मंदाकिनी घाटी के हृदयस्थल अगस्त्यमुनि में आयोजित 22वाँ उमेश डोभाल स्मृति समारोह विशिष्ट रहा। तामझाम से दूर नितान्त सादगी से भरा यह कार्यक्रम सही मायनों में मंदाकिनी घाटी में सिंगोली-भटवाड़ी जलविद्युत परियोजना की मार झेल रहे सैकड़ों लोगों के दर्द को समझने की एक ईमानदार कोशिश थी। 24 मार्च इस समारोह की शुरूआत स्थानीय भ्रमण से हुई। समौण रेस्टोरैण्ट में ठेठ पहाड़ी नाश्ते के बाद बस में बैठकर सभी लोग मन्दाकिनी नदी पर बन रही सिंगौंली-भटवाड़ी जलविद्युत परियोजना से प्रभावित रायड़ी ओर अरकुण्ड गाँवों की ओर निकले। मार्गदर्शक के तौर पर सुशीला भण्डारी, जगमोहन झिंक्वाण व प्रकृति संस्था के गजेंद्र रौतेला हमारे साथ थे।
अगस्त्यमुनि से तीन-चार किमी. आगे विजयनगर से पुल पार कर एक सड़क बसु केदार व दूसरी मंदाकिनी के किनारे-किनारे उखीमठ और गौरीकुण्ड को गयी है। हमारी बस बसुकेदार की कच्ची और उबड़-खाबड मोटर सड़क पर चल रही है। रास्ता घुमावदार और चढ़ाई वाला है। तकरीबन दस-बारह किमी. चलने पर हम रायड़ी गाँव के बस स्टाप पर रुकते हैं। गाँव नीचे ढलान पर है। पैदल रास्ता जगह-जगह टूटा हुआ है। सौ-दो सौ मीटर चलने पर चौरस जगह पर एक प्राचीन मदिर है। पुरातात्विक महत्व की कई मूर्तियाँ मौजूद हैं। मंदिर के बगल में पंचायत घर का भवन व एक दुकान है। खेतों के किनारे चलते हुए गाँव के कई घरों की दीवारों में पड़ी दरारें साफ दिखायी दे रही हैं। रायड़ी के ग्रामीणों का मानना है कि यह सब सिंगोली-भटवाड़ी जलविद्युत परियोजना की गाँव के ठीक नीचे से गुजर रही भूमिगत सुरंग के कारण हो रहा है। आये दिन बारूद के धमाकों से गाँव थर्रा उठता है। बरसात में जमीन खिसकने की आशंका से ग्रामीण लगातार भयभीत रहते हैं। इस निर्माण कार्य की वजह से पिछले तीन-चार सालों में प्राकृतिक जलश्रोतों में पानी घट रहा है। महिलाओं को अपने खेती-बाड़ी और जंगल समाप्त होने की चिन्ता है। सुशीला हमें एक ऊँचे तप्पड़ पर मौजूद सामूहिक जंगल में ले जाती हैं और बताती हैं कि इस जगह पर एल एण्ड टी कम्पनी द्वारा सुरंग के जरिये आये पानी को ढाल देकर नीचे भटवाड़ी में बिजली पैदा करने की योजना है। सामने सुरंग निर्माण के कार्य में लगी भारी भरकम मशीनों से आ रहे शोर से इस परियोजना से होने वाले दुष्परिणामों का सहज अनुमान लग रहा था। रायड़ी बस स्टाप पर बना ग्राम पंचायत का स्वागत द्वार पिछली बरसात में सरक कर काफी नीचे चला गया है। गजेन्द्र रौतेला बताते हैं कि रायड़ी व आसपास के गाँव भूगर्भिक संरचना की दृष्टि से अति संवेदनशील हैं। इस परियोजना में मंदाकिनी के प्रवाह को कुण्ड नामक स्थान पर 22 मी. ऊँचे बैराज के जरिये रोक कर तत्पश्चात् 11.87 किमी. लम्बी सुरंग से भटवाड़ी तक ले जाने का काम चल रहा है, जहाँ इस से 33 मेगावाट की तीन टरबाइनों से 99 मेगावाट बिजली पैदा की जायेगी। इस योजना में थलई, हाट, बस्ती, बीरौ, डालसिंगी, बसुकेदार, अरकुण्ड, रायड़ी, कौशलपुर, किमाणा आदि 35 गाँव, जो समुद्र सतह से 720 से लेकर 1,400 मीटर तक की ऊँचाई पर हैं, प्रभावित हो रहे हैं। इन गाँवों में गेहूँ, धान ,मडुवा, तिल, आलू, हल्दी व अदरक की पैदावार होती है। घाटी से लगे गाँवों में आम की पैदावार भी होती है।
