कल्पना कीजिए, अगर उत्तराखंड की बड़ी नदी घाटियों में रेल मार्ग बना दिए जाएँ तो राज्य का नक्सा कैसा उभर कर आएगा! तब पहाड़ के सभी जिला मुख्यालय और प्रमुख नगर व कस्बे रेलमार्ग पर होंगे या निकटतम रेलवे स्टेशन से बमुश्किल घंटे भर की दूरी पर रह जाएँगे। गर्ब्यांग, बाण, नीती और माणा जैसे सीमांत गाँवों के लोग भी राजधानी दिल्ली से रात को चलकर दूसरे रोज सूरज डूबने से पहले अपने घर पहुँच जाएँगे।
सुचर्चित गढ़वाली गायक नरेन्द्र सिंह नेगी का एक पुराना किंतु बेहद लोकप्रिय गीत है- चलिबै मोटर चलि सर रर प्वाँ प्वाँ। इस गीत में उन्होंने पहाड़ में मोटरगाड़ी की कष्टप्रद यात्रा का बड़ा चित्रात्मक वर्णन किया है। उत्तराखंड में मोटर सफर की तकलीफें अपेक्षाकृत बेहतर सड़कों और आरामदेह गाड़ियों के बावजूद घटी नहीं हैं। पहाड़ में अगर रेलगाड़ी चलती तो यकीनन नेगी जी उसकी तारीफ में गीत लिखते।
सुगम आवागमन किसी इलाके के विकास की पहली शर्त है। दुनिया के विकसित समाजों को उनके पास उपलब्ध तेज रफ्तार व आरामदेह आवागमन व परिवहन सुविधाओं के हिसाब से आँका जाता है। दुनिया की सबसे तेज ट्रेन अगर जापान में चलती है तो इसका सीधा संबंध वहाँ के शानदार आर्थिक विकास से भी है। इसी तरह एशिया और अफ्रीका के पिछड़े देशों की गरीबी के कारणों को आसानी से उनकी दुर्गमता में खोजा जा सकता है। हमारे उत्तराखंड पर भी यह बात पूरी तरह लागू होती है।
अंग्रेजी राज में उत्तराखंड के जो हिस्से आवागमन के लिहाज से बेहतर स्थिति में थे, वहाँ विकास की किरणें पहले पहुँचीं, मगर दुर्गम इलाकों के बाशिंदे पीछे रह गए। आजादी के बाद यहाँ सड़क निर्माण का सिलसिला शुरू हुआ और देश-दुनिया से कटे हुए इसके बड़े भू-भाग को उठने का मौका मिला। हालाँकि उत्तराखंड के ज्यादातर इलाके आज सड़क संपर्क में हैं लेकिन आवागमन की मौजूदा व्यवस्था किसी भी हाल में 21वीं सदी की अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं कही जा सकती। पहाड़ का कठिन भूगोल लंबी सड़क यात्राओं को बेहद तकलीफदेह बना देता है। नतीजतन सड़कें बन जाने के बावजूद ज्यादातर पहाड़ी इलाकों में विकास की गाड़ी एक स्तर से आगे नहीं बढ़ पाई है।
पूर्व में टनकपुर से काली नदी के साथ रेललाइन आगे बढ़ेगी और पंचेश्वर संगम पर दो लाइनों में बँट जाएगी। एक लाइन सरयू के साथ घाट, रामेश्वर, सेराघाट होते हुए बागेश्वर तक जाएगी तो दूसरी काली के साथ-साथ झूलाघाट, जौलजीबी और धारचूला तक पहुँचेगी। बागेश्वर रेल लाइन को गरुड़-बैजनाथ होते हुए अंततः अल्मोड़ा तक आगे बढ़ाना मुश्किल न होगा। इसी तरह राज्य के मध्यवर्ती हिस्से में रामनगर से चौखुटिया-द्वाराहाट तक रेल पहुँचाई जा सकती है।
गढ़वाल में तो बड़ी नदियों का अच्छा-खासा जाल है। ऋषिकेश में गंगा के साथ-साथ रेलगाड़ी आसानी से भीतर देवप्रयाग, रुद्रप्रयाग व श्रीनगर होते हुए कर्णप्रयाग और उसके आगे तक ले जाई जा सकती है। देवप्रयाग से एक रेल शाखा बरास्ते टिहरी व धरासू उत्तरकाशी जैसे दूरस्थ जनपद मुख्यालय तक पहुँच सकती है।
