फोन के सुदूर छोर से मीना भाभी सिसकती हुईं कह रही थी, ‘‘मैं अब कभी आने को नहीं कहूंगी वीरेन! बार-बार दिल्ली आकर भी तुम बिना मिले लौट जाते रहे, जबकि प्रमोद कितना बुलाता रहता था तुम्हें।’’ मैं इस छोर पर अपराधी सा शर्मसार, खामोश और साथ ही दुख विगलित। लेकिन पाँच अप्रेल की शाम को मैं गया। मॉर्डन स्कूल के गेट नम्बर दो से। मनहूस लगते कनात…..शामियानों…अल्यूमिनियम के बड़े-बड़े भगौनों को लांघता, उस भव्य सभागार में जो बाहर की सीढ़ियों से लेकर मंच तक पीले सफेद फूलों की गदराई मालाओं से सजा हुआ था। मंच पर तनिक ऊँचाई पर वैसी ही माला में कसी रखी थी अगरबत्ती के धुएँ के पीछे से लगातार खिलखिलाकर हँसते प्रमोद की श्वेत-श्याम फोटो। एक दिलफरेब आवारा जैसी। बीच-बीच में व्यवधान सा बनाते युगल युवा पंडितो के कर्कश गीतादि पाठ के बावजूद माहौल में शोक की वह उदात्तता थी जिसके बीच स्मृति एक निस्पृह खुशी की तरह मौजूद रहती है। पूरी तरह भरे हुए हॉल में प्रमोद के परिजन, कभी के सहकर्मी, चाहने वाले और दोस्त- लेखक- कवि- पत्रकार- रंगकर्मी- संगीतकार सभी मौजूद थे …..गोया उसकी बहुरंगी शख्सियत के अलग-अलग टुकड़े। मीना भाभी, बेटियाँ, चीनू, तान्या और ब्रिटिश जामाता बर्नाड तो खैर सभा के आयोजक ही थे। सत्तर के दशक के त्रिलोचन के शब्दों में ‘ताप के ताए’ दिनों के प्रमोद के घनिष्ठ मित्र-सखा असगर वजाहत, पंकज बिष्ट, मंगलेश डबराल, आनंद स्वरूप वर्मा, इब्बार रब्बी, पंकज सिंह, असद जैदी, रामगोपाल बजाज जैसे जाने पहचाने चेहरे तो थे ही, योगेन्द्र आहूजा और हीरालाल नागर जैसे युवतर रचनाकार भी थे। हल्द्वानी में इन दिनों घर बनवा रहे चीनी भाषा के मर्मज्ञ कवि पत्रकार त्रिनेत्र जोशी के अलावा और भी हजारों ऐसे होंगे, जिन्हें तब तक खबर ही न हो पाई होगी या जो चाह कर भी पहुँच न सके होंगे मगर जिनके भीतर से प्रमोद का गहरा छापा कभी उतरने न पायेगा। वह छापा उसके बच्चों जैसे भोलेपन, सच्चाई, उत्साह, आत्मीयता, उत्कट जिजीविषा और हर समय कुछ नया कर गुजरने की लालसा का छापा है। अपने दोस्त, उस्ताद फिल्मकार ऋत्विक घटक के इस जुमले की वह अक्सर याद दिलाता था कि हमें अपने भीतर अपने बचपन का एक टुकड़ा हमेशा बचा छिपाकर रखना चाहिए। दुबली देह में हेकड़ी इतनी कि हर ऐब में सबसे आगे तैयार, हालाँकि मासूमियत भरे वे ऐब भी होते ही क्या थे ? भरी जवानी में उसका एक रुग्ण फेफड़ा काट कर निकाल दिया गया था, मगर इससे इकतारे की धुन पर चलती उसकी अलमस्ती और यारबाशी में कोई फर्क नहीं पड़ा था। अंत तक वह वैसा ही रहा…..आत्मदया के बगैर। अपनी भारी खरखरी आवाज में जीवन और दोस्तों और मीना भाभी को पुकारता।
प्रमोद दा हम तुम्हें प्यार करते रहेंगे…
