दीपा काण्डपाल
विगत 20 वर्षों से निर्बाध सम्पन्न हो रही ‘नैनीताल समाचार’ की निबंध प्रतियोगिता की उल्लेखनीय विशेषता यह है कि इसमें निबंध का विषय उसी समय दिया जाता है। दिल खोलकर किसी सहृदय के सामने अपनी बात रखने और मर्यादा में रहकर अपने अंग्रजों से बात करने में जो फर्क होता है वही इस प्रतियोगिता का सबसे प्रशंसनीय बिन्दु है। प्रतियोगिता आरम्भ होने से ठीक 5 मिनट पहले विषय की प्रतीक्षा में खड़े बच्चों के चेहरो पर जो उत्सुकता दिखाई देती है वह अद्भुत होती है। इस वर्ष भी जब वरिष्ठ व मध्यम वर्ग को विषय मिला ‘भ्रष्टाचार, कौन है इसका जिम्मेदार’ तो अभी तक स्क्रीन पर अन्ना जी का आन्दोलन देखने वाले बच्चों की आँखों में कुछ ऐसी चमक दिखलाई दी, जैसे निबंध के माध्यम से बच्चे सारा भ्रष्टाचार मिटा डालेंगे। बच्चो, तुम्हें क्या पंसद है तो प्रायः पूछा ही जाता है। कनिष्ठ वर्ग के बच्चों से भी शायद पहली बार ही किसी ने पूछा होगा कि तुम्हें खराब क्या लगता है।
कनिष्ठ वर्ग (कक्षा 4, 5 व 6) के बच्चों के लिये यही विषय था, ‘मुझे सबसे खराब लगता है’। अपने दैनिक जीवन से प्रारम्भ खेल का मैदान, दोस्तों की बातें, माता-पिता का व्यवहार, खाने की वस्तुएँ, अपनी गली-मोहल्ले, कपड़े, भाई-बहन, कुत्ते, चींटी, अन्य जानवर और यहाँ तक कि आस-पड़ोस में जो भी उन्हें खराब लगता था, बच्चों ने खुलकर कह डाला। किसी-किसी को गन्दे बने लोग और कूड़ा बीनने वाले भी बुरे लगते हैं तो एक बच्चे को तो लड़कियाँ अच्छी नहीं लगतीं, बिना बात मारने वाला भाई, झगड़ालू बहन, रोती हुई बिल्लियाँ, बरसात का मौसम, गुस्सा करने वाली टीचर, झूठी शिकायत करने वाला दोस्त, सड़क पर गन्दगी करने वाले पालतू जानवर और उनके मालिक, मिठाई पर बैठी मक्खियाँ, जोर-जोर से आवाजें निकाल कर लड़ने वाली पड़ौसिन, माँ को गाली देने वाला पिता आदि आदि….. न जाने कितनी स्थितियाँ ऐसी होती हैं जो बच्चों को खराब लगती हैं, पर झेलनी तो पड़ती हैं। बच्चे न तो इनका विरोध कर सकते हैं, न ही इनसे समझौता कर पाते हैं।
सुखद आश्चर्य हुआ यह पढ़कर कि बच्चों को ज्यों ही अवसर मिला उन्होंने खुल कर बता डाला कि उन्हें सबसे खराब क्या लगता है। 90 प्रतिशत बच्चों को चोरी, शराब, झूठ, चुगली, गंदगी, बीमारी, टीचर की डाँट और भ्रष्टाचार सबसे खराब लगता है। 50 प्रतिशत बच्चे ऐसे हैं, जिन्हें सब्जी खाना और सुबह जल्दी उठना बहुत खराब लगता है। प्रायः सभी बच्चों ने किसी न किसी रूप में लिखा है कि प्रदूषण उन्हें सबसे खराब लगता है। कुछ बच्चों ने अपनी व्यक्तिगत बातें, दोस्तों के साथ घटी छोटी-छोटी वे बातें, जो उन्हें बुरी लगीं, विस्तार से लिख डालीं।
