थोड़ा सरकने के बाद गाड़ी एक बार फिर जाम में फँस जाती है। इस बार सड़क पर डामर लगाया जा रहा है। सीजन में काम होना उतना जरूरी नहीं है, जितना कि काम होते हुए दिखना। सड़कें दुरुस्त रहनी चाहिये, वरना वी.आई.पी. गाड़ियों का ‘अलाइनमेंट’ आउट हो सकता है। अगर ऐसा हुआ तो जिला प्रशासन को भारी कटौतियों का सामना करना पड़ सकता है। जाम का फायदा उठा कर माँगने वाले ‘मेहमान’ गाड़ियों को घेर लेते हैं। कोई बन्दर बना है। किसी के हाथ में शनिदान की बाल्टी है। कोई जोड़ी सलामत बने रहने की दुआ दे रहा है। कुछ औरतें सोये बच्चे को जबरदस्ती उठा कर रुला रही हैं। सीजन में इनकी घुमाई की घुमाई हो जाती है और कमाई की कमाई। प्रशासन माँगने पर पाबंदी भी तो नहीं लगा सकता क्योंकि वो खुद हाथ फैलाये रहता है।
‘‘नैनीताल की प्रसिद्ध चीज क्या है ?’’
‘‘यहाँ का प्राधिकरण प्रसिद्ध है। उसके सहयोग से बने होटल भी प्रसिद्ध हैं। अगर साथ ले जाना चाहो तो मोहनिया है, जैकी है, नबुआ है। थोड़ा खिसके हुए हैं, पर नैनीताल की पहचान हैं।’’
‘‘हमें कोई अच्छा और सस्ता होटल बताओ।’’
‘‘रहना है या खरीदना है ? वैसे तो सभी होटल यहाँ अच्छे और सस्ते हैं। अंग्रेजों के बनाये होटल मजबूत हैं। आजकल तो यहाँ होटलों की बाढ़ आ जाती है। कई लोग तो अपने कमरों को किराये पर उठा कर खुद रात भर बरामदे में पड़े रहते हैं। रही रेट की बात तो वो तय नहीं है। आई.डी. वालों के लिये अलग रेट हैं, बिना आई.डी. वालों के लिये अलग। पैसा इतना लेते हैं कि चार दिन रहने वाला एक ही दिन बाद वापस चला जाता है।’’
गाड़ी एक बार फिर चल पड़ती है। पहली बार सड़क खाली मिलती है। लगता है अब जाम नहीं लगेगा। तभी एक पुलिस वाला गाड़ी को रोक लेता है। पता लगता है कि माल रोड पर वी.आई.पी. आने वाले हैं। घंटों इन्तजार के बाद हूटर बजाता हुआ गाड़ियों का लम्बा काफिला निकलता है। उनके जाते ही ऐसा लगता है जैसे लम्बे समय से रुकी हुई गैस पास हो गयी हो।
‘‘क्या करें साब, यहाँ सड़कें तो लम्बी-चौड़ी हो नहीं सकतीं, पर जाम जरूर लम्बा-चौड़ा लग जाता है। इन आवाजों ने बच्चों की गाड़ी मँगवाने का अंदाज ही बदल दिया है। पहले बच्चे गाड़ी के लिये टी-टी-टीट, पी-पी-पीप करते थे और अब करते हैं ट्यू-ट्यू-ट्यू-ट्यू….।’’
‘‘सुना है मालरोड में कोई वाटर फॉल है।’’
‘‘वाटर फॉल तो आठ किमी. दूर है।’’ ‘‘अरे नहीं। पिछली बार मेरी दीदी-जीजा जी आये थे। उन्होंने वहाँ पर फोटो भी खिंचवाई थी…..पिछली बरसात में। तुम्हें नहीं मालूम ?’’
‘‘अरे वो! हाँ साब एक बरसाती वाटर फॉल है। ‘ग्राण्ड होटल’ के पास। बरसात के दिनों में नियाग्रा फॉल को मात देता है। अलबत्ता लोग वहाँ फोटो भी खिंचवाने लगे हैं, ये जरूर मुझे नहीं मालूम था।’’
‘‘यहाँ का प्रशासन इस शहर को ठीक करने के लिये कुछ करता क्यों नहीं ?’’
‘‘करता क्यों नहीं साब। सीजन आने से पहले बंद कमरों में मीटिंग करता है। फिर जोशोखरोश के साथ ऐलान करता है कि कमर कस ली गयी है। सीजन आते ही पतलून ढीली होने लगती है। प्रशासन भी क्या-क्या करे ? इतने वी.आई.पी. एक साथ आ जायेंगे तो परेशानी तो होगी ही। अच्छा, साब सात घंटे हो गये हैं, मेरा हिसाब कर दो। निकालो हजार रुपये।’’
‘‘तुमने हमें घुमाया ही क्या है ? कई जगह बतायी थीं। नैनीताल दर्शन करवाने को कहा था।’’
‘‘साब ये जाम लगा है। ये खुला होता तो मैंने सब जगह दिखला दी होती।’’
‘‘दिखाई तो नहीं ना ?’’