आज की तकनीकी उपलब्धियों को देखते हुए अब पहाड़ी मार्गों पर रेल बिछाना बहुत मुश्किल काम नहीं रहा। दिल्ली में घनी बस्तियों के बीच जिस तरह पिलर खड़ेकर मेट्रो रेल बिछाई गई है, ठीक इसी तरह उत्तराखंड में नदियों के किनारे पिलरों पर रेल लाइन बिछाई जा सकती है। न सड़क खोदने का झंझट और न पहाड़ खिसकने का खतरा। जहाँ कहीं नदियों में तीखे मोड़ हों वहां छोटी-छोटी सुरंगें बनाई जा सकती हैं। कोंकण रेलवे के लिए देश के इंजीनियर यह काम पहले ही कर चुके हैं।
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दूसरे पहाड़ों में रेल देश के पहाड़ी इलाकों में रेलगाड़ी ले जाने का विचार कोई नया नहीं है। शिमला और दार्जिलिंग में रेल अंग्रेजी शासन में ही आ चुकी थी। हालांकि यह पर्यटन के लिहाज से बनी खिलौना गाड़ी भर हैं। बावजूद इन शुरुआती कोशिशों के, पहाड़ में रेलगाड़ी ले जाने के विचार को खास प्रोत्साहन नहीं मिला। रेलगाड़ी को मैदानों की चीज समझा जाता रहा और इसे दुर्गम पहाड़ों तक लाने की बात को खास तवज्जो नहीं दी गई। टेक्नोलॉजी की अनुपलब्धता भी इसे लगभग असंभव कार्य बना देती थी। लोग सोचते थे यहाँ मोटर गाड़ी ठीक से पहुँच जाए, वही गनीमत है। लेकिन तकनीकी छलांग का कमाल देखिए, देखते ही देखते देश-दुनिया के कई पहाड़ी इलाकों में रेलगाड़ी की सीटियाँ गूँजने लगीं। चीन ने तो हिमालय जितनी ऊँची कुनलुन पर्वतमाला को लांघकर तिब्बत की राजधानी ल्हासा तक रेल पहुँचा दी। वह भी रिकार्ड समय में। और अब चीनी रेल भारत की पूर्वोत्तर सीमा और नेपाल की राजधानी काठमांडू में दस्तक देने की तैयारी कर रही है। कहना न होगा रेल ने तिब्बत का कायापलट कर दिया है और वैश्विक मंदी के मौजूदा दौर में भी इस क्षेत्र की विकास दर दो अंकों में बनी हुई है। अपने देश में भी कई पहाड़ी इलाके बीते कुछ वर्षों के दौरान रेल की छुक-छुक से गुलजार हुए। महाराष्ट्र कोंकण रेलवे का बड़ा हिस्सा पहाड़ी इलाकों से गुजरता है। और अब तो हिमालय के ही एक पहलू कश्मीर घाटी में रेलगाड़ी दौड़ने लगी है। जल्द ही देश की राजधानी दिल्ली से धरती के स्वर्ग तक सीधे रेलगाड़ी से सफर संभव होगा। कश्मीर रेल परियोजना कश्मीर रेल परियोजना को तीन चरणों में बाँटा गया हैः- पहला चरण: उधरपुर-कटरा रेललाइन (25 किमी) दूसरा चरण: कटरा-काजीगंड रेललाइन (148 किमी) तीसरा चरण: काजीगंड-बारामुला रेललाइन (119 किमी) कश्मीर रेल के पहले और तीसरे चरण का काम पूरा हो चुका है जबकि दूसरा और सबसे कठिन चरण निर्माणाधीन है। इस चरण में रेललाइन को हिमालय की तलहटी और 4,600 मीटर ऊँची पीरपंजाल पर्वतशृंखला को पार करना है। इस चरण में रेललाइन 100 किमी लंबाई की सुरंगों (जिसमें सबसे लंबी 11 किमी होगी) और 750 पुलों से होकर गुजरेगी। सबसे बड़ी चुनौती चिनाब में 1,315 मीटर लंबा पुल