तृतीय पुरस्कार प्राप्त अमित कुमार सिंह, कक्षा 6, पार्वती प्रेमा जगाती सरस्वती विहार ने लिखा है, ‘‘मुझे सबसे खराब लगता है अत्याचार। मुझे यह भी पता है कि गरीब लोगों पर यह अत्याचार कौन कर रहा है। जो कर रहे है वो निम्नलिखित है- 1. गरीब गाँव में रहने वाला अमीर आदमी, 2. गाँव के मुखिया सरंपच, जिलाधिकारी और मुख्य पद पर रह कर राज करने वाला आदमी।’’ द्वितीय पुरस्कार प्राप्त पार्वती प्रेमा जगाती सरस्वती विहार के ही कक्षा 6 में पढ़ने वाले आयुष आनन्द को भी भ्रष्टाचार, आतंकवाद और ईर्ष्या बहुत खराब लगती है। उन्होंने लिखा है, ‘‘मुझे बहुत खराब लगता है जब कोई किसी को बिना मतलब का मारता है। मै गांधी जी की तरह बनना चाहता हूँ।’’ सांत्वना पुरस्कार प्राप्त यश बिष्ट, कक्षा 6, लेक्स इण्टरनेशनल स्कूल भीमताल को हिंसा करना सबसे खराब लगता है। ‘‘हिंसा को रोककर हमें अहिंसा को अपनाना चाहिए पर कहने से कुछ नहीं कुछ कर दिखाने से होगा।’’ प्रथम पुरस्कार प्राप्त गौरवान्वित मेहरा, कक्षा 6, लौंग व्यू पब्लिक स्कूल को शराब ने इतना आहत किया है कि उन्होंने शराब पीने वालों को संदेश दे डाला, ‘‘जिन्दगी मिली है जीने के लिए, मत करो बरबाद इसे पीने के लिए’’।
रक्षिका राणा, कक्षा 6, मोहन लाल साह बाल विद्या मंदिर को लड़कों को लड़कियों से ज्यादा प्यार करना भी अच्छा नहीं लगता। गौरव प्रताप सिंह खाती, कक्षा 5, बिशप शॉ इण्टर कॉलेज को पान-गुटखा खाकर थूकने वाले और दीवार पर लिखने वाले लोग नापसन्द हैं तो आशुतोष तिवाड़ी, कक्षा 6, राजकीय इण्टर कॉलेज नैनीताल को जानवरों को सताने और दूसरे की काट करने वाले। हेनांग गुणवन्त, कक्षा 4, सेंट जोजेफ कॉलेज को भाई की शरारत, अमेरिका, काला रंग और छोटे बच्चे खराब लगते हैं। कुछ बच्चों को मांस, अण्डा, मलाई, बासी खाना, मूली, कद्दू, करेला, पपीता, जलेबी, मिर्च, मोमो, दवाई खाना खराब लगता है, तो कुछ ऐसे भी हैं जिन्हें दाँत मलना, स्कूल से आकर कपड़े बदलना, होम वर्क करना, पढ़ाई करना, स्विमिंग क्लास बिल्कुल अच्छी नहीं लगती। नितिन रावत, कक्षा 6, निर्मला जूनियर हाईस्कूल को तो तब बुरा लगता है जब जेब में पैसे नहीं होते।
