वजीर हस्सा
सर्वोच्च न्यायालय के एक आदेश के तहत अब पर्यटक किसी टाइगर रिजर्व के कोर एरिया में नहीं जा सकेंगे। एक स्वयंसेवी संस्था द्वारा लगाई गई जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति स्वतंत्र कुमार और न्यायमूर्ति खलीफुल्लाह की खंडपीठ ने कोर एरिया के 10 किमी. दायरे में पर्यटन पर रोक लगा दी है। याचिका में दलील दी गई थी कि मानवीय हलचल से बाघों के स्वाभाविक जीवन पर विपरीत असर पड़ता है। इस फैसले से देश भर में अभयारण्यों के आसपास विकसित पर्यटन केन्द्रों में जबर्दस्त हताशा और आक्रोश पैदा हो गया है। उत्तराखंड में रामनगर और मध्यप्रदेश में पचमढ़ी जैसे पर्यटक स्थलों से विशेष रूप से धरना, प्रदर्शन आदि की खबरें मिल रही हैं। देश में 42 टाइगर रिजर्व हैं, जो 53,547 वर्ग किमी में फैले हैं। टाइगर प्रोजेक्ट के कारण वर्ष 2008 से 2010 के बीच बाघों की संख्या 1411 से बढ़ कर 1706 हुई है, मगर अभी भी यह अभयारण्यों के इतने बड़े क्षेत्रफल को देखते हुए नगण्य है। इन अभयारण्यों में सैर के लिये आने वाले लाखों पर्यटकों के कारण भारी संख्या में लोगों को रोजगार मिलता है। इन अभयारण्यों के आसपास हजारों की संख्या में होटल एवं रिजोर्ट बन गये हैं। इनके कर्मचारियों के अतिरिक्त टूरिस्ट गाइडों, सफारी कराने वाले जीप वालों तथा छोटी-मोटी दुकानें चलाने वाले असंख्य लोगों को भी इससे रोजगार मिलता है। न्यायालय के इस फैसले से इतनी भारी संख्या में लोगों की आजीविका पर चोट लग रही है तो स्वाभाविक है कि इसका प्रतिरोध भी उतना ही जबर्दस्त होगा। यदि कोई व्यावहारिक रास्ता नहीं निकला तो स्थिति आगे चल कर विस्फोटक भी हो सकती है।
रामनगर में प्रदर्शनों और धरनों का सिलसिला चालू है। न्यायपालिका के खिलाफ तो कुछ कहा नहीं जा सकता, अतः गुस्साये लोगों की खीझ बाघ संरक्षण के लिये प्रयास करने वाली संस्थाओं पर निकल रही है। रामनगर में ही वे कुछ संस्थायें या संगठन, जो कुछ समय पूर्व तक अक्सर बाघ संरक्षण के पक्ष में पोस्टर निकाल दिया करते थे, अब पूरी तरह बचाव की मुद्रा में हैं। हालाँकि अदालत ने अपना फैसला सारे तर्क सुने या तथ्य देखे बगैर तो दिया नहीं होगा। ज्यादा से ज्यादा यह हो सकता है कि भारतीय राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के प्रतिनिधि अदालत में अपना बचाव दमदार ढंग से नहीं कर सके होंगे। यह तो हो नहीं सकता कि जिस बाघ के कारण कॉर्बेट या अन्य रिजर्वों में पर्यटन की सम्भावनायें जन्मी हों, उसी के अस्तित्व पर खतरा आये और उसी बाघ के नाम पर रोटी खा रहे लोग बिला वजह सड़कों पर उतर आयें। फिर वर्ष 2010 में हुए एक मूल्यांकन के अनुसार कॉर्बेट पार्क में तो प्रबंधन को ज्यादातर अन्य अभयारण्यों की तुलना में ‘श्रेष्ठ’ न सही, ‘बेहतर’ की श्रेणी में तो रखा ही गया। मगर अदालत का निर्णय सिर्फ कॉर्बेट को लेकर तो आया नहीं है।
इसमें दो राय नहीं कि मानवीय गतिविधियाँ वन्य जीवन को नकारात्मक रूप से प्रभावित करती हैं। इसके बावजूद हजारों सालों से मनुष्य और जानवर साथ-साथ रहते आ रहे हैं। कुछ दशक पूर्व तक जानवरों के आदमखोर हो जाने की छिटपुट घटनाओं के अलावा ऐसा देखा नहीं जाता था कि मनुष्य को जानवर या जानवर को मनुष्य से कोई बड़ा खतरा रहा हो। हाल के दशकों में यह स्थिति पूरी तरह उलट गई है। एक ओर जानवर मनुष्य को निवाला बना रहे हैं और दूसरी ओर मनुष्य ने जानवरों का जीना दूभर कर दिया है।
इस वक्त टाइगर रिजर्व के संदर्भ में यह गंभीर स्थिति दरअसल पर्यटन को लेकर चल रहे भेडि़याधँसान से पैदा हुई है। पर्यटन के बारे में न तो सरकारों की कोई स्पष्ट नीति है और न नियोजन की इच्छा। ‘जो चल रहा है चलने दो, बाद में कुछ हुआ तो देख लिया जायेगा’ भारत में सरकार और प्रशासन का मूलमंत्र है। सारी बातें इसी एक मंत्र से तय होती हैं। दूरदृष्टि तो छोड़ें, अगले दो-तीन सालों में ही कोई गतिविधि क्या रूप ले लेगी, इस पर भी सोचने की कोशिश नहीं की जाती। नियम या कानून, जहाँ हैं भी, उनका निरन्तर पालन नहीं होता और जब स्थिति नियंत्रण से बाहर हो जाती है तो हड़कंप मच जाता है। नदियों में खनन के मामले में भी एक सीमा के बाद पर्यावरण कहीं पीछे छूट जाता है और ‘रोजगार’ और ‘विकास’ का मुद्दा आगे आ जाता है। टाइगर रिजर्व का ताजा मामला भी अपवाद नहीं है।
