ना जाने क्यों
इस बार दहशत सी लेकर आ रहा है थर्टी फस्र्ट
देवभूमि में हुवे विनाश को भूल
फिर लगेंगे नव वर्ष के स्वागत के लिए
बेहूदे ठहाके… चलेगा पैमानों का दौर
क्यों सोचता हूँ मैं
कि
क्यों नहीं दिखता इन्हें
धरती का क्षत-विक्षत हृदय
अपने छौनों को खो चुकी माँ की सूनी आँखें
भरभरा कर बिखर गई इस वर्ष बुजुर्गों की थाती
खेत, खलिहान उनके कदमों की कहानियाँ कहती पगडंडियाँ
क्यों नहीं दिखते इन्हें
भूखे चील की सी नजरों से ताकते नेता
जो छीन रहे हैं मासूमों का निवाला
कैसे स्वागत करूँ मैं नये वर्ष का
हर पल मुझे दिखता है सलाखों के पीछे
व्यवस्था पर हँसता चेहरा बिनायक सेन का
जैसे वो कहना चाह रहा हो
नव वर्ष की पूर्व संध्या में लो ये संकल्प कि
इंसान बनने की भूल मत करना
तुम भी लगाओ ठहाके थर्टी फर्स्ट में!!!
-केशव भट्ट