सच्ची लगन हो तो मुकाम तक पहुँचने में औपचारिक शिक्षा और डिग्री की कमी आड़े नहीं आती है। इस उक्ति को चरितार्थ किया उमेश चन्द्र साह ने। श्री साह अब नहीं रहे। 89 वर्ष की आयु में उन्होंने …………..अंतिम साँस ली। अब बची हैं तो सिर्फ उनकी स्मृतियाँ और उनके विशद् अनुभव जो कि उनके निजी दस्तावेजों, अखबारों की कतरनों में आज भी सुरक्षित होंगी। आने वाली पीढ़ी को उनकी बहुत जरूरत होगी।
8 मई 1922 को राजकीय उद्यान चौबटिया के कर्मचारी राम लाल साह के घर उनका जन्म हुआ। राम लाल साह बेहद अनुशासनप्रिय व्यक्ति थे। वे तत्कालीन उद्यान सुपरिंटेण्डेंट मि. नॉर्मन गिल के मार्गदर्शन में कार्यरत निस्वार्थ वनस्पति प्रेमी भी थे। बालक उमेश को घुट्टी में ही वनस्पतियों की जानकारी मिली।
कक्षा 8 तक रानीखेत में पढ़ाई के बाद उमेश चंद्र साह को पिलानी (राजस्थान) भेजा गया, जहाँ प्रख्यात शिक्षाविद् पद्मश्री शुकदेव पांडेय का सान्निध्य उन्हें मिला, परन्तु राजस्थान की प्रतिकूल जलवायु के कारण उन्हें वापस रानीखेत लौटना पड़ा। उन्होंने द्वाराहाट मिशन कॉलेज में प्रवेश लिया, मगर हाईस्कूल परीक्षा में असफल हो जाने के बाद आगे पढ़ने से मना कर दिया। तभी रानीखेत में हुई वायुसेना की भर्ती रैली में वे बतौर सैनिक चयनित हो गये, परन्तु पिता राम लाल ने उन्हें सेना में जाने से मना कर दिया। किशोर उमेंश चन्द्र साह रानीखेत में रेडियो मैकेनिकी सीखने लगे। तभी राजकीय उद्यान चौबटिया के तत्कालीन अधीक्षक जे.सी.बर्न की नजर उन पर पड़ी और जब उन्हें पता चला कि यह पट्ठा उनके हेडक्लर्क का पुत्र है तो हाई स्कूल फेल होने के बावजूद श्री बर्न ने पायरेछियम उगाने की योजना में ग्रुप 5 सुपरवाइजर के रूप में उमेश साह को तैनाती दे दी।
18 फरवरी 1944 को औपचारिक रूप से औद्यानिकी से जुड़ने के बाद उमेश चन्द्र साह ने वनस्पतियों का जो अध्ययन शुरू किया वह उनकी मृत्युपर्यन्त निर्बाध रूप से जारी रहा। 50 एकड़ जमीन में पायरेछियम उगाने का प्रयोग सफल रहा। इसके फूलों से मच्छरमार हर्बल कीटनाशक बनता है। 1946 में यह परियोजना समाप्त हो जाने के बाद 1956 तक फल गौदाम में स्टोर सुपरवाइजर व बिक्री केन्द्र प्रभारी रहने के दौरान इन्हें जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, जरनल करियप्पा और अमेरिका के मुख्य न्यायाधीश विलियन ओ. डगलस जैसी कई देशी-विदेशी हस्तियों के सम्पर्क में आने का मौका मिला। वर्ष 1956 से आगे उनकी सेवाएँ उद्यान विभाग के अन्र्तगत जोशीमठ, पिथौरागढ़, रानीखेत आदि में जारी रहीं। ऊँचे हिमालयी स्थानों में तैनाती के कारण ट्रेकिंग, फोटोग्राफी और हरबेरियम कलेक्शन उनका शगल बन गया। वर्ष 1980 में सेवानिवृत्त होने तक उमेश चन्द्र साह महज अपने अर्जित अनुभवों के बल पर निष्णात उद्यानविद् बन गये।
राजकीय सेवा से निवृत्ति के बाद इस कर्मयोगी ने मृत्युपर्यन्त पर्यावरण संरक्षण और औद्यानिकी विकास के लिए अपने को समर्पित किया। चिया, कसार ट्रस्ट, लोकचेतना मंच, उत्तराखण्ड शोध संस्थान, पहाड़, हिडा आदि नामचीन संस्थाओं ने उनके अर्जित ज्ञान को अपनी परियोजनाओं के माध्यम से जनसमुदाय तक पहुँचाने की कोशिश की। नैनीताल समाचार में औद्यानिकी पर उनके दर्जनों लेख प्रकाशित हुए। नवभारत टाइम्स, हिन्दुस्तान, स्वतंत्र भारत, नवजीवन, अमर उजाला, दैनिक जागरण, पर्वत पियूष, अल्मोड़ा समाचार आदि प्रमुख समाचार पत्रों में भी उनके आलेख छपेे। वर्ष 1977 से 81 तक रेडियो वार्ताओं के माध्यम से उन्होंने पर्वतीय सरोकारों को व्यापक रूप से प्रक्षेपित किया।
वृद्धावस्था में भी युवाओं जैसे उत्साह के साथ गले में टाई, कन्धे पर एक सामान्य सा कैमरा और पीठ पर पिट्ठू लटकाये हर आयोजन में सक्रिय शिरकत करने पहुँच जाने वाले इस विलक्षण व्यक्तित्व की अब यादे ही शेष हैं। उनका आवास 282, शिव मंदिर मार्ग, रानीखेत शोधार्थियों का केन्द्र हुआ करता था। अपने पिता राम लाल साह द्वारा तैयार पाण्डुलिपि ‘फ्लोरा रानीखेती ऐन्सिस’ का जीवन भर संरक्षण कर वे उसे आगे के लिए गो.ब. पन्त हिमालय पर्यावरण विकास संस्थान, कोसी को सौंप गये हैं। उमेश साह के कृतित्व को आने वाली पीढि़यों के लिए संरक्षित किया जाना सबकी साझा जिम्मेदारी बनती है। इस निस्वार्थ कर्मयोगी को मरणोपरान्त ही सही, किसी योग्य सम्मान से नवाजा जाना उत्तराखण्ड का मान बढ़ायेगा।