जीवन का चक्र विचित्र है, जो कई बार मनुष्य को कहाँ से कहाँ पहुँचा देता है। इस विकास यात्रा में परिस्थितियों और समाज का भी बहुत योगदान होता है। शेरदा ने स्कूल में क ख ग तो नहीं सीखा, मगर जिन्दगी की पाठशाला में इतना कुछ सीख लिया कि उन्हें ‘पहाड़ का रवीन्द्रनाथ टैगोर’ तक कह दिया गया।
खाते-पीते माल गाँव में जिन्दगी की शुरूआत में ही मलाई खाते-खाते उनके सामने सूखी रोटी के भी लाले पड़ने की नौबत आ गई। दूसरों के पशु चराने की मजदूरी के बाद अल्मोड़ा में ‘बचुली मास्टरनी’ के घर नौकर न बने होते तो ककहरा भी न सीख पाते और न बॉय कम्पनी में भरती होकर फौज में ड्राइवर बन पाते। उत्तराखंड की अनेक साहित्यिक प्रतिभाओं के जीवन में सेना और अर्द्धसैनिक बलों की बड़ी भूमिका रही है। भजन सिह ‘सिंह’ हों या मोहन थपलियाल या लीलाधर जगूड़ी, सभी के बनने बिगड़ने में फौज का कुछ न कुछ रोल जरूर रहा है। शेर सिंह बिष्ट ‘अनपढ़’ भी इसी सिलसिले की एक कड़ी थे। फौज की नौकरी के दौरान ही 1962-63 में उन्होंने पूना में ‘ये कहानी है नेफा और लद्दाख की’ और ‘दीदी-बैंणि’ नामक किताबें लिखीं।
फौज ने उनकी जिन्दगी को जितना तराशना था, तराशा। परिस्थितियों ने फिर जोर मारा। बीमार हुए तो वापस घर यानी अल्मोड़ा पहुँच गए। यहाँ फिर एक और बड़ी घटना उनकी प्रतीक्षा कर रही थी। नैनीताल में भारत सरकार के ‘गीत एवं नाट्य प्रभाग’ का गठन होने वाला था। चारु चन्द्र पाण्डेय के जरिए ब्रजेन्द्र लाल साह से उनका परिचय हुआ और हीरे तलाशने में माहिर ब्रजेन्द्र लाल साह ने उन्हें प्रभाग में भरती कर लिया। सरकार ने इस संस्था की स्थापना चाहे जिस मकसद से की हो, मगर इस संस्था ने हमारे समाज और हमारे दौर के इतिहास को अनेक रूपों से प्रभावित किया है। लेनिन पंत, हरिकृष्ण लाल शाह, राजकिशोर मिश्रा, वाचस्पति ड्यूँडी, धरमबीर परमार, गोपाल बाबू गोस्वामी और सबसे अलग गिरीश तिवाड़ी ‘गिर्दा’ जैसे अनेक नगीनों को समाज को अपने-अपने ढंग से गति देने में सक्षम बनाने का मंच प्रदान करने वाले गीत एवं नाट्य प्रभाग की दशा आज चाहे कितनी बुरी क्यों न हो गई हो, हमारे समाज की विकास यात्रा में उसने अपना रोल बखूबी निभाया। शेरदा का इस प्रभाग से जुड़ना शेरदा और कुमाउनी कविता, दोनों के लिये अहम रहा।
इसी दौर में शेरदा का जुड़ाव आकाशवाणी लखनऊ से प्रसारित होने वाले ‘उत्तरायण’ कार्यक्रम से हुआ। कुमाउनी-गढ़वाली का यह एक घंटे का कार्यक्रम साठ और सत्तर के दशक में देश का सबसे लोकप्रिय रेडियो कार्यक्रम था। उत्तरायण ने शेरदा की कविताओं को प्रसार दिया, लोकप्रियता दी और शेरदा की रचनात्मकता को विस्तार भी दिया।
शेरदा से मेरा करीबी परिचय ‘मेरि लटि पटि’ के सिलसिले में हुआ था। राजहंस और हुड़का प्रकाशन से छपी उस किताब को उसके मुख पृष्ठ के लिये भी याद किया जाना चाहिये। ‘मेरि लटि पटि’ में शेरदा की अनेक दार्शनिक कविताएँ हैं। दरअसल मंच से मिली लोकप्रियता ने शेरदा को हास्य और व्यंग तक सीमित कर दिया जबकि वे कहीं अधिक बड़े कवि हैं। वे शब्दों के जादूगर थे। उनकी रचनाओं ने हमें कुमाउनी के सैकड़ों अनजाने, अप्रचलित और गुम होते जा रहे शब्दों से भी परिचित कराया। एक व्यक्ति के रूप में उनकी सहजता विलक्षण थी। बात-बात में सामने वालों के चेहरों पर मुस्कान फैला देना उनकी स्वभावगत खूबी थी। कुमाउनी और उत्तराखण्ड की लोकभाषाओं के प्रेमियों को उनकी कमी हमेशा खलती रहेगी। उत्तराखंड आंदोलन के उतार के दिनों की हताशा से उतरने को प्रेरित करती उनकी ये पंक्तियाँ बहुत याद आयेंगी -
चार कदम हिटा,
हाय तुम पटै गो छा ?
के दगडि़यों से गो छा ?
भुलि गो छा बन्दूके गोई
तुमरै मैं बैणि मरि
हिमालायक शेर छा तुम
दु भितरै फै गोछा ?
के दगइियो से गो छा ?