प्रवीन कुमार भट्ट
चुनाव के मद्देनजर उत्तराखंड में उत्तराखंड क्रांति दल के नेतृत्व में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, भाकपा (माले), उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी और उत्तराखंड जनवादी पार्टी का मोर्चा अस्तित्व में आ गया है। कम्युनिस्ट पार्टियों और छोटे दलों के लिए यह चुनाव अपने एजेंडे को जनता तक पहुँचाने का माध्यम भर है, लेकिन सवाल उक्रांद को लेकर है। इस दल को अपनी साख बचाने के लिए भी समझौते करने पड़ रहे हैं। पृथक राज्य की एकमात्र माँग को लेकर अस्तित्व में आये और सालों तक संघर्ष करने वाले यूकेडी को नये राज्य के पहले विधानसभा चुनाव में केवल चार सीटें ही हासिल हो पाईं। इससे भी बुरी स्थिति तो तब हुई, जब 2007 के चुनाव में वह और नीचे खिसक कर तीन सीटों पर पहुँच गई। अब नये परिसीमन और बदली परिस्थितियों में होने जा रहे इन चुनावों में पार्टी के लिए अपनी बची-खुची साख को बचाए रख पाना आसान नहीं होगा। चुनाव से ठीक पहले पार्टी दो हिस्सों में टूट गई है। जहाँ दूसरे दलों ने चुनाव की तैयारियाँ शुरू कर दी हैं, यूकेडी को अभी तक अपने चुनाव चिन्ह और झंडे तक का पता नहीं है। यह मामला निवार्चन आयोग की दहलीज पर है। पार्टी का एक गुट कैबिनेट मंत्री दिवाकर भट्ट के नेतृत्व में भाजपा के साथ खड़ा है, जबकि दूसरा सरकार पर लगातार हमले कर रहा है।
पृथक उत्तराखंड राज्य की आग 25 जुलाई 1979 को उत्तराखंड क्रांति दल के गठन के बाद ही तेजी से भड़की थी। कांग्रेस और भाजपा तो बहुत बाद तक पृथक राज्य को गैरजरूरी बता कर खारिज करते थे। नवम्बर 1987 में एक बयान में अटल बिहारी वाजपेयी ने उत्तराखंड की माँग को देशद्रोही करार दिया था। नारायण दत्त तिवारी ने तो राज्य आन्दोलन के चरम के दिनों में तक यह कहा कि उत्तराखंड मेरी लाश पर बनेगा। मगर उक्रांद ने संघर्ष जारी रखा। गठन के एक साल बाद, 1980 में हुए चुनाव में जसवंत सिंह ने रानीखेत से जीतकर पार्टी का खाता खोल दिया। 1989 में जसवंत सिंह के अतिरिक्त पिथौरागढ़ से काशी सिंह ऐरी ने भी अपना चुनाव जीता। 1989 के इस चुनाव में में पर्वतीय जिलों में यूकेडी के 19 में से 11 प्रत्याशी दूसरे स्थान पर रहे थे। संसदीय चुनावों में भी काशी सिंह ऐरी केवल सात हजार और इंद्रमणी बड़ौनी 11000 वोटों से हारे थे। 23 नवम्बर 1987 को बोट क्लब में यूकेडी के नेतृत्व में निकली 2 लाख से अधिक लोगों की रैली को किसी भी राज्य गठन की माँग को लेकर दिल्ली में हुई सबसे बड़ी रैली बताया जाता है। इस दौरान कुमाऊँ और गढ़वाल कमिश्नरियों में 24, 36, 48 और 72 घंटे के बंद हुए। कांग्रेस ने इस लड़ाई को भटकाने के लिए हिल कौंसिल और केन्द्र शासित राज्य जैसे शिगूफे छोड़े। मगर 1994 में मुलायम सिंह यादव द्वारा शिक्षण संस्थानों में लागू किये गये ओबीसी आरक्षण के विरोध ने पृथक राज्य आंदोलन के लिए ऑक्सीजन का काम किया। अन्ततः राज्य भी बना मगर यह प्रमुख क्षेत्रीय दल सत्ता में आने के बजाए आज अपने वजूद को लेकर संघर्ष कर रहा है।