प्रायः बड़े सयाने लोगों को लगता है कि बच्चे इस तरह की बातों में ध्यान नहीं देते, लेकिन आशुतोष कुमार, कक्षा 6, पार्वती प्रेमा जगाती सरस्वती विहार को समाज में भेद-भाव, छुवा-छूत कतई नापसन्द हैं तो बड़ों का आदर न करने वाले लोग आकांक्षा ठुगुन्ना, कक्षा 6, बसन्त वैली पब्लिक स्कूल व दिव्या पाण्डे, कक्षा 6 बिशप शाॅ इण्टर कॉलेज को वृद्ध लोगों की मजाक बनाना, टीचर की मजाक बनाना, पशुओं को घुमाने ले जाकर गंदगी करने वाले लोग अच्छे नहीं लगते। नैनीताल नगर की सुन्दरता को बिगाड़ने वाली गंदगी प्राय सभी बच्चों को खराब लगती है। बस में मँूगफली के छिलके फैलाने वाले, मलमूत्र बिखराने वाले, कुत्तों से बुरा व्यवहार करने वाले, घमण्डी व अमीर लोग भी बच्चों को खराब लगते है। दिव्यांशी रौतेला, कक्षा 4, सेंट स्टीफेन स्कूल को अपना मोहल्ला सबसे खराब लगता है। गन्दे नेता लोग, चोर लोग भी बच्चों को खराब लगते हैं। एक छात्र को अपने पिता इसलिए खराब लगते है कि वे शराब पीकर माहौल बिगाड़ते हैं और माँ की गाली देते हैं। एक छात्र को फैशन करने वाली लड़कियाँ और जींस पहनकर शान मारने वाले खराब लगते हैं।
वरिष्ठ वर्ग (कक्षा 10, 11 व 12) का विषय ‘भ्रष्टाचार, कौन है इसका जिम्मेदार’ विद्यार्थियों को इतना भाया कि हजारे जी के आन्दोलन के जैसा जोश इन निबन्धों में उमड़ आया। भ्रष्टाचार को अनेक रूपों में बच्चों ने व्याख्यायित किया है और उसकी जिम्मेदारी भी तय की है। 95 प्रतिशत विद्यार्थियों ने राजनेताओं, अधिकारियों और बड़े पदों पर काम करने वाले लोगों को इसका जिम्मेदार ठहराया है। सभी निबंधों में अन्ना हजारे, कलमाड़ी और हाल में हुए घोटालों का जिक्र हुआ है। तृतीय पुरस्कार प्राप्त रुचि भट्ट, कक्षा 12, सेंट मैरीज कोन्वेन्ट लिखती है, ‘‘भ्रष्टाचार हमारे अन्तर्मन से प्रारम्भ होता है। यही हमारे घरों में स्कूलों में समाज में तथा समूचे विश्व में फैलता है… हम अपने घरों में माता पिता को झूठ बोलते देखते हैं शिक्षिकाओं को पढ़ाने के बजाय पूरा प्रश्न पत्र बताते हुए देखते हैं तो उन्हीं के द्वारा समझाये गये कार्य न करने की सीख की सार्थकता उनके ऐसे भ्रष्ट आचरण के समक्ष बौनी होकर रह जाती है।’’ दीपक बिष्ट ,कक्षा 12, रा.इ.कालेज नैनीताल, ने लिखा है कि यदि हम स्वयं सुधर जायें तो पूरा समाज सुधर जायेगा क्योंकि समाज से हम नहीं वरन् हम से समाज बनता है। भ्रष्टाचार के लिए स्वयं को जिम्मेदार मानने वाले विद्यार्थियों ने इसके मूल में लालच को देखा है। उनका मानना है कि यदि बचपन से लालच न पनपाया जाये तो बड़े होकर भ्रष्टाचारी होने का सवाल ही नहीं बनता। समाज में हर तरफ फैले भ्रष्टाचार पर बच्चों की नजर गयी है, चाहे वह राशन की दुकान हो या गैस वितरण का ऐजेण्ट। घूस देकर अपराधी को छुड़ाने वाला व्यक्ति हो या चोरों के साथ मिलकर हाथ साफ करने वाला पुलिस अधिकारी। ट्यूशन