी भी लड़ाई को मुकाम तक पहुँचाने के लिये 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के अनुभवों से सीखने का आह्वान किया। मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित पानी पुरुष राजेन्द्र सिंह ने राजस्थान की अरबनी नदी को सदानीरा बनाने तथा दिल्ली में यमुना के खादर को निर्माण कार्यों से बचाने के लिये चले आन्दोलनों का हवाला देते हुए कहा कि जनता यदि खड़ी हुई तो फिर कामयाब भी होती है। उन्होंने कहा कि नदियों के शोषण, प्रदूषण और अतिक्रमण को रोकने की जिम्मेदारी राज्य और समाज दोनों की है।
डॉ. डी.डी. दानी ने उत्तराखंड में संसाधन संरक्षण के लिये शेष देश द्वारा अंशदान दिये जाने की माँग की। सुप्रसिद्ध डिजाइन इंजीनियर जी. डी. अग्रवाल ने उपभोगवादी जीवन शैली पर अंकुश लगाने के महत्व को रेखांकित किया। उत्तराखंड लोक वाहिनी के डॉ. शमशेर सिंह बिष्ट ने अनेक स्थानों पर जल विद्युत परियोजनाओं के विरोध में आन्दोलन चलाने वाले ग्रामीणों को कम्पनियों के षड़यंत्र से सावधान रहने को कहा। सत्र का संचालन डॉ. रवि चोपड़ा और राजीव लोचन साह ने किया। इस सत्र में भावी कार्यक्रम के कुछ विन्दु तय किये गये और यह प्रस्ताव पारित किया गया कि किसी विचारधारा के आधार पर राजनीतिक कार्यकर्ताओं का उत्पीड़न बन्द किया जाये तथा पत्रकार प्रशान्त राही को रिहा किया जाये।
दो दिन तक विभिन्न नदियों के जलों को संजोकर इस सम्मेलन का गवाह बने ‘जल मिलन कलश’ को जलूस में रूप में ले जाकर कोसी में विसर्जित करने के साथ ही कार्यक्रम का समापन हुआ।