‘‘ आप तो ऐसे कह रहे हैं, जैसे ये जाम मैंने लगवाया हो। मेरा पूरा दिन लगा है। पैसे भी पूरे ही लूँगा।’’
‘‘ये लो पचास रुपये। हम इससे ज्यादा नहीं देंगे।’’
‘‘पचास रुपये ? भिखारी समझा है क्या ? मेहनत के पैसे माँग रहा हूँ। पूरे दिन की बात हुई थी।’’
‘‘पूरा घुमाने की बात भी तो हुई थी। पहले पूरा घुमाओ।
‘‘आप जाम खुलवाओ, मैं घुमाता हूँ। रात हो जायेगी तो एक्स्ट्रा चार्ज देना पड़ेगा।’’
‘‘अरे, उतारो इसे गाड़ी से। हमें अब कहीं नहीं जाना है। हम वापस जायेंगे।’’
‘‘जरूर जाइये। पहले मेरा हिसाब करके जाइये। रही बात नैनीताल दर्शन की, तो डाँठ से राजभवन होते हुए मल्लीताल ले गया और वहाँ से मालरोड दिखाते हुए वापस ले आया हूँ। पूरा नैनीताल दर्शन करवाया है। ताल का चक्कर लगाया है। आप पैसे निकालो जी!’’
‘‘ये पचास रुपये हैं। लेने हैं तो लो वरना गाड़ी से बाहर निकलो।’’
‘‘क्यों निकलो ? पहले हिसाब तो करो।’’
‘‘कैसे नहीं उतरेगा ? तेरे जैसे पचास गाईड देखे हैं। चल बाहर निकल!’’
‘‘मैं सुबह से आप-आप कर रहा हूँ और तू है कि जूते समेत सर पर चढ़े जा रहा है। तेरे जैसे के मुँह नहीं लगता मैं। जेब में हाथ डाल और पैसे निकाल।’’
‘‘बदमाशी किसे दिखाता है ? तुम सब मिल कर टूरिस्टों को लूटते हो। हम पैसे नहीं देंगे।’’
‘‘जा, मत दे। जब होंगे, तभी तो देगा। न जाने कहाँ-कहाँ से चले आते हैं नैनीताल! उधार माँग कर आते हैं और चंदा करके वापस भेजना पड़ेगा। खाने के लिये पैसे हैं या दूँ ?’’
‘‘बदतमीजी करता है ? यहाँ पुलिस स्टेशन कहाँ है ?’’
‘‘उसके लिये दूसरा गाईड करना पड़ेगा। अगर मेरे साथ गये तो एक्स्ट्रा चार्ज देना पड़ेगा। पुलिस वाले भी लेंगे और मैं भी।’’
‘‘बड़ा बदतमीज है! बाहर निकलता है या दूँ एक ? खुद को क्या समझता है तू ?’’
‘‘तू नहीं आप। कुछ आया समझ में, या फिर निकालू ‘स्टेपनी’ समेत निकालूँ पाँचों टायरों की हवा ? प्यार से हम सब काम कर सकते हैं, पर तड़ी तो अपने बाप की भी नहीं सही!’’
‘‘क्या कर लेगा तू ?…..हैं…हैं… ये जूते क्यों उतार रहा है ? पूरी गाड़ी में बदबू आ रही है। जूते पहन और जा।’’
‘‘अभी तो सिर्फ जूते उतारे हैं। अगर गैस छोड़ दी तो पागल हो जाओगे। गाड़ी के अन्दर से चिल्लाउँगा कि ये मेरा अपहरण करके ले जा रहे हैं। आतंकवादी हैं। फिर जो जाम लगेगा तो गाड़ी छोड़ कर भागना पड़ेगा।’’
‘‘बड़ा ढीठ किस्म का आदमी है। देते क्यों नहीं इसे पैसे ?….. सुनिये जी, आप तो नाराज हो रहे हैं। ये लो पैसे। अब तो जूते पहन लो प्लीज!’’
‘‘ये हुई न बात। पैसे निकालो!’’
‘‘अब ये बता दो कि वापस जाने का रास्ता कौन सा है।’’
‘‘पहले ईनाम के दो सौ रुपये और निकालो, फिर गाड़ी बैक करो और सीधे निकल लो।’’
गाड़ी बैक होती है और तेजी से वापसी की राह पकड़ लेती है। ‘‘अरे, ईनाम के पैसे तो दे जाते……’’