बनाने की है जो नदी के तल से 359 मीटर ऊपर होगा। यह दुनिया का सबसे ऊँचा रेलवे ढांचा होगा। पेरिस के एफिल टावर से 35 मीटर ऊँचा! इसके अलावा अंजी खाद को पार करने के लिए बनने वाला 657 मीटर लंबा और 186 मीटर ऊंचा पुल भी कम मुश्किल लक्ष्य नहीं है। तिब्बत रेल आधुनिक इंजीनियरिंग का चमत्कार समझी जाने वाली क्विंगहाई-तिब्बत रेल दुनिया की सबसे ऊँची रेलवे लाइन है। इसकी कुल लंबाई 1956 किमी है, जिसमें झिनिंग और गोलमड के बीच 815 किमी हिस्सा 1984 तक पूरा कर लिया गया था। गोलमड से ल्हासा तक 1142 किमी हिस्सा 2006 में पूरा हुआ। यह रेललाइन 5,072 मीटर (16,640 फीट) ऊँचे तांगुला दर्रे को पार करती है, जो दुनिया का सबसे ऊँचा रेलट्रैक है। इसके अलावा 4,905 मीटर की ऊँचाई पर बनी और 1,338 मीटर लंबी फेंगघुसान टनल भी अपने आप में एक विश्व कीर्तिमान है। इस रेल मार्ग की सबसे लंबी गुआनजिआओ टनल 4,010 मीटर लंबी है। उल्लेखनीय है कि गोलमड-ल्हासा सेक्शन का 80 फीसदी हिस्सा 4000 मीटर से ज्यादा ऊँचाई पर है, जिसमें 550 किमी लंबा ट्रैक स्थाई भूमिगत बर्फ (पर्माफ्रॉस्ट) के ऊपर बिछाया गया है। ऊँचाई के कारण इस रेलमार्ग पर गुजरने वाली रेलगाड़ियों को हवाईजहाज की तरह आक्सीजनयुक्त रखा जाता है। कालका-शिमला रेल मार्ग 16 अप्रैल 1853 को दोपहर तीन बजकर 35 मिनट पर भारत में पहली रेल चली थी और बहुत कम समय के भीतर यानी नंबबर 1847 में शिमला तक रेल ले जाने के लिए सर्वेक्षण शुरू करा दिया गया। 29 जून 1898 में कालका-शिमला रेल लाइन पर बाकायदा काम शुरू हो गया। 1903 में बनकर तैयार हुई इस लाइन पर इसी वर्ष 9 नवंबर को भाप के इंजन वाली नन्हीं रेल सीटी बजाती छुक-छुक कर चल पड़ी। तब इसमें मात्र 15 यात्री ही सफर कर सकते थे। आज इसकी क्षमता 200 यात्रियों की है। 102 सुरंगों और 800 छोटे-बडे वृतांश पुलों के साथ 96 किलोमीटर लंबे इस रेलमार्ग को गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड्स में इंजीनियरिंग के श्रेष्ठ नमूने के बतौर दर्ज किया जा चुका है। यह यूनेस्को की विश्व धरोहरों की सूची में भी शामिल है। |
उत्तराखंड और रेल का सपना
बीते दिनों के तमाम प्रस्तावों और प्रयासों के बावजूद उत्तराखंड की पहाड़ियों में रेल फिलहाल दूर की कौड़ी नजर आती है। राज्य के सुदूर पूर्वी नगर टनकपुर और पश्चिमी छोर स्थित देहरादून सहित इन दोनों के बीच तराई-भाबर की मैदानी पट्टी में पड़ने वाले काठगोदाम, रामनगर, कोटद्वार और ऋषिकेश नगरों तक रेलगाड़ी अंग्रेजी जमाने में ही पहुँच गई थी। इन द्वारों से उत्तराखंड की अकूत वन संपदा अंग्रेजी खजाने को भरने के लिए बाहर निकाली जाती थी। अंग्रेज गढ़वाल में कर्णप्रयाग और कुमाऊँ में बागेश्वर तक रेल पहुंचाना चाहते थे। ऋषिकेा-कर्णप्रयाग रेल लाइन के लिए पहला सर्वे 1919 में गढ़वाल के तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर जे.