वो वक्त ही ऐसा था कि ‘‘जो तेरा है वो भी मेरा है, जो मेरा है वो तो तेरा है ही।’’ प्यार और उम्मीद से भरे उस मासूम वक्त के शहंशाह हुआ करते थे हजरत प्रमोद जोशी और शहंशाह भी ऐसे कि खुद को ही दिये दिये फिरते थे। स्वयं पाये के कवि, छायाकार, पत्रकार, फिल्मकार बनने के पूरे माद्दे के बावजूद वह हमेशा मित्रों की छाया में बने रहे……कभी भी तेज दौड़ने का मंसूबा नहीं बनाया। जिन-जिन को भी कठिन दिनों में पोसा वे सब ऊँचे घने हो गये और प्रमोद खुद अकुंठ तृप्त भाव से ठुड्डी सहलाते हुए उनकी बढ़त देखते रहे। इतना जरूर है कि पिछले साल सवा साल में अपनी रह-रह कर उभर आने वाली साँस की तकलीफ के दौरान और बीमारी के अकेलेपन में वे अपने उन्हीं मित्रों को देखने के लिए तरसते रहते थे। वह फोन पर मनुहारें करते मगर जिन्दगी के जंजालों में फँसे वे नाशुक्रे …….इन पंक्तियों का लेखक भी उनमें शामिल है ……..बामुश्किल उन तक जा पाते। यह मलाल सभी के दिलों में बरकरार रहेगा, उनके लिए उस प्यार के साथ।
प्रमोद के अंदर तीखी अंतदृष्टि, न्यायपूर्ण क्रोध और अतीव शांति का एक अजीबोगरीब झुटपुटा था। प्रकाश और छाया, जीवन और मृत्यु का सतत घटता एक विलक्षण कौतुक! उसके इकलौते कविता संग्रह ‘यहाँ हवा रही होगी’ ……जो मंगलेश की कोंचाकांची और मशक्कत के बाद कहीं 1994 में जाकर छपा, की कविताओं में भी यह खेल दिखायी देता है और उसकी खींची हजारों हजार तस्वीरों में भी। पाँच अप्रेल की उसकी स्मृति सभा में इन तस्वीरों का जो चयन उसकी सुघड़ बेटियों ने प्रस्तुत किया, वह तो सिर्फ एक छोटा सा नमूना था। अगर वह कहीं अपनी उस फिल्म को सचमुच बना सका होता, जिसे फ्रेम दर फ्रेम वह कई बार दोस्तों को सुना चुका था, तो मुमकिन है कि हिन्दी सिनेमा को उसका ऋत्विक घटक मिल जाता। आखिर ऋत्विक के बेहद निकट रहकर ही तो कैमरे की भाषा की बारीकियाँ उसने सीखी
थीं। ![]()
ऐसे ही अल्मोडे़ की पृष्ठभूमि पर अपने ख्याली उपन्यास को अगर वह लिख देता तो एक जबरदस्त कृति हिन्दी को मिली होती। सच्ची बात यही है कि दिल्ली में पैदा होने, पढ़ने-खटने और मरने के बावजूद प्रमोद दा था निखालिस अल्मोड़िया। लगातार आखिर वह रहा तो कितना होगा अल्मोड़ा में ! बस यदा कदा। वही छुट्टियों में ही तो शायद! मगर तब के अल्मोड़ा की बात भी ‘औरी’ थी। आत्मगौरव और सांस्कृतिक ठसक से भरा उत्तराखंड का इकलौता नागर नगर था वह, शांत, सुघड़, साफ, ठंडा और मीठा, गुण ग्राहक और कभी-कभी हेकड़ तथा काइयाँ। सो प्रमोद जोशी का बाँकापन वहीं का। नफासतपसंदी और फराखदिली भी वहीं की। वही रसिकता का पुट लिए किस्सागोई। उस शहर के चरित्रों, जनश्रुतियों इतिहास और भूगोल का ऐसा बखान वह करता था, जैसे तीन-चार सौ साल वहीं गुजारे हों। तब अल्मोड़ा परदेश में भी अपने बाशिंदों के दिलों में ऐसे ही उतरा रहा करता था। फिर वह तो ‘दिल ए प्रमोद जोशी’ था।
मगर उसने उपन्यास न लिखना था न लिखा, कमबख्त चला भी गया।























Beautiful!