पोखरण में भारत द्वारा किए गये परमाणु परीक्षण के लिए अपनाये गए कोडनेम ‘स्माइलिंग बुद्धा’ की कुरूपता को एक कविता के माध्यम से सामने रखते हुए हरीश चन्द्र पाण्डे ने हमारे वक्तों में शब्दों, संज्ञाओं के खोखलेपन और पाखंड की ओर एक शानदार इशारा किया है। देखें:
‘लाल इमली’ कहते ही इमली नहीं कौंधी दिमाग में/जीभ में पानी नहीं आया/‘यंग इंडिया’ कहने पर हिन्दुस्तान का बिम्ब नहीं बना/जैसे महासागर कहने पर सागर उभरता है आँखों में/जैसे स्नेहलता से जुड़ा है स्नेह और हिमाचल में हिम/कम से कमतर होता जा रहा है ऐसा/इतने निरपेक्ष विपर्यस्त और विद्रूप
कभी नहीं थे हमारे बिम्ब/कि पृथ्वी पर हो सबसे संहारक पल का रिहर्सल/और कहा जाये/बुद्ध मुस्कराये हैं।
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शब्द, संदर्भ विशेष और प्रतिक्रिया में मानस पर बनने वाले चित्र/छवि या बिम्ब के बीच एक अजीब सी गड़बड़ी इधर जरा ज्यादा ही होने लगी है। बात गणराज्य के महामहिम राष्ट्रपति के चुनाव की हो रही हो और आम नागरिक के मन में बिम्ब बने घटिया दलगत राजनीति के अन्तर्विरोधों और सहयोग के लिए सौदेबाजी …….आवश्यक वोटों के लिए आर्थिक पैकेज और कहीं अधिक घातक आपराधिक मामलों को ठंडे बस्ते में डाल देने के वायदों को लेकर की जा रही सौदेबाजी का। क्या विडंबना है ? राष्ट्रपति के पद के लिए उम्मीदवारी का मापदण्ड क्या परिवार विशेष या राजनैतिक दल विशेष के प्रति की गयी सेवायें होनी चाहिये या राष्ट्र के प्रति समर्पण भाव से की गयी सेवायें ? एक उम्मीदवार की योग्यता है कि वह सरकार के संकटमोचक रहे हैं…..क्राइसिस मैनेजर, कोऑलीशन धर्म निभाने में आ रहे संकटों से सरकार को निकाल लाने की अप्रतिम योग्यता रही है उनके पास। संकटों से सरकार बहादुर को निकालने में कितने असाधारण और अनैतिक समझौते नहीं किये गये होंगे……वोट के लिए नोट या भ्रष्टाचार के मामलों में सी.बी.आई. का मनचाहा इस्तेमाल संकटमोचन के ही तरीके हैं। रायसीना हिल पर आराम के लिए उम्मीदवारी का यह कितना सशक्त आधार है। कष्ट इतना ही है कि भविष्य में संकटमोचक कहने/सुनने पर हनुमान का विम्ब अब नहीं बनने वाला। एक उम्मीदवार का मानना है कि उनके राष्ट्रपति बनने का सीधा परिणाम होगा ‘आदिवासियों का कल्याण और अपने इस कल्याणकारी दायित्व के निर्वहन के लिए’ वह घोर याचकी मुद्रा में हैं। दे आदिवासियों के कल्याण के लिए अन्तरात्मा की आवाज पर दे। बाकी तो धरतीपकड़ टाइप उम्मीदवार हैं…..आखिर गणराज्य के सर्वोच्च पद का प्रश्न है।
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छोटा मुँह छोटी बात यह कि अभी उस दिन विधानसभा से बाहर आते हुए उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री मुस्कराये और मीडिया से मुखातिब होते हुए उन्होंने दावा किया कि अब समूचा उत्तराखण्ड बिजली कटौती से मुक्त रखा जायेगा ( अपने तात्कालिक फायदों के लिए इस, उस जगह या सितारगंज जैसे विधानसभा क्षेत्र को कुछ दिनों तक बिजली कटौती से मुक्त रखना तो रोज का खेल है)। वह दिन है और आज का दिन कि उत्तराखण्ड ने ऐसी अराजक बिजली कटौती नहीं देखी। माननीय के मुस्कराने से पहले बिजली कटौती का कम से कम मोटा मोटा समय तो तय था कि आठ बजे सुबह जायेगी तो दो बजे के आस पास आ जायेगी….चार बजे शाम फिर जायेगी और सात बजते -बजते फिर दिख जायेगी। उसी हिसाब से अपने काम-काज और कार-बार को हम ढाल ले रहे थे मगर अब ? न जाने का कोई तय समय है न आने का। लटके रहिए। एक साहब ने एस.एम.एस. किया है कि इस तरह उत्तराखण्ड की सरकार ने लोगों को बार बार खुशियाँ मनाने का मौका दिया है…… दिन में कई-कई बार वे आ गई………गई कहते हुए खुश होते हैं। गणतन्त्र में हमारे हिस्से की खुशियाँ इसी तरह बढ़ती रही है….पानी आ गया…….बिजली आ गई……..गैस मिल गई।
रमदा