एम. क्ले ने करवाया। इसके बाद इस लाईन के लिए 1996 में तत्कालीन रेल राज्यमंत्री सतपाल महाराज की पहल पर एक बार फिर सर्वे हुआ। इसी तरह टनकपुर-बागेश्वर लाइन अंग्रेजी प्रशासन की प्रस्तावित योजनाओं में शामिल रही। 1996 में इस लाइन पर भी सर्वे हुआ। लेकिन इन सर्वेक्षणों के नतीजे रेलवे नौकरशाही की फाइलों में दफ्न होकर रह गए। इस वर्ष संसद के बजट सत्र में रेलमंत्री ममता बनर्जी ने रामनगर-चौखुटिया रेल लाइन के सर्वेक्षण का प्रस्ताव किया है। प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान लोकसभा में सतपाल महाराज और राज्यसभा में भगत सिंह कोश्यारी ने पहाड़ में रेल की जरूरत की पुरजोर वकालत की। जवाब में रेलमंत्री ने धन की कमी का रोना रोते हुए इतना जरूर जोड़ा कि अगर राज्य सरकार इन रेलमार्गों के निर्माण में सहयोग दे तो इन्हें हकीकत में बदला जा सकता है।
विशेषज्ञों की राय में तकनीकी तौर पर इन दोनों रेललाइनों के निर्माण में कोई दिक्कत नहीं। जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के निदेशक डॉ. पी. सी. नवानी, जो जम्मू-कश्मीर रेल योजना के सलाहकार भी रहे हैं, कहते हैं कि उत्तराखंड के पहाड़ रेल लाईन बिछाने के लिहाज से पूरी तरह सुरक्षित हैं। उनका दावा है कि यहाँ चट्टानों की मजबूती कश्मीर के अपेक्षा कहीं बेहतर है। इसके अलावा उत्तराखंड में रेल लाईनों को अंतिम गंतव्य तक लाने के लिए ज्यादा चढ़ाई नहीं चढ़ानी पड़ेगी। उदाहरण के लिए टनकपुर से बागेश्वर के 154 किमी रेलमार्ग के लिए उसे 500 मीटर ऊपर उठाना होगा। अन्य प्रस्तावित मार्गों पर भी कमोबेश यही बात लागू होती है।
हैरत की बात है कि पहाड़ों में रेलगाड़ी लाने का मुद्दा उत्तराखंड राज्य आंदोलन की प्रमुख माँगों में शामिल नहीं रहा। कठिन भौगोलिक बनावट और इससे उपजने वाले आर्थिक पिछड़ेपन ने अलग राज्य की माँग के लिए जमीन तैयार की थी। राज्य को पिछड़ेपन से उबारने में भौगोलिक दुर्गमता सबसे बड़ी बाधा है। इससे सामान्य आवागमन तो मुश्किल होता ही है, कृषि उत्पादों की परिवहन लागत उन्हें अलाभकारी स्तर पर पहुँचा देती है। राज्य की अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख अवयव पर्यटन है, लेकिन सड़क आवागमन की दुष्करता इसे एक सीमा से आगे विकसित नहीं होने देती। पहाड़ों में मोटर गाड़ी का सफर बेहद कष्टप्रद होता है, इसलिए ज्यादातर पर्यटक नैनीताल या मसूरी जैसे मैदानों से सटे हिल स्टेशनों से आगे जाने की हिम्मत नहीं करते। अगर उत्तराखंड के भीतरी हिस्सों तक रेलगाड़ी पहुँचती है तो इससे राज्य का पर्यटक उद्योग अभूतपूर्व ऊँचाइयाँ छूने लगेगा। इसके अलावा दूरदराज की उपजाऊ घाटियों के कृषि उत्पादों को लाभकारी कीमतों पर मैदान के बाजारों में पहुँचा पाना संभव होगा।
सतोपंथ एक्सप्रेस की कल्पना