असल में यूकेडी आन्दोलन की परम्परा राज्य गठन के बाद कायम नहीं रख पाई। राजधानी, जल, जंगल, जमीन, रोजगार, पलायन और पहाड़ में औद्योगीकरण जैसे मुद्दों पर उसे लगातार आन्दोलन करने थे। मगर पार्टी सरकार की गणेश परिक्रमा में लग गई। 2007 में जैसे ही भाजपा ने न्यौता दिया, यूकेडी तत्काल सरकार में शामिल हो गई मानो तैयार बैठी हो। यह यूकेडी की बड़ी भूल साबित हुई। हालाँकि यूकेडी ने समर्थन 9 मुद्दों पर दिया था, मगर न भाजपा ने इन मुद्दों पर कार्रवाही करने की कोई कोशिश की और न ही यूकेडी ने उस पर गंभीरता से कोई दबाव बनाया। इतना जरूर हुआ कि उसे सरकार में एक कैबिनेट मंत्री का पद मिल गया। इस मंत्री पद से जनता का तो कुछ भला नहीं हो पाया, अलबत्ता अब पार्टी दोफाड़ जरूर हो गई है। संघर्षां से निकला यूकेडी का एक बड़ा धड़ा शुरू से सरकार को समर्थन देने के खिलाफ था। लेकिन दूसरा धड़ा राजनीतिक स्थिरता की बात कहकर अपनी बात मनवाने में सफल रहा। यह कशमकश लगातार जारी रही और 2010 में यूकेडी अध्यक्ष पद पर त्रिवेन्द्र सिंह पँवार की ताजपोशी हुई, उन्होंने समर्थन वापसी का ऐलान कर दिया। मगर कैबिनेट मंत्री दिवाकर भट्ट और उनके समर्थक सरकार से चिपके रहे और पार्टी दोफाड़ हो गई। सदन में यूकेडी के तीन विधायकों में से अकेले पुष्पेश त्रिपाठी ही पँवार के साथ आए। यूकेडी द्वारा औपचारिक रूप से 27 दिसम्बर 2010 को सरकार से समर्थन वापस लेने के बाद पार्टी के चुनाव चिन्ह की लड़ाई चुनाव आयोग में चल रही है। पँवार गुट के पास सदन के बाहर कार्यकर्ताओं का अधिक समर्थन है, विधानसभा में तीन में से दो लोग दिवाकर के साथ हैं। समर्थन वापसी के एक साल बाद तक मंत्री पद की मलाई खा चुकने के बाद चुनाव नजदीक देख कर अब दिवाकर भट्ट एकता की बात भी कर रहे हैं, और इसके लिये उन्होंने एक कमेटी भी बना दी है। लेकिन पँवार ने उस ओर ध्यान नहीं दिया है। दिवाकर के साथी विधायक ओमगोपाल रावत को भी अपनी सीट जाती हुई लग रही है। यही कारण है कि पाँच साल तक पहाड़ के सवालों पर मौन रहने के बाद वे विधानसभा के पिछले सत्र में मैदानी लोगों के जाति प्रमाण पत्र के मामले में बसपा विधायक काजी निजामुद्दीन से भिड़ पड़े। इससे पूर्व पुष्पेश त्रिपाठी द्वारा सदन में गैरसैंण राजधानी का मुद्दा उठाने पर भी ओमगोपाल ने उनका समर्थन नहीं किया था, जबकि काजी निजामुद्दीन ने पार्टी लीक से हटकर गैरसैंण का समर्थन किया। घबराये हुए दिवाकर भट्ट अब अपनी पुरानी सीट देवप्रयाग छोड़ कर हरिद्वार से चुनाव लड़ना चाहते हैं।
यूकेडी के केन्द्रीय अध्यक्ष त्रिवेन्द्र सिंह पवार का कहना है कि भाजपा-कांग्रेस को रोकने के लिए तीसरे मोर्चे का गठन किया गया है। अगर मोर्चा आकार नहीं लेता, तो पार्टी सभी 70 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। पार्टी में एकता की सम्भावना को उन्होंने सिरे से नकार दिया। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि चुनाव आयोग की मान्यता भी उन्हें ही मिलेगी। वहीं दिवाकर भट्ट के लिए मुसीबतें बढ़ रही हैं। भाजपा भी सरकार को समकर्थन देने वाले यूकेडी के इन दो विधायकों के लिए सीट छोड़ने के मूड में कतई नहीं है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बिशन सिंह चुफाल ने कहा कि इस मामले में अभी कोई विचार नहीं हुआ है। जबकि पार्टी प्रवक्ता सतीश लखेड़ा का कहना है कि इस मामले में जल्दी ही फैसला हो जाएगा।



























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