अभयारण्यों का सोच हालाँकि बहुत पुराना नहीं है, लेकिन अगर कार्बेट नेशनल पार्क की बात करें तो इसे पिचहत्तर साल से ज्यादा हो गये हैं। 1936 में हेली नेशनल पार्क के रूप में इसकी स्थापना हो गई थी। मगर दो-तीन दशक पहले तक वहाँ पर्यटन का ऐसा दबाव नहीं था। पार्क के कोर जोन में मौजूद डाक बंगलों में ही सैलानी जाया करते थे। इन दो दशकों में कॉर्बेट पार्क के धनगढ़ी गेट के बाहर ढिकुली गाँव तो अलका पुरी बन गया है। वहाँ बने दर्जनों रिजॉर्ट अपनी भव्यता में नैनीताल-मसूरी के बड़े-बड़े होटलों को भी मात देते हैं। इनमें शायद ही कोई रिजॉर्ट इस क्षेत्र के किसी स्थायी निवासी का होगा। बल्कि आसपास के गाँवों के लोगों को तो कॉर्बेट पार्क के विस्तार की कीमत अपनी सैकड़ों साल पुरानी बसासतें छोड़ने के रूप में चुकानी पड़ रही हैं। हर साल लाखों पर्यटक ढिकुली तथा अन्य स्थानों पर स्थित रिजॉर्ट्स में आते हैं। इन पर्यटकों में न तो कोई संस्कार होते हैं और न वन्य जीवन के प्रति कोई सम्मान। होता है सिर्फ अपनी अपार दौलत का घमंड। वे ऐसा सब कुछ करते हैं, जिससे वन्य जीवन बर्बाद हो। निषिद्ध स्थानों में घुसपैठ करते हैं, चटख रंग के कपड़े पहनते हैं और डट कर शोरगुल करते हैं। यहाँ तक कि पार्क के बाहर के रिजॉर्ट्स में डीजे तक बजा करता है। यही कहानी देश भर में सर्वत्र बिखरे टाइगर रिजर्वों की होगी। ऐसी स्थिति में यदि कोई प्रकृतिप्रेमी अदालत तक गया और अदालत ने ऐसा आदेश दे दिया तो उसमें आश्चर्य क्या ?
पर्यटन को लेकर भेडि़याधँसान की यह प्रवृत्ति हर जगह दिखाई देती है। पुराने पर्यटक स्थल अब रहने लायक नहीं रह गये हैं। नैनीताल गर्मियों में नर्क हो जाता है। 1996 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा व्यावसायिक निर्माण पर रोक लगा दिये जाने के बावजूद यहाँ होटलों का बनना रुका नहीं है। इस निर्बाध बढ़ते पर्यटन का दबाव यहाँ की झील को झेलना पड़ रहा है। कॉर्बेट में बढ़ता पर्यटन बाघों पर भारी पड़ रहा है तो नैनीताल में यहाँ की झील पर।
लेकिन इस प्रवृत्ति पर रोक लगाने की न तो उत्तराखंड सरकार की नीयत है और न उसकी ऐसी क्षमता है। उसका स्वयं का सोच ही अपने आप में विनाशकारी है, जिसे नन्दा राजजात के रूप में देखा जा सकता है। पच्चीस साल पहले सम्पन्न हुई नन्दा राजजात में बमुश्किल कुछ सौ स्थानीय लोगों की भागीदारी हुई होगी। वर्ष 2000 में हुई राजजात में सरकारी प्रचार के चलते हजारों लोग पहुँच गये। और अब तो उत्तराखंड सरकार ने राजजात को ‘दूसरा कुम्भ’ घोषित कर दिया है। अब लाखों लोग अगली राजजात में पहुँचेंगे। इस भयावह भीड़ से उस दुर्गम क्षेत्र की ऊँचाइयों में सालों में पनपने वाली वनस्पतियों और वन्य जीवन को कितना नुकसान होगा, क्या इसकी ओर हमारे राजनेताओं और नीति नियन्ताओं का ध्यान गया है ? राजजात को यदि एक पुरानी धार्मिक-सांस्कृतिक परम्परा से बाहर पर्यटन के रूप में चलाना भी था तो क्या उसके लिये कैलास मानसरोवर यात्रा की तर्ज पर नियंत्रित संख्या में लोगों को भेजने का तरीका नहीं सोचा जाना चाहिये था ?
पर्यटन को लेकर जब तक बहुत गंभीरता से नहीं सोचा जायेगा, किसी स्थान विशेष में पर्यटन को किस सीमा तक जाने देना है और कब रोक देना है, ऐसी समझ नहीं बनी तो इस तरह के खतरे आते रहेंगे, जैसा आज कॉर्बेट पार्क पर निर्भर हजारों लोगों के सामने रोजी-रोटी की समस्या के रूप में आ रहा है।
I personally endorse your views and the uttarakhand govt. should act responsibly while handling the affairs of shri nanda rajjat yatra scheduled in 2013. The govt. must purposely assess the ecological, environmental and religious issues with innermost sincerity. The purpose and success of this religious procession truly lies in understanding the culture and deep-rooted beliefs of the people living in this part of great Himalayas who have been guardians and witness of this yatra for the centuries.