पल भर को सोचिए, अगर ऋषिकेश से कर्णप्रयाग तक रेल लाइन बिछाने का तत्कालीन अंग्रेज डिप्टी कमिश्नर क्ले का सपना हकीकत का बाना पहन लेता तो आजादी से पहले ही अलकनंदा घाटी की सर्पीली वादियाँ क्वीन ऑफ गढ़वाल या फिर हिमालयन क्वीन जैसे नाम वाली रेल की सीटियों से गूँज रही होतीं। आजाद भारत में इसका नाम बदरीनाथ मेल या अलकनंदा शटल जैसा कुछ होता और आज यदि पहाड़ के इस ख्वाब का नामकरण करना हो तो अलकापुरी एक्सप्रेस या सतोपंथ एक्सप्रेस जैसा नाम बहुत भाता। आइए, इस कल्पनिक रेल को सतोपंथ एक्सप्रेस नाम से ही पुकारें। सतोपंथ ऋषिकेश- कर्णप्रयाग- बदरीनाथ मार्ग के अंतिम शिखरों के बीच 14,400 फीट की ऊँचाई पर स्थित दो किमी. की परिधि वाली एक विहंगम कुदरती झील है जो अलकनंदा, भगीरथ और खड़क नामक हिमनदों से घिरी है। यही अलकनंदा का उद्गम स्थल है। इसके उत्तुंग पर हिमालय के नीलकंठ और चौखंभा हिमशिखर खडे़ हैं। सतोपंथ झील बदरीनाथ धाम से करीब 22 किमी के पैदल पथ पर है। यह इलाका अलकापुरी कहलाता है। सतोपंथ के ठीक आगे स्वर्गारोहिणी नामक भव्य हिमशिखर है, जिसपर सीढ़ीनुमा ग्लेशियर साफ नजर आते हैं। मान्यता है कि पांडवों ने स्वर्ग जाने के लिए यही मार्ग अपनाया था और युधिष्ठिर इसी पथ से स्वर्ग में विलीन हुए थे।
—जारी रहेगा
पता नही क्यों सभी पहाड़्वासी इस अव्यवहारिक मुन्गेरीलाल के सपने को पाले बैठे हैं और कुछ नेता लोग अपनी नेतागिरी इस सपने को दिखाकर चमका रहे हैं। वर्तमान में ऊत्तराखण्ड के पहाड़ो में रेल की बात करना एक बचकानेपन से अधिक कुछ नही है। सवाल रेल के पहाड़ पर चलने का नही हमारी प्राथमिकता और उससे जनता को मिलने वाले लाभ का है। जब तक उत्तराखण्ड के मैदानो में भी रेल ढंग से नही रेंग पाती तब तक यह सब बकवास है। मेरे विचार से अगर कोई नया रेलमार्ग अत्यन्त महत्व्पूर्ण हो सकता है तो वह राईवाला से कोट्द्वार, कालागढ़ होते हुये रामनगर तक हो सकता है इस रेलमार्ग को दोनो तरफ़ से दिवारयुक्त तथा बीच में जानवरों के पार करने के लिये ब्रिजयुक्त बनाया जाये तो इससे प्रदेश के दोनो भागों को आपस में जोड़्ने में सहायता मिलेगी तथा कार्बेट पार्क के पर्यावरण को भी सुरक्षित रखा जा सकेगा। यह नया रेलमार्ग प्रदेश के लिये बहुत ही लाभदायक हो सकता है अगर सरकार, रेलवे विभाग, जनता तथा नेता निजी स्वार्थों को छोड़्कर मिलकर इसके लिये पहल करे तथा पर्यावरण मंत्रालय से अनापत्ति प्राप्त करने का प्रयास करें। अगर मेरी बातों से किसी की भावनाओं को ठेस पहुची हो तो क्षमा चाहता हुं पर केवल भावनाऎं ही प्रदेश का कलयाण नही कर सकती है कुछ ठोस और लाभदायक तथ्य भी ध्यान में रखे जाने चाहिये।
If one travels (after waiting for several hours at Tanakpur) via Champawat to Jauljibi, through Pithoragarh s(he) knows the importance of the train. Train will make a big difference! A few tunnels and bridges, you are there! Thousands of crores is being spent on Migs. Chandrayans and what not. WHY NOT ONE MORE TRAIN LINE?
My vote ‘for train’ in hills.