करने वाला शिक्षक हो या सफेदपोश राजनेता, अपने लाभ के लिए वनों का कटान करने वाला फॉरेस्ट ऑफिसर, सरकारी कर्मचारी, काम टालने वाले कामचोर, आलसी लोग। द्वितीय पुरस्कार प्राप्त प्राची जोशी, कक्षा 10, मोहन लाल साह बाल विद्या मंदिर ने लिखा है, ‘‘भ्रष्टाचार केवल नेताओं के कर्मो में ही नहीं छलकता, आज के हर साधारण प्राणी के कामों की नींव ही भ्रष्टाचार प्रतीत होती है। ऑफिस से लेकर कक्षा तक सभी के मन में भ्रष्टाचार का बीज बो दिया गया है। आज बाबा रामदेव या अन्ना हजारे जी द्वारा किये गये तप भी भ्रष्टाचार की नींव को हिलाने में असमर्थ होते दिखाई दे रहे है।’’ भ्रष्टाचार से त्रस्त समाज को भ्रष्टाचार मुक्त समाज बनाने के लिए हमारे सीनियर वर्ग व मध्यम वर्ग के बच्चों ने जो सुझाव दिये है वे किसी विचारक से कम के नहीं हैं, यथा माता-पिता का बच्चों को संस्कार देना व स्वयं अनीति न करना, शिक्षकों का आदर्श होना, स्वार्थ से ऊपर उठकर देश व समाज के बारे में सोचना, मातृभूमि को स्वार्थ व लालच के कारण नुकसान न पहुँचाना, भ्रष्ट नेताओं का बहिष्कार करना, अपना भला व समाज का भला एक साथ सोचना, राष्ट्रीय सम्पत्ति की रक्षा करना, खेल भावना से खेलों को आगे बढ़ाना, समाज के भले लोगों को मिलकर आगे आना, भ्रष्ट व्यक्ति की पोल खोलना, गलत तरीके से कमाये गये पैसों का लाभ न लेना आदि-आदि सुझाव दिये गये हैं। सांत्वना पुरस्कार प्राप्त रुचि तिवाड़ी, कक्षा 12, हरमन माइनर भीमताल ने लिखा है, ‘‘आज ऐसे बुद्धिजीवियों की आवश्यकता है जो भ्रष्टाचार के अन्त के उपाय खोज कर ले आयें, जो स्वयं भ्रष्ट न हों अन्यथा इस समस्या से छुटकारा हमारे लिए असम्भव हो जायेगा। हम सभी को प्रण लेना होगा कि हम सभी भ्रष्टाचार का त्याग करें ताकि एक आदर्श समाज की स्थापना हो सके।’’ प्रथम पुरस्कार प्राप्त अमित कुमार सिंह, कक्षा 11, भारतीय शहीद सैनिक विद्यालय नैनीताल ने एक उक्ति उद्धृत की है, ‘‘जो अति आनप व्याकुल होई। तरु छाया सुख जानैई सोई।’’ और भ्रष्टाचार के ताप से समाज को मुक्त कराने के उपायों पर गहन चितंन किया है। इन बच्चों को शिकायत है उनसे जो इसके विरुद्ध आवाज नहीं उठाते। भ्रष्टाचार के मुख्य कारक वे लोग हैं, जो जनता के साथ होने वाले अत्याचार में भ्रष्टाचारियों का सहयोग करते हैं। इनमें वकील सबसे मुख्य हैं जो हर बार जब किसी नागरिक द्वारा आवाज उठाई जाती है, उन्हें ये काले कोट वाले दबा देते हैं। जिससे सभी नागरिक हताश हो जाते हैं। उन्हें किसी के सहारे की जरूरत होती है। पर कौन देने वाला है सहारा ?
