‘शहर में पानी कम है कहते हैं आप/पर जब होता आपकी बेटी का ब्याह/सारी नगरपालिका का पानी/उड़ेला गया आपके लॉन पर-खैर क्यों,यानी/$$$/जबकि आम लोगों को मिलता/हर दूसरे दिन पानी , कम से कम/तो महामहिम , क्या आप उम्मीद नहीं करते/कि बेहतर तरीके से चीजें बाँटी जाएँ/तभी होगा न्यायपूर्ण समाधान कोई !’’
कुकिंग गैस और नल से मिलने वाले पानी की उपलब्धता पर संकट है। दोनों जीवन की दो मूलभूत जरूरतों, आग और पानी की पूर्ति के आधुनिक माध्यम हैं और इस दौर में दोनों तक आम आदमी की पहुँच सरकार/सरकारी अभिकरणों के माध्यम से ही संभव है। अनुभव यह भी रहा है कि जो कुछ भी सरकार बहादुर के हाथों से होकर जनता की ओर आता है वह कितना जनता तक दरअसल पहुँचेगा यह सरकार की दया पर ही निर्भर होता है….बुनियादी संसाधनों पर जनाधिकार केवल जबानी जमा खर्च का मामला है।
एल.पी.जी. यानी लिक्विफाइड पैट्रोलियम गैस….गैस को भारी दबाव में रखें तो यह द्रव/लिक्विड रूप में स्टोर की जा सकती है जिसके लिए मजबूत सिलिण्डर जरूरी हो जाते हैं। गैस को सिलिण्डर करने के लिए रिफाइनरी से टैंकरों के माध्यम से बॉटलिंग प्लाण्ट तक गैस की आपूर्ति, भण्डारण, सिलिण्डरों की रिफिंलिंग, वितरण एजेन्सीज तक ट्रान्सपोर्ट और तदोपरांत होम डिलीवरी या लाइन लगाने का मायाजाल बनता है। जिस आग को दो पत्थरों की रगड़ से इच्छानुसार पैदा करना इन्सान की विकास यात्रा का एक बड़ा कदम माना जाता है, वह मौजूदा विकास, तकनीक और कुप्रबन्ध के रास्ते एक मायाजाल का हिस्सा हो गयी है। लकड़ी, बुरादे, उपले, कोयले आदि की असुविधा से जनता की विमुक्ति के रूप में सिलिण्डर हमारी जिन्दगी की जरूरत बना……होम डिलीवरी का सपना साथ में परोसा गया और कालांतर में हम सिलिण्डरों के लिए लगने वाली लाइनों (जो कई बार मुँह अँधेरे लगनी शुरू हो जाती हैं, वितरण के समय से कई घण्टे पहले), समुचित वितरण के लिए प्रशासन पर डाले जाने वाले दबावों, जामों, घेरावों, नारेबाजियों की शरण हो गए। जरूरत के समय एक अदद सिलिण्डर का जुगाड़ पुरुषार्थ का प्रतीक हो गया। सिलिण्डर के जुगाड़ के महाप्रयाण में कई तरह के ‘जुगाड़’ विकसित हुए, होम डिलीवरी रॉकेट साइन्स से भी जटिल मामला हो गया। एक दर्जन से भी अधिक आई.आई.एम्स. और अनगिनत निजी प्रबन्ध संस्थानों से हर साल निकलने वाले और लाखों रुपये के पे पैकेज ले सकने की योग्यता रखने वाले मैनेजरों, आई.ए.एस. और पी.सी.एस. के हजारों अधिकारियों की फौज और अपनी विशिष्ट प्रतिभा के बल पर तमाम किस्म के वारे-न्यारे कर सकने वाले एन.जी.ओज. में से एक माई का लाल ऐसा नहीं निकला, जो एक ऐसी वितरण व्यवस्था को आधार दे सके कि आम आदमी आजादी के पैंसठ सालों बाद भी चूल्हे की आग जैसी बुनियादी जरूरत के लिए इस कदर न गाँजा जाए कि कंधे या दोपहिए वाहन की पिछली सीट पर चादर में लिपटा हुआ सिलिण्डर सुखद सपना हो जाए। समस्या समाधान की चर्चा जब भी सरकारी स्तर पर होती है तो पके पकाए जुमले, नेता हों या अधिकारी, लोगों की तरफ उछालने के आदी हैं….डिमाण्ड सप्लाई का असंतुलन, घरेलू सिलिण्डरों का व्यावसायिक उपयोग, सिलिण्डर बैक लॉग आदि आदि। ऐसा बार बार क्यों होता है, यह किसकी जिम्मेदारी है इस पर भारत भाग्य विधाता कुछ नहीं कहते। इधर एक नया शगूफा छोड़ा गया है कि गैस सप्लाई पर पल्लेदारों का कब्जा हो गया है। पल्लेदार वह शख्स है, जो होम डिलीवरी की गैरमौजूदगी में, मैदानी कस्बों में एजेन्सी से आपके घर तक हथठेले में आपका सिलिण्डर पहुँचाता है। अगर आप अपनी किताब उसे दे दें तो वह बुक कराने की जिम्मेदारी भी उठा लेगा और एक तरह से आपके लिए होम डिलीवरी का काम करेगा। हाँ अतिरिक्त पैसे जरूर लेगा। मैं बड़ी खुशी के साथ ये अतिरिक्त पैसे उसे देता हूँ, क्योंकि उम्र के इस दौर में मैं गैस बुक कराने और सिलिण्डर लेने के लिए लाइन की मारामारी नहीं झेल सकता। मेरे पास कोई वाहन भी नहीं है। वह मेरा संकटमोचक है। जिम्मेदार लोग इसे अगर कब्जा कहते हों तो कहते रहें, मेरे लिए यह आउटसोर्सिंग है और पल्लेदार के लिए स्वरोजगार। ये मौके पैदा ही तब होते हैं जब व्यवस्था अनुपस्थित होती है।महामहिमो! समाधान एक भ्रष्टाचार मुक्त, न्यायपूर्ण होम डिलीवरी सिस्टम को लागू करने एवं उत्पादन से लेकर परिवहन, वितरण तक से सम्बन्धित अधिकारियों और कार्मिकों में अपने दायित्वों को चुनौती की तरह लेने की कार्यसंस्कृति में है पल्लेदार को कोसने में नहीं।
