‘जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ यदि नेपथ्य में बज रहा हो तो संसार के सभी देश सदा महान होते हैं। भारत भी एक महान देश है। ‘मेरा भारत महान’ इसी की अभिव्यक्ति है किन्तु बीच-बीच में हम कुछ ऐसा कर बैठते हैं या हो जाता है कि ‘सौ में निनानब्बे बेईमान फिर भी मेरा भारत महान’ जैसी पैरोडी आम हो जाती है। ऐसी परिस्थितियों में विद्वान लोग बताते हैं कि भारत का अतीत बड़ा गौरवशाली रहा है और यू.पी.ए./एन.डी.ए./क्षेत्रीय दलों एवं नौकरशाही की तमाम मौजूदा कारगुजारियों के बावजूद भविष्य अंततः अच्छा ही होगा। संशय केवल वर्तमान की महानता को लेकर है। वर्तमान में हमसे एक्को काम ठीक से नहीं हो रहा है।
अभी उसी दिन की बात लीजिये हमारे विदेश मंत्री ने पाकिस्तान का शुक्रिया तो अदा किया सरबजीत की रिहाई के लिए और पाकिस्तान ने रिहा कर दिया सुरजीत को। कोट लखपत जेल से तीस साल बाद रिहा हुए सुरजीत को पाकिस्तानी अधिकारियों ने बाघा बॉर्डर तक हथकड़ी में लाकर भारतीय अधिकारियों को सौंप दिया। सुरजीत का परिवार खुशी-खुशी स्वागत सत्कार के साथ उन्हें अपने गाँव ले गया। घर-परिवार में बैठे सुरजीत ने अखबारनवीसों को बताया कि पाकिस्तान वह जासूसी करने गया था। पहले वह बी.एस.एफ. में था, बाद में रॉ का एजैण्ट बन कर जासूसी करने पाकिस्तान गया था किन्तु पकड़ लिए जाने पर सरकार ने उसकी रिहाई के लिए कोई कोशिश नहीं की । भारत में पाकिस्तान की सरपरस्ती में चलाई जाने वाली आतंकवादी गतिविधियों, सरबजीत की घपले में पड़ गई रिहाई, दोनों विदेश सचिवों की प्रस्तावित वार्ता और सर्वोपरि अबू जिन्दाल की स्वीकारोक्तियों की पृष्ठभूमि में यह बयान भारी बबाल पैदा करने वाला बना। गृह सचिव को बयान देना पड़ा कि हम इसे नहीं स्वीकारते और जासूसी के दावे से हमारा कोई लेना-देना नहीं है। सरबजीत की घपले में पड़ गई रिहाई से दुःखी उसकी माँ ने प्रतिक्रिया में कहा कि सुरजीत को ऐसा बयान नहीं देना चाहिए था और रिहा होकर आए लोगों की सरकार को प्रॉपर काउन्सिलिंग करानी चाहिए। ऐसी ही जगहों पर मेरा भारत महान हो जाता है…भारत-पाकिस्तान सम्बन्धों की मौजूदा नजाकत में एक सीधी-सादी माँ को पता है कि ऐसे लोगों से उनकी रिहाई के समय विमर्ष/सलाह मशविरा एक अनिवार्यता है। नहीं पता है तो गृह मंत्रालय, खुफिया एजेन्सियों के आला अफसरों या सरकार को। जहाँ तक देशों के बीच जासूसी का सवाल है दूसरी बड़़ी लड़ाई से पहले और बाद तथा द्विध्रुवीय दुनिया में शीत युद्ध के दौर में यह कोई दूर की कौड़ी नहीं थी और आज भी यह होती ही है। इसे लेकर लिखे गये तमाम घटिया, बढि़या अंगे्रजी उपन्यासों का सामान्य पाठक हो या बनाई गई घटिया, बढि़या हॉलीवुडीय फिल्मों का आम दर्शक सबको पता है कि पकड़े जाने पर जासूस को डिसओन ही किया जाता है और किसी तरह अगर वह वतन लौट आने में सफल हो जाता है तो भी जहाँ एक ओर उस पर नजर रखे जाने की सावधानी जरूरी होती है वहीं दूसरी ओर उसके न्यायोचित आर्थिक हितों की भी अनदेखी नहीं की जाती । यहाँ सवाल यह नहीं है कि हमारा सुरजीत जासूस था या नहीं, सवाल यह है कि दोनों ही हालतों में सीमा पार करते ही उससे बातचीत की जानी जरूरी थी और ऐसी हर परिस्थिति में जरूरी होती है। छोटा मुँह छोटी बात यह कि आइन्दा के लिए गृह मंत्रालय को सरबजीत की माँ से कम से कम इतना ज्ञान तो ले ही लेना चाहिए।
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स्व. अर्जुन सिंह की अभी रिलीज नहीं हुई आत्मकथा पर चर्चायें रिलीज होने लगी हैं। किताब में बताया गया है कि राजीव गाँधी की हत्या के बाद जब सोनिया गाँधी को कांग्रेस अध्यक्ष बनाये जाने का प्रस्ताव आया तो तत्कालीन प्रधानमन्त्री नरसिम्हाराव नाराज होकर चीखते हुए बोले कि क्या यह जरूरी है कि कांग्रेस पार्टी को रेलगाड़ी की तरह चलाया जाए ? सारे नेता डिब्बों की तरह गाँधी-नेहरू परिवार के इंजन के पीछे-पीछे चलें। क्या और कोई विकल्प नहीं है। नाराज होने वाले और नाराजगी के बारे में बताने वाले दोनों माननीय अब नहीं हैं और दिवंगत जीवित रहते जैसे भी रहे हों मरने के बाद केवल उनकी जय-जयकार एवं श्रष्द्धांजलि ही हमारी परम्परा है। फिर भी, ‘छोटा मुँह छोटी बात’, मुझे कहना ही है कि हो सकता है कि गाँधी-नेहरू परिवार और कांग्रेस के सम्बन्ध कभी इंजन और डिब्बों जैसे रहे हों मगर अब ऐसा नहीं है, इस रिश्ते ने हाल के वर्षों में नये आयाम ले लिए हैं। परिवार और पार्टी के बीच मौजूदा रिश्ता कहीं अधिक प्रगाढ़ है:
यह रिश्ता अब नाड़े और पेटीकोट/पाजामे के बीच का जैसा हो गया है। दोनों की एक-दूसरे के बिना कोई हैसियत नहीं है। नाड़ा न हो तो पेटीकोट/पाजामा कभी भी खुलकर बिखर जायेगा और पेटीकोट/ पाजामा बिना खाली नाड़े का क्या?
मै नैनीताल समाचार का स्थाई पाठक हूँ और ब्यंगात्मक शैली मुझे बहुत अच्छी लगती है सो रमदा को इस लेख के लिए धन्यवाद . जय भारत जय उत्तराखंड.