मध्यम वर्ग (कक्षा 7,8 व 9) में प्रथम पुरस्कार प्राप्त आनन्द राज, कक्षा 9 अ, पार्वती प्रेमा जगाती सरस्वती विहार ने काले धन का व्यापार करने वालों पर व सांत्वना पुरस्कार प्राप्त प्रतिभा तिवारी, कक्षा 8, हरमन माइनर स्कूल, भीमताल ने लिखा है, ‘‘जिन्होंने काला धन दूसरे देशों में छुपा रखा है अगर वह काला धन भारत में वापस आ जाए तो भारत फिर से दुनिया का अमीर देश बन जायेगा।… अगर अभी देश की जनता सतर्क नहीं हुई तो कल बहुत देर हो जायेगी। अगर और लोग कुछ नहीं करेंगे तो हम युवा पीढ़ी को ही भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठानी पड़ेगी।’’ कुछ ऐसे ही विचार हैं तृतीय पुरस्कार प्राप्त शेफाली बिष्ट, कक्षा 8, माउण्ट एल्बर्न स्कूल, नौकुचियाताल के, ‘‘हमें जल्द से जल्द भ्रष्टाचार नाम के इस दानव का अन्त करना होगा वरना यह दानव हमारे पूरे समाज को निगल जायेगा…अभी हम बहुत छोटे हैं पर हमें छोटी सी कोशिश ही कर लेनी चाहिये।’’ द्वितीय पुरस्कार प्राप्त प्रणव पन्त, कक्षा 9, लेक्स इण्टर नेशनल स्कूल, भीमताल लिखते हैं, ‘‘भ्रष्टाचार की जड़ है मंत्री, ध्यान दें जड़ है जिम्मेदार नहीं। भ्रष्टाचार के जिम्मेदार आप हैं, आप जैसे भारतीय नागरिक हैं। कैसे ?… जो मंत्री भ्रष्टाचार फैला रहे हैं उन्हें आपने ही तो वोट दिया है… अब जो गलती हो गई सो हो गई, अब उसे सुधारने का वक्त है। अगली बार वोट देते समय ध्यान रखें कि कहीं आपका वोट भ्रष्टाचार में मदद तो नहीं कर रहा?’’ श्रुति पंत, कक्षा 10, सेंट मेरीज कॉन्वेंट को अफसोस है कि समृद्ध परम्परा के धनी होते हुए भी हम भ्रष्टाचारी हो गये हैं। वे लिखते हैं, ‘‘अगर आज महात्मा गांधी होते तो उनका सिर शर्म से झुक जाता।’’ फामजा खान, कक्षा 11, लेक्स इण्टर नेशनल स्कूल, भीमताल ने स्पष्ट शब्दों में लिखा है, ‘‘इस बार लड़ाई है भारतीयों और भ्रष्ट भारतीयों के बीच… एक अण्णा को सरकार कुचल सकती है पर एक करोड़ अण्णाओं को नहीं…आजादी की दूसरी लड़ाई लड़ने का वक्त आ गया है।’’ शुभम कुमार, कक्षा 12, सी.आर.एस.टी.इण्टर कॉलेज को चिंता है देश के मान-सम्मान की और भ्रष्टाचार के कारण पनप रही नकारात्मक सोच की वे लिखते हैं, ‘‘भ्रष्टाचार से रचनात्मकता मारी जाती है। इससे लोग नई सोच रखना भूल जाते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि सारा खेल रिश्वतखोरो का है फिर हमारे नये विचारों का क्या फायदा ?’’ इन्होंने अब्दुल कलाम साहब का भी जिक्र किया है जिन्होंने कहा था भ्रष्टाचार की शुरुआत अपने घर से होती है इसलिए सबसे पहले अपने घर में भ्रष्टाचार मिटाने की कोशिश होनी चाहिए। प्रथम पुरस्कार प्राप्त अमित कुमार सिह, कक्षा 11, भारतीय शहीद सैनिक विद्यालय, नैनीताल ने तो दिखावे को लेकर अपना आक्रोश व्यक्त किया है, ‘अब्दुल कलाम जी आये तो यातायात, ट्यूब लाइट सब दुरुस्त कर दी गई ताकि वो बार-बार सोचें कि वाह क्या शहर है।’’ किसी के लिए रामदेव जी भी दान लेकर भ्रष्टाचार के जिम्मेदार हैं तो कोई अपने मित्रों को ही इसका जिम्मेदार मानता है। कई निबन्ध आक्रोश से भरे हैं तो कई भावनाओं में बहकर आहत चित्त से लिखे गये हैं। इन्हें देखकर एक बात तो साफ है कि आज की नई पीढ़ी जागृत है। आत्मोद्धार एवम् देशोद्धार को पृथक-पृथक रूप में परिभाषित करने की गलती ये नहीं करेंगे। गिर्दा की तरह मुझे भी लगता है-चाहे हम नि लै सकूँ मगर..जैता कोई तो ल्यालो….।
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इस प्रतियोगिता के प्रायोजक नैनीताल बैंक लि0
14 अगस्त 2011 को सम्पन्न हुई इस बार की प्रतियोगिता में 25 स्कूलों के 344 विद्यार्थी शामिल हुए। वरिष्ठ वर्ग में 111, मध्यम वर्ग में 125 तथा कनिष्ठ वर्ग में 108 विद्यार्थियों ने भाग लिया। वरिष्ठ व मध्यम वर्ग का विषय था ‘भ्रष्टाचार कौन है इसका जिम्मेदार’ तथा कनिष्ठ वर्ग का विषय था ‘मुझे सबसे खराब लगता है’। वरिष्ठ वर्ग में प्रतियोगिता के निर्णायक थे सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य हरीश जोशी तथा रंगकर्मी मदन मेहरा। मध्यम वर्ग के निर्णायक थे समाजशास्त्र विभाग कुमाऊँ विश्वविद्यालय की डॉ. इन्दु पाठक व लगभग 15 वर्ष पूर्व इसी प्रतियोगिता में पुरस्कृत हो चुकीं अस्मिता बजाज। कनिष्ठ वर्ग के निर्णायक रहे रंगकर्मी भुवन बिष्ट व अनुपम उपाध्याय। इन 20 सालों में 5,991 विद्यार्थियों ने प्रतियोगिता में भाग लिया। इनमें से कई प्रतियोगियों ने बाद के वर्षों में निबंध प्रतियोगिता का संचालन किया और निर्णायक मण्डल में भी रहे। |
‘बीसवीं नैनीताल समाचार निबंध प्रतियोगिता’ का पुरस्कार वितरण समारोह 23 अक्टूबर को शहीद मेजर राजेश अधिकारी राजकीय इन्टर कॉलेज नैनीताल में सम्पन्न हुआ। इस बार पार्वती प्रेमा जगाती सरस्वती विहार ने ‘चल वैजयन्ती’ प्राप्त की। समारोह के मुख्य अतिथि ‘पोलीथिन बाबा’ के नाम से चर्चित समाजसेवी प्रो. प्रभात उप्रेती ने अपने उद्बोधन में बच्चों से कहा कि आने वाले समय में अभिव्यक्ति के बिना जीवन मुश्किल हो जायेगा इसलिए पढ़ने के साथ ही खूब लिखने की आदत भी डालें। उन्होंने अपने जीवन के कई रोचक प्रसंगों का उल्लेख करते हुए बताया कि अभिवयक्त करने की कला किस तरह हमारे जीवन में काम आती है। वरिष्ठ अधिवक्ता देवीदत्त सांगुड़ी ने कहा कि बच्चों ने अपने निबंधों के माध्यम से वह काम किया है, जो संसद में बैठे हमारे चुने हुए प्रतिनिधियों को करना चाहिए। लेकिन हमारे सांसद, विधायक सदन में बातचीत करने की बजाय एक-दूसरे पर कीचड़ उछालते और तोड़-फोड़ करते हैं। बच्चे हम बड़ों से कहीं अधिक सजग व समझदार हैं।
mujhe yeh jaankar badi prasanta hui ki nanital samachaar ne baccho ka koulam banya hai