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पानी, पीने के पानी की कथा भी इससे बहुत अलग नहीं है। नलके का पानी एल.एस.जी.ई.डी. से होकर जल संस्थान, जल निगम और पेयजल निगम के चक्रव्यूह में फँसा। जैसे अनुभवी नौकरशाह और नेता कहते हैं कि अगर किसी मामले को लटकाना हो तो उस पर एक कमेटी बिठा देनी चाहिए, वैसे ही भारतीय नागरिकों का अनुभव रहा है कि किसी चीज की आपूर्ति को यदि घपले में डालना है तो उसे किसी निगम को सौंप देना चाहिए। विभाग से निगम तक आते आते नलके में पानी तकरीबन उसी दर से घटा है जिस दर से इंजीनियरों-अफसरों की तादाद बढ़ी है। बढ़ती आबादी के अनुपात में नए जल स्रोतों एवं पाइप लाइनों पर विशेष काम नहीं हुआ, परंपरागत जल स्रोतों को बचाए रखने की कोई ईमानदार कोशिश नहीं हुई। जल संग्रहण माध्यमों, पाइप लाइनों, नलकूपों और ग्रासरूट पर सक्रिय कार्मिकों की संख्या में आनुपातिक वृद्धि नहीं हुई….चिंतन के स्तर पर कोई बदलाव नहीं हुआ। बस अफसरों की तादाद बढ़ती रही…… कमीशनखोरी में हिस्सा बाँटने वाले तो बढ़े, काम करने वाले नहीं। परिणामतः पानी की हालत पतली होती गई। समस्या समाधान के स्तर पर हमेशा एक तरह का तदर्थवाद पसरा होता है: फौरी समाधान किसी स्थायी हल तक कभी भी नहीं ले जा सकते। दूरगामी सोच से तात्कालिकता का छत्तीस का आँकड़ा होता है। इसीलिए जब भी पानी (गैस, बिजली भी जोड़ लीजिए) की समस्या जनता के बीच भारी असंतोष पैदा करती है जिम्मेदार लोग बहानेबाजी का सहारा लेते हैं। हल्द्वानी में नहर कवरिंग पर ठीकरा फूटता है तो दूसरी जगहों पर समस्या की जड़ में टुल्लू पम्प/मोटर बताए जाते हैं। जल संस्थान की जिम्मेदारी है कि वह वैधानिक उपभोक्ता को उसके डोरस्टैप पर कनेक्शन उपलब्ध कराये। जबकि वास्तविकता में सौ-दो सौ मीटर दूर कनेक्शन से घरों में लाये गये पाइपों का जाल आम बात है। पानी में ‘फोर्स’ है तो आपके दुमंजले तक आयेगा….नहीं है तो पम्प लगवाना विवशता है, शौक नहीं। ‘पम्प लगाया तो खैर नहीं’ कह कर तो तभी धमकाया जा सकता है जब मकान की स्वीकृत ऊँचाई तक स्वीकृत कनेक्शन पानी पहुँचा सके।
हमारा आर्थिक इतिहास गवाह है कि हमने अपनी समस्याओं के समाधान के लिए ज्यादातर अपने भीतर नहीं वरन बाहर विदेशों की ओर देखा है…. पीने के पानी को लेकर भी हम ए.डी.बी. और विश्व बैंक तक पहुँचे हैं किन्तु पानी टोंटी तक नहीं पहुँच पा रहा है तो नहीं पहुँच पा रहा है।
रोटी, कपड़ा और मकान के लिए संघर्षरत जनता को अब पानी, बिजली और गैस के लिए भी गुहार लगानी पड़ रही है। कभी-कभी लगता है यह सब प्रायोजित है ताकि लोग इन्हीं के जुगाड़ में लगे रहें और जन प्रतिनिधि नौकरशाह निर्बाध अपने-अपने धंधों में।
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आज 25 मई है। उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री का रामनगर दौरा है। आज नल में सुबह 5.30 पर ही पानी आ गया, एक मिनट के लिए भी बिजली नहीं गयी है, रानीखेत रोड पर कोई जाम नहीं है….. मैं किसी वाहन से कुचले जाने के डर से बेखौफ बादशाह की तरह टहलते हुए पोस्ट ऑफिस तक हो आया हूँ। सड़क पर गाडि़याँ पार्क नहीं हैं, रानीखेत रोड इतनी चौड़ी है मुझे आज पता चला है। मुख्यमंत्री महोदय, मैं ऐसा एक दिन दिखाने के लिए आपका आभारी रहूँगा। मुझे खेद है कि मैं आपके दौरे की समाप्ति पर आपको विदा देने मौजूद नहीं रहूँगा, किन्तु बिजली जाते ही मुझे आपके रामनगर छोड़ देने की जानकारी हो जायेगी। आभार और धन्यवाद !