Best wishes,
Prem
परिकल्पना बहुत अच्छी है, काश ये मुमकिन हो पाता जो हर उत्तराखंडी का सपना है,रेल ही क्यूँ ?एक कदम पीछे सड़क की ही सोचे ,उन इलाकों के बारे मैं जो जिला मुख्यालयों से मात्र ८-१० किलोमीटर की दुरी मैं होने के वावजूद अभी तक सड़क के लिए तरस रहे हैं, जहाँ यदि कोई बीमार भी पड गया तो सिर्फ डोली ही अस्पताल ले जाने का एकमात्र साधन है,जिस कारन कभी-कभी ये डोली यात्रा उनकी अंतिम यात्रा बन कर रह जाती है.ऐसे भी गाँव हैं जहाँ आज से १० वर्ष पहले सड़क खुदान तो सुरु हुवा था और गाँव के लोग ख़ुशी के मारे होली-दिवाली सब साथ ही मानाने लगे थे की अब हमारे गाँव भी मोटर आएगी,लेकिन ये अब तक हो न सका,मुझे एक गाँव के सयाने व्यक्ति का कहा याद आ रहा है-कि तुम लोग समय से पहले ख़ुशी मत मनाओ,मुझे नहीं लगता कि ये सड़क हमारे जीते जी यहाँ पहुचेगी-वही हुवा भी…..लेकिन सपने बुनने मैं क्या जाता है -यदि वो सुहाने हों तो! किसे दोष दें -नेता जी को जो हमेशा चुनाव से पहले दिलाशा देने आते हैं और पक्का वादा भी कर जाते हैं कि इश बार तो आपके गाँव मैं सड़क ही नहीं गाडी भी आएगी,जो अगले चुनाव तक नहीं आती है,या फिर भ्रस्ट नौकरशाहों को जो केवल अपने कमीशन से मतलब रखते हैं, और ठेकेदार कि तो बात ही क्या करें वो तो खून-पशीना ही इसलिए बहाते है कि उसका नफा होता रहे-ग्राम प्रधान भी अ़ब इसी श्रेणी मैं आते हैं-अ़ब रही आम जनता कि बात वो सब जानती हैं पर चुप रहती है कि कौन किसका बुरा बने जब अपना प्रधान ही अपना नहीं रहा…हाँ कभी कभार प्रधान जी दारू पार्टी मैं सौकिनो को जरुर खुश कर देते हैं…. हो सकता है आपको लग रहा हो कि मैं रेल कि पटरी से उतर गया हूँ -पर मैं ये नहीं समझता- हाँ रेल से पहले भी काफी कुछ मेरे उत्तराखंड मैं पटरी मैं लाना बांकी है -शिक्षा और स्वास्थ्य पहली प्राथमिकता होनी चहिये -इनकी संख्या बडाना ही काफी नहीं होगा,गुणवत्ता पर धयान देना होगा…..
इस सबके वावजूद फिर भी सबसे अधिक ख़ुशी मुझे होगी जिस दिन सतोपंथ एक्सप्रेश का सपना साकार करने कि दिशा मैं काम सुरु होगा -क्या फरक पड़ता हैं कि हम इसे नहीं देख सकेंगे,हमारी आने वाली नस्लें तो देख पाएँगी-यही हमारी परंपरा है .
परिकल्पना बहुत अच्छी है, काश ये मुमकिन हो पाता जो हर उत्तराखंडी का सपना है,रेल ही क्यूँ ?एक कदम पीछे सड़क की ही सोचे ,उन इलाकों के बारे मैं जो जिला मुख्यालयों से मात्र ८-१० किलोमीटर की दुरी मैं होने के वावजूद अभी तक सड़क के लिए तरस रहे हैं, जहाँ यदि कोई बीमार भी पड गया तो सिर्फ डोली ही अस्पताल ले जाने का एकमात्र साधन है,जिस कारन कभी-कभी ये डोली यात्रा उनकी अंतिम यात्रा बन कर रह जाती है.ऐसे भी गाँव हैं जहाँ आज से १० वर्ष पहले सड़क खुदान तो सुरु हुवा था और गाँव के लोग ख़ुशी के मारे होली-दिवाली सब साथ ही मानाने लगे थे की अब हमारे गाँव भी मोटर आएगी,लेकिन ये अब तक हो न सका,मुझे एक गाँव के सयाने व्यक्ति का कहा याद आ रहा है-कि तुम लोग समय से पहले ख़ुशी मत मनाओ,मुझे नहीं लगता कि ये सड़क हमारे जीते जी यहाँ पहुचेगी-वही हुवा भी…..लेकिन सपने बुनने मैं क्या जाता है -यदि वो सुहाने हों तो! किसे दोष दें -नेता जी को जो हमेशा चुनाव से पहले दिलाशा देने आते हैं और पक्का वादा भी कर जाते हैं कि इश बार तो आपके गाँव मैं सड़क ही नहीं गाडी भी आएगी,जो अगले चुनाव तक नहीं आती है,या फिर भ्रस्ट नौकरशाहों को जो केवल अपने कमीशन से मतलब रखते हैं, और ठेकेदार कि तो बात ही क्या करें वो तो खून-पशीना ही इसलिए बहाते है कि उसका नफा होता रहे-ग्राम प्रधान भी अ़ब इसी श्रेणी मैं आते हैं-अ़ब रही आम जनता कि बात वो सब जानती हैं पर चुप रहती है कि कौन किसका बुरा बने जब अपना प्रधान ही अपना नहीं रहा…हाँ कभी कभार प्रधान जी दारू पार्टी मैं सौकिनो को जरुर खुश कर देते हैं…. हो सकता है आपको लग रहा हो कि मैं रेल कि पटरी से उतर गया हूँ -पर मैं ये नहीं समझता- हाँ रेल से पहले भी काफी कुछ मेरे उत्तराखंड मैं पटरी मैं लाना बांकी है -शिक्षा और स्वास्थ्य पहली प्राथमिकता होनी चहिये -इनकी संख्या बडाना ही काफी नहीं होगा,गुणवत्ता पर धयान देना होगा…..