रायड़ी से आगे बस पुनः ऊबड़-खाबड़ और चढ़ाई भरी कच्ची सड़क पर आहिस्ता-आहिस्ता चल रही है। रास्ते में किमाणा आदि इक्का-दुक्का गाँव पड़ते हैं। खेती पाती के लिहाज से ये गाँव उत्तराखण्ड के अन्य गाँवों की तुलना में बेहतर लगे। कोई भी खेत बंजर नहीं था। 15-16 किमी. चलने के बाद कौशलपुर आया। यहाँ से हमें 3 किमी. नीचे अरकुण्ड गाँव जाना है। वहाँ ग्रामीणों के साथ जलविद्युत परियोजना के मुद्दे पर एक बैठक तय है। गाँव के चौक पर महिलाओं और पुरुषों की भीड़ है। पिछले 6-7 सालों से बन रही इस परियोजना से स्थानीय पर्यावरण पर पड़ रहे दुष्परिणामों, क्षेत्र के लोगों द्वारा चलाये गये आन्दोलन और आन्दोलनकारियों पर कम्पनी ओर प्रशासन द्वारा लगाये गये आरोपों उन पर किये गये जुल्मों पर विस्तार से बातचीत होती है। मकानों में पड़ रही दरारों, जलस्रोतों के छीजने, पानी का प्रवाह दर कम होने, खेती के चौपट होने, भूस्खलन की आशंका के साथ रोजाना सैकड़ों टन मलबा मंदाकिनी नदी में गिराये जाने से होने वाले प्रदूषण जैसी कई समस्याएँ बातचीत में उभरकर आयीं। सामाजिक व सांस्कृतिक पर्यावरण पर पड़ रहे दुष्परिणामों से भी लोग चिन्तित थे। उनका मानना था कि निकट भविष्य में इस परियोजना से ऐसी स्थितियाँ पैदा होंगी कि आने वाले दिनों में यहाँ के लोग खुद ब खुद विस्थापन को मजबूर हो जायेंगे। गिरदा के जनगीतों के साथ अरकुण्ड की बैठक समाप्त करने के बाद भ्रमण दल वापस अगस्त्यमुनि पहुँचा। रात को चैनल माउण्टेन की ओर से विकासखण्ड सभागार में जयप्रकाश पँवार ‘जे.पी.’ द्वारा ‘पहाड़नामा’ के तहत पुनाड़ के पाण्डव नृत्य की टेलीविजन प्रस्तुति दी गयी। उत्तराखण्ड की सांस्कृतिक विरासत को टेलीविजन के माध्यम से लोगों तक पहुँचाने की इस पहल को सभी की सराहना मिली।
25 मार्च को विकासखण्ड सभागार परिसर में तीन प्रदर्शनियाँ भी लगी थीं। पहली हमेशा की तरह बी.मोहन नेगी के कविता पोस्टरों की थी। दूसरी, रुद्रप्रयाग जनपद के साहित्य पर ‘लोक भाषा आन्दोलन समिति’ की ओर से लगायी गयी पुस्तक प्रदर्शनी थी। तीसरी प्रदर्शनी ‘प्रकृति’ संस्था सिल्ली द्वारा ‘ताकि सनद रहे’ नाम से लगाई गई थी, जो उत्तराखण्ड के विविध आन्दोलनों पर प्रकाशित पर्चों व पोस्टरों पर आधारित थी।
कार्यक्रम के प्रथम सत्र में ‘वर्तमान दौर में जनान्दोलनों की सार्थकता’ विषय पर डॉ. शेखर पाठक ने उत्तराखंड में गोरखा राज के अंत और ईस्ट इंडिया कम्पनी के उदय से लेकर वर्तमान दौर तक समय-समय पर चले विविध आंदोलनों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि शासकों द्वारा आम जन की उपेक्षा का क्रम स्वतंत्रता के बाद से अब तक जारी है। इस सत्र को प्रकाश उपाध्याय, रमेश पहाड़ी, ललिता प्रसाद भट्ट, जगमोहन झिंक्वाण, इन्द्रेश मैखुरी, नरेन्द्र सिंह नेगी, एडवोकेट गंगाधर नौटियाल व पी.सी.तिवारी ने भी सम्बोधित किया। अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार व उत्तराखंड लोकवाहिनी के अध्यक्ष डॉ. शमशेर बिष्ट ने की व संचालन उमेश डोभाल स्मृति ट्रस्ट के अध्यक्ष डॉ. गोविन्द पंत ‘राजू’ ने किया।
