हरीश राणा
14 अक्टूबर की दोपहर को शैले हॉल में पहुँचता हूँ तो देखता हूँ कि ‘तुगलक’ नाटक के लिये ढेर सारी प्लाईवुड की शीटों से एक भव्य सैट का निर्माण किया जा रहा है। रंगकर्म के अपने सुदीर्घ अनुभव के चलते मुझे यह गुमान हो गया है कि थियेटर को जानने वाला इस शहर में मेरे अलावा और कोई नहीं है, जिसे नाटक की एबीसीडी भी आती हो…. (ऐसे भ्रम यहाँ के बहुत सारे और लोगों को भी हैं)। लेकिन नैनीताल में ऐसा सैट मैंने पहली बार देखा था। मेरे से बुजुर्ग नाट्यकर्मियों ने देखा हो तो कह नहीं सकता…। सैट में ही कम से कम 40-50 हजार रुपया लग गया होगा। मैं मन ही मन ‘बाबा इन्टरटेनमेंट्स सांस्कृतिक समिति, नैनीताल’ के निर्देशक रितेश सागर के दुस्साहस की दाद देने लगा। इतना बड़ा सैट मात्र तीन दिन के मंचन के लिए! और वह भी सम्मानित दर्शकों के लिए ‘फ्री ऑफ कॉस्ट’..! तभी मिथिलेश पाण्डे, जो इस नाटक में तुगलक की केन्द्रीय भूमिका निभा रहा है, सामने से आता दिखा। उसने नाटक की अपनी ड्रेस दिखाई और बताया कि सारा कॉस्ट्यूम हल्द्वानी से सिलवाया गया है, जिसमें कम से कम 15-20 हजार रुपया खर्च हो गया है।
खैर होते-होते 15 अक्टूबर की शाम भी आ गई है। शैले हॉल खचाखच नहीं भरा है। 7 बजकर 3 मिनट पर नाटक शुरू होता है और 10 बजकर 23 मिनट पर खत्म होता है। लाईट ऑन होती है। हॉल से आधे से ज्यादा लोग नदारद हो चुके हैं। पात्र परिचय होता है…और तालियाँ बजती हैं।
पहले दिन नाटक में गति नहीं रही। हालाँकि कलाकारों ने अपनी पूरी ताकत नाटक में झोंक दी थी, लेकिन साढ़े तीन घंटे तक आज के दर्शक को बाँध कर रखना कोई आसान काम नहीं है बाबा ! दूसरे दिन नाटक ने रफ्तार पकड़ ली। पहले दिन की खामियाँ लगभग दूर हो गईं। फेड इन व फेड आउट में कम समय लगा। दर्शकों की संख्या में भी इजाफा हुआ।
नाटक का अन्तिम दिन यानी कि 17 अक्टूबर की शाम….। शैले हॉल में दर्शकों की संख्या कमोबेश वही है। साठ के दशक में गिरीश कर्नाड द्वारा कन्नड़ में लिखित व बाद में एनएसडी के ब. व. कारन्त द्वारा उर्दू में अनूदित ‘तुगलक’ आज अपने पूरे शबाब पर है….. मिथिलेश पाण्डे आज अपने अभिनय के चरम पर है। सौतेली माँ बनी गायत्री बिष्ट व बरनी के रूप में संजय कुमार आज अपने करेक्टर के साथ खूब खेल रहे हैं। अजीज की भूमिका में वरिष्ठ रंगकर्मी धर्मवीर परमार, सौतेली माँ डॉ. बीना सुयाल, गंगोत्री बिष्ट, आरती धामी के साथ-साथ युवा कलाकार रेहान अख्तर, पवन कुमार, दीपक सहदेव, संजय कुमार, अंकित चौधरी अनवर रजा, सूर्यप्रताप सिंह, नीरज डालाकोटी, रोहित वर्मा, चारु तिवारी, नासिर अली, मो. जावेद हुसैन, शाहिद वारसी ने अपनी भूमिकाओं के साथ न्याय किया। हालाँकि बहुत सारे लोगों का मानना है कि संवादों में फारसी के कठिन शब्दों की जगह हिन्दुस्तानी के प्रचलित शब्द रख दिये जाते तो नाटक ज्यादा ग्राह्य हो जाता। संगीत में भी प्रयोग करने की तमाम गुंजाइश थी। तो भी आज का मंचन यादगार बन पड़ा है।
…..रात के 11 बजे घर लौटते हुए मैं सोच रहा हूँ कि महीनों तक रिहर्सल करने वाले इन कलाकारों ने हासिल क्या किया ? मुठ्ठी भर दर्शकों की चन्द तालियाँ ? रितेश सागर को क्या मिला ? सिर्फ आत्मसन्तुष्टि ! मुन्नी के बदनाम होने व शीला की जवानी को हम लोग पैसा देकर घण्टों देखते रह सकते हैं, इन युवा रंगकर्मियों को फौकट में साढ़े तीन घंटे तक भी नहीं देख सकते ?