At least the train service should be up to Tankapur and Govt. has to increase no. of trains towards Haldwani/Kathgodam.
कल्पना बहुत अच्छी है, काश ये मुमकिन हो पाता जो हर उत्तराखंडी का सपना है, आप तो रेल के बात करते है , हमारे उधर तो ये हॉल है ,—————– ग्राम सभा दियौना- भीने मे १० साल से एक ही बात है की रोड आएगी पर आज तक नहीं आयी है , सल्ट के बिध्याक रणजीत सिंह रावत जो पिछले १२ सालो से सल्ट के बिधायक है , चुनाव के समय हर – बार यही कहते है की अबकी बार तो रोड जरुर दिया जायेगा . पर चुनाव ख़त्म होने के बाद बस ये सब बाते एक भाषण हे रह जाती है, पिछले चुनाव मे तो उन्होंने दो पुथिया रोड भी काट डाली ताकि जनता को बेकूफ बनाया जाय, चुना लगया गया , पिलयर लगाये गए, पर शायद भोली जनता यह नहीं जानती की ये चुना उनको लग रहा है, वास्तव मे यही हुआ , रोड का सपना – सपना हे रह गया , जबकि , दियोना , भीने , काने, खल्पति, रिक्वाशी , मत्वाश से रोड कम से कम 7-८ किलोमीटर दूर है , पर यहाँ अभी तक रोड नहीं है जो बहुत ही कष्टदायी है, यहाँ के लोगो का जीवन बहुत हे कस्त्दायी है , पर भी हमारे बिधायक जी को चिंता नहीं है,
जहाँ यदि कोई बीमार भी पड गया तो सिर्फ डोली ही अस्पताल ले जाने का एकमात्र साधन है, कई लोगो के साथ ऐसा हुआ भी है , इसके एक नहीं काफी उदहारण है , , जिस कारन कभी-कभी ये डोली यात्रा उनकी अंतिम यात्रा बन कर रह जाती है जबकि अपने वह पर तो जब वह पहले बार बिध्याक बना उस ही समय रोड बना दिया , आज दंगुला ग्राम सभा , या फिर शाशिखाल मे जायोगे तो ऐसा लगेगा जैसे आप किसी सहर मे प्रवेश कर गए है . ग्राम प्रधान भी अ़ब इसी श्रेणी मैं आते हैं-अ़ब रही आम जनता कि बात वो सब जानती हैं पर चुप रहती है कि कौन किसका बुरा बने जब अपना प्रधान ही अपना नहीं रहा… तो और क्या हो सकता है , ,,,,,,,,,,,,,,,,,,, माननीय रणजीत सिंह इन बातो पर थोडा गौर जरुर करे…
गुणवत्ता पर धयान देना होगा…..
आपकी भोली – भाली जनता
दियौना , भीने , काने , खल्पति , रिक्वाशी , मत्वाश, चमन पुर , सिस्वादी ,आदि के लोग
Mujhe nahi lagta hai ki, uttrakhand walon ka sapna kabhi sachch ho payega. kyonki abhi to uttrakhand mai road marg ka sahi se vikash nahi ho paya hai. or log maidani bhagon mai jakar basne lage hai.jo uttrakhand ke pichhdne ka mul karan banta ja raha hai. jo road bani bhi hai wah her mahine tuthti rahti hai. or is saal to inderdev ne bhi khub kripa nibhayi hai. But hamen is samay ekjut hone ki awsyakta hai. or centeral goverment ke akhon ko kholna hai. ( Aap ka bhai- Dinesh Singh Panwar Darmola Rudrapryag Uttrakhand -9654395499)