प्रस्तुति : एल.एम. पाण्डे
पाँच दशक पूर्व समाप्त हो चुकी भारत-तिब्बत यात्रा से 23 वर्षों तक जुड़े रहे जीत सिंह रावत जी के संस्मरण अनेक जानकारियों से भरे पड़े हैं। 82 वर्षीय धार्मिक प्रवृति के संघर्षशील रावत जी से भारत-तिब्बत यात्रा विशेषकर थुलिंग मठ से इस यात्रा के संस्मरणों को लेकर हुई बातचीत काफी रोमांचक है।
चमोली जनपद के बद्रीनाथ से चार किमी. दूर माणा गाँव के मूल निवासी जीत सिंह रावत बताते हैं कि माणा पास से ‘थुलिंग मठ’ होते हुए वे इस यात्रा में जाते थे। ‘थुलिंग मठ’ माणा से 54 किमी. की दूरी पर स्थित है। तब लोग भारत से अनाज, गुड़, तेल, कपड़ा आदि ले जाते थे और वहाँ से नमक, ऊन, सुहागा आदि लाते थे। आषाढ़ से भाद्रपद तक व्यापार यात्रा होती थी। मौसम व स्थानीय परिस्थितियों के कारण बाकी समय में यात्रा सम्भव नहीं थी। मौसम ठीक हो व यात्री भी स्वस्थ हो तो यह यात्रा ढाई दिन में सम्पन्न हो जाती थी। अन्यथा 6 दिन भी लग जाते थे। सामान बकरी और घोड़ों में लाया-ले जाया जाता था। खाने का सामान यात्री साथ ले जाते थे। रास्ते में पड़ाव डाल कर बकरी के गोबर को गड्ढे में धौंकनी की सहायता से जला कर खाना बनाया जाता था। खराब मौसम में यात्रा के दिन बढ़ने के कारण खाने की खुराक कम करनी पड़ती थी, क्योंकि साथ ले जायी गई सामग्री पर ही यात्रियों को निर्भर रहना होता था। पूरा मार्ग जनशून्य होने से अन्य कोई विकल्प नहीं था। यात्रा झुण्ड बनाकर की जाती थी। प्रत्येक झुण्ड में 5 से 12 लोग रहते थे।
जीतसिंह रावत जी ने ग्यारह वर्ष की उम्र में तिब्बत व्यापार में जाना शुरू किया और 33 वर्ष की उम्र में अन्तिम बार 1960 में ‘थुलिंग मठ’ गये। उसके बाद सीमा विवाद के कारण भारत-तिब्बत व्यापार बन्द हो गया।
रावत जी बताते हैं कि सम्पूर्ण व्यापार परस्पर विश्वास पर आधारित था। व्यापारी सामान एक-दूसरे को ही बेचेंगे, इस पर पूर्व में ही करार हो जाता था। शर्तनामे के रूप में एक पत्थर के दो टुकड़े करके दोनों व्यापारी एक-एक टुकड़ा अपने पास रख लेते थे। सामान की अदला-बदली के समय पत्थर के दोनों टुकड़ों को जोड़ कर देख लिया जाता था कि मिल रहे हैं या नहीं। तब व्यापार सम्पन्न होता था। बीस बकरी के बदले एक बकरी का बोझ-गेहूँ चावल आदि दिया जाता था। एक बकरी का ऊन एक रुपये में मिलता था। अदला-बदली के बाद बाकी का भुगतान नकद भारतीय मुद्रा में होता था। व्यापार सम्बन्धी विवाद सुलझाने की व्यवस्था थी। लद्दाख से पूरी सीमा को देखने के लिए और राजीनामा करवाने के लिए गार्जियापुन हिन्दुस्तानी अधिकारी रहता था। इसी प्रकार तिब्बत में दो प्रकार के अधिकारी थे। पहला- डाजांग अधिकारी ‘लामा’, दूसरा-देवाजांग अधिकारी गृहस्थों का। भारत और तिब्बत के दोनों अधिकारी दोभाषिये के माध्यम से आपस में बातचीत करते थे।