भोजनोपरान्त दूसरे सत्र में स्वतंत्र पत्रकार प्रवीण कुमार भट्ट को प्रिंट मीडिया में तथा ईटीवी के उत्तरकाशी संवाददाता सुनील नव प्रभात को इलैक्ट्रॉनिक मीडिया में ‘उमेश डोभाल युवा पत्रकारिता पुरस्कार’ प्रदान किया गया। ‘राजेन्द्र रावत ‘राजू’ जन सरोकार सम्मान’ पशुबलि प्रथा के विरोध में संघर्षरत गब्बर सिंह राणा को तथा ‘गिरीश तिवाड़ी जनकवि सम्मान’ बल्ली सिंह चीमा को उनकी अनुपस्थिति में प्रदान किया गया। ‘उमेश डोभाल स्मृति सम्मान’ साठ साल तक देश-विदेश में पत्रकारिता कर चुके ओर अभी भी क्षेत्रीय मुद्दों पर निरन्तर लिख रहे हरिश्चन्द्र चंदोला को प्रदान किया गया। कार्यक्रम की मुख्य अतिथि आन्दोलनकारी सुशीला भंडारी थीं। कार्यक्रम का संचालन अरुण कुकसाल ने किया। कार्यक्रम के संयोजक, ‘प्रकृति’ संस्था के सचिव गजेन्द्र रौतेला ने अगस्त्यमुनि जैसे पिछड़े क्षेत्र में इस आयोजन को आयोजित कराने के लिये आभार व्यक्त किया। सम्मेलन में निम्नलिखित प्रस्ताव पारित किये गये:- -
- रुद्रपयाग जिले में बन रही सिंगोली भटवाड़ी एवं फाटा-ब्यूंग परियोजनाओं को ग्रामीणों का पक्ष सुने जाने तक रोका जाये तथा निर्माता कम्पनियों के इशारे पर आन्दोलनकारियों पर दर्ज किये गये झूठे मुकदमे वापिस लिये जायें। ग्रामीणों पर दमनात्मक कार्यवाही बन्द की जाये।
- जल, जंगल व जमीन के मसलों पर सरकार स्थानीय समुदाय की हिस्सेदारी सुनिश्चित करे और किसी भी योजना को बनाने से पहले स्थानीय लोगों की सहमति ले।
- राज्य के पर्वतीय क्षेत्र में महिलाओं द्वारा जिन स्थानों पर शराबबन्दी आन्दोलन चलाये जा रहे हैं, वहाँ पर शराब की बिक्री को प्रतिबन्धित किया जाये।
- समाचार पत्रों में संस्करणवाद के कारण एक जगह का पाठक दूसरे जगह के समाचारों से वंचित होता आया है। उत्तराखण्ड में इलेक्ट्रॅानिक मीडिया की तरह ही प्रिन्ट मीडिया में भी पूरे राज्य के समाचारों को प्रतिनिधित्व मिले। इसके लिये कोई नीति बने।
आदरणीय संपादक जी,
नैनीताल समाचार को यहाँ कनाडा में पढ़ना सुखद लगता है। इसे पढ़कर अपन गौं गधेरों की याद ताजा हो जाती है। अब रोमन में लिखता हूँ.
hindi type karana bahut kathin hai merey liye.
aap log bahut achha kam kar rahe hain nainital samachar ko web me prakashit kar. aapkey alawa bahut see websites hain jo uttarakhand ki jankari ko net main laney main bahut achha kam kar rahi hain. main visheshkar merapahadforum, apnauttarakhand, euttaranchal ko dekhta hun.
mera manna hai ki jis prakar aap patrakarita ke liye umesh dobhal puruskar detey hain usi prakar aapko web patrakarita karney walon ko bho puruskar dena chahiye. jo log itni mehnat kar wibhinn jankariyan net par dal rahe hain wo sachmuch bahut bada kam kar rahe hain. hum prawasiyon ke liye to wo ek aasha ki kiran ki tarah hain.
aasha hai meri bat ko dhyan me rahtey huey agley warsh se web patrakarita ki liye bhi puruskar pradan karengey.