शंकर सिंह भाटिया
ललिता चंदोला वैष्णव 102 साल की उम्र में भी अपने लिए नहीं, बल्कि समाज की चिंता करते हुए इस दुनिया से विदा हुई। इस संवेदनहीन समाज ने उन्हें समझने की कोशिश तक नहीं की। इसके बावजूद वे समाज को कुछ देने के लिए संघर्षरत रहीं।
मूल रूप से वे शिक्षाविद थीं। उ.प्र. के कई महाविद्यालयों में पढ़ाने के बाद जब देहरादून लौटीं तो उनके मन में एक ही चिन्ता थी, कैसे अपने पिता विश्वंभर दत्त चंदोला की विरासत को आगे बढ़ाएँ। स्वतंत्रता आंदोलन में बहुमूल्य योगदान देने वाले जिन महापुरुषों को हमारे समाज ने भुला दिया है, उनमें ‘गढ़वाली’ के यशस्वी सम्पादक विश्वंभर दत्त चन्दोला भी एक हैं। उस दौर में पत्रकारिता के जो प्रतिमान उन्होंने स्थापित किए, वे अद्वितीय हैं। ललिताजी अपने पिता की इस विरासत को आज के समाज के लिए जीवंत बना देना चाहती थीं।
मेरी उनसे मुलाकात इसी परिप्रेक्ष्य में हुई। वे चंदोला जी के जन्म दिन पर आयोजित होने वाले कार्यक्रम से पहले उनके बारे में अखबार में एक लेख प्रकाशित कराना चाहती थीं। उन्होंने बहुत सारी सामग्री सहेज कर रखी थी। वह सामग्री उन्होंने मुझे सौंपी। लेख अखबार में प्रकाशित हो गया तो उन्हें बहुत अच्छा लगा। उसके बाद वे हर बार ऐसे आयोजनों पर मुझे बुलाने लगीं। ‘विश्वंभर दत्त चंदोला शोध संस्थान’ की स्थापना के लिए उनके द्वारा किए जा रहे प्रयासों में बाधा डालने वाले नेताओं तथा अफसरों की कहानियाँ भी वे सुनाती थीं। हालाँकि इसके पीछे किसी की बुराई उनका मकसद नहीं होता था। अपने दृढ़ निश्चय के बल पर ही वे इन बाधाओं को पार करने में काफी हद तक सफल हो पाई।
पहले गढ़वाल भवन में एक कक्ष लेकर चंदोला जी की विरासत को आम आदमी तक पहुँचाने का बीड़ा उन्होंने अकेले उठाया। बहुत सारे शोध छात्रों ने ललिता जी द्वारा बनाई गई इस लाइब्रेरी का फायदा उठाया। स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में गढ़वाली समाचार पत्रों में लिखे गए लेखों में उस समय के समाज और राजनीति के अक्स उभरते थे।
ललिताजी इस शोध संस्थान को बृहद रूप देना चाहती थीं। इसके लिये उन्होंने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया। अंततः उन्हें सहस्त्रधारा रोड पर संस्थान के लिए सरकार से भूमि मिल गई। एक भवन भी वहाँ खड़ा हो गया। इस प्रयास में उन्हें नेताओं के कड़वे अनुभव मिले, सूचना विभाग के अफसरों और बाबुओं ने उन्हें जलील किया, लेकिन यह उनका जीवट था कि इतनी अधिक उम्र में भी अकेले वह इन सब विपरीत परिस्थितियों से दो चार होती रहीं।
मुझे नहीं पता कि उनके इस दुनिया से विदा होने के बाद शोध संस्थान की जिम्मेदारी अब कौन संभाल रहा होगा। लेकिन मुझे इस बात का बहुत दुःख है कि अंतिम दिनों में उनके दर्शन नहीं हो पाए। एक दिन उनका फोन भी आया कि वे शायद अब अधिक न जियें, वे मिलना चाहती हैं। पत्रिका में प्रकाशित करने के लिए वे एक लेख और पत्रिका का वार्षिक शुल्क देना चाहती थीं। व्यस्तता की वजह से मैंने अपने मित्र बाबू राम बौड़ाई को उनके पास भेजा। पता चला कि लक्ष्मण चैक के जिस घर में वे रहती थीं, अब वहाँ नहीं रहतीं। उनका नया पता भी नहीं मिल पाया। उनका पता लगा कर उनसे मिलने जाने का विचार था कि उनके देहान्त का समाचार आ गया। मन ग्लानि से भर गया। दूसरों से अधिक संवेदनहीन तो मैं निकला।
वे पूरी उम्र बिता कर र्गइंं। उनके जीवट के सामने हम नतमस्तक हों, इसके साथ ही यह जरूरी है कि हम उनके द्वारा स्थापित ‘विश्वंभर दत्त चन्दोला शोध संस्थान’ को और बृहद रूप दें……उनके सपने को मरने न दें।
ललिता चंदोला वैष्णव का निधन उत्तराखंड के लिए एक बहुत बड़ी बौद्धिक क्षति है. उनकी ससुराल नंदप्रयाग में थी और मेरी बहिन की ससुराल भी वहीँ होने के कारण मैं उन्हें दीदी बोलता था. उनके कार्य दुनियां के सामने हैं. खास कर उन्होंने विश्वम्भर दत्त चंदोला शोध संस्थान की स्थापना कर प्रदेश के शोधार्थियों के लिए एक बहुत बड़ा प्लेटफोर्म बनाया है. लेकिन बहुत कम लोगों को पता होगा कि उस संस्थान के ११ सस्थापक सदस्य कोंन थे. उन सदस्यों में कैप्टन शूरवीर सिंह पंवार, परिपूर्ण नन्द पैन्यूली, राधा कृष्ण कुकरेती, कर्नल सकलानी, देवेन्द्र भसीन और मैं जयसिंह रावत भी शामिल थे. उस संस्थान के अध्यक्ष पैन्यूली जी और सचिव कुकरेती जी बनाये गए.दौढ़भाग के लिए मुझे सहायक सचिव बनाया गया. उस संस्थान के पंजीकरण के लिए मैंने और भसीन साहब ने रजिस्ट्रार ऑफिस के न जाने कितने चक्कर लगाये होंगे. बहरहाल संस्था बनी और काम भी शुरू हुवा . संस्थान हर साल विश्वम्भर दत्त चंदोला जी की याद में कार्यक्रम करता था. लेकिन मुझे बाद में लगा की मेरा काम केवल दरी बिछाना, कुर्सियां लगाना और चाय पिलाना ही है मैं किनारे हो गया. भसीन साहब गैर गढ़वाली थे इसलिए वह पहले ही किनारे हो गए थे. मई चाहता हूँ की आज के धांसू पत्रकार और संस्थान के कर्ताधर्ता संस्थान के पंजीकरण के कागजात भी देखें. ताकि उन्हें संस्थापकों के बारे में भी जानकारी हो.
जय सिंह रावत
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