रावत जी बताते हैं कि ‘थुलिंग मठ’ को पृथ्वी की नाभि कहा जाता है। यहाँ विष्णु मन्दिर है। मठ के गेट पर सतयुग, द्वापर, त्रेता की मूर्तियाँ हैं। प्रवेश करके बाईं ओर परिक्रमा करने पर राक्षस की मूर्ति है। पूतना की मूर्ति भी यहाँ है। मिट्टी से बनी सारी योनियों की मूर्तियाँ भी यहाँ हैं। विष्णु की मूर्ति कमर, गले व सिर तक तीन तले में है। तीसरी मंजिल पर रोशनदान व गरुड़ की मूर्ति है। उस समय थुलिंग मठ में आठ-दस लामा परिवार रहते थे। पूजा करने वाला पुजारी ल्हासा से आता था। प्रत्येक परिवार अपने प्रिय बच्चे को मन्दिर को सौंप देता था। मन्दिर में रहने वाले लामा लाल चोला पहनते थे और उनका सिर मुँडा होता था। मन्दिर में घी का अखण्ड दिया जलता था। पानी और जौ के कटोरे रखे जाते थे। सत्तू और घास की धूप जलाई जाती थी। लामा अग्नि, जल और पृथ्वी को श्रेष्ठ मानते थे। सोते व उठते समय तीन बार दण्डवत प्रणाम करते थे। गुरु व पानी को नमस्कार करते थे। पूजा के पूर्व लकड़ी से ढोल को बजाते थे। हिन्दुओं की तरह ‘ऊँ’ का उच्चारण करते थे। पानी को देवता मानने के कारण शौच हेतु इसका उपयोग नहीं करते थे। लामा के पथभ्रष्ट होने पर उसके हाथ-पाँव बाँध कर नंगा लिटा कर चाबुक से मारा जाता था। स्थानीय जड़ी-बूटियों का उपयोग दवा के रूप में किया जाता था। शरीर के घाव को बकरी के ताजा खून से सेंकते थे, जिससे वह जल्दी भर जाता था।
थुलिंग मठ से कैलास मानसरोवर के लिए 6 दिन का सफर तय करना पड़ता था। थुलिंग मठ में न तो पेड़ थे और न ही झाड़ियाँ, केवल घास पाई जाती थी। मिट्टी दलदली और पानी खारा था। वहाँ की घास में बड़ी ताकत थी। थोड़ी घास खाने से ही बकरी को ताकत आ जाती थी। थुलिंग में पाए जाने वाले जानवर व पक्षियों में बारीक ऊन होता था। थुलिंग में समुद्री रेता, शंख, मूँगा और नमक भी मिलता था, जिससे लगता है कि वहाँ कभी समुद्र रहा होगा।
थुलिंग मठ में रहने वाले मुख्य रूप से बकरी व चँवर गाय का मांस खाते थे। पहले 24 घंटे उसके लिए पूजा करते थे। दूध, दही, घी वहाँ प्रचुर मात्रा में उपलब्ध था। बाकी, भारत से व्यापारी जो अनाज ले जाते थे वही खाते थे। वहाँ कुछ ऐसे भारतीय परिवार रहते थे, जिनकी वहाँ स्थायी सम्पत्ति थी। थुलिंग में खड़क सिंह पुत्र धाम सिंह परमार तथा कोटा बडवाल का मकान था। थुलिंग से आगे गर्तोक में भी कुछ लोगों के मकान आदि थे। वहाँ मातृ सत्तात्मक परिवार व्यवस्था थी। सम्पत्ति की मालिक औरतें होती थीं। लड़की हमेशा माँ के पास रहती थी। सभी प्रकार का लेन-देन व व्यापार औरतें ही करती थीं।
यात्रा के दौरान कुछ कैलास मानसरोवर जाने वाले साधु-संत मिलते थे। कुछ महात्मा खोड़ गुफा में तपस्या भी करते थे। कभी रास्ते में कुछ दानवाकार मानव अस्थिपंजर मिलते थे। सामान्य आदमी से कई गुना बड़े। अस्थिपंजर की नाक के छेद में पूरा हाथ चला जाता था। ठंड से कोई वस्तु खराब नहीं होती थी। वहाँ एक ऐसा कौवा होता था, जो अकेले पूरा मानव शरीर खा सकता था। उस समय बद्रीनाथ से थोड़ा प्रसाद ‘कर’ के रूप में थुलिंग जाता था। वहाँ से बद्रीनाथ ऊन आता था, जिससे रावल के लिए चोला बनता था।
यह पूछने पर कि व्यापार खुलने पर क्या वे पुनः यात्रा पर जाना चाहेंगे, रावत जी कहते हैं, ‘‘अब उम्र अधिक हो चुकी है, लेकिन उन पुरानी यादों को पुनः ताजा करने की इच्छा तो होती ही है।’’






















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