उत्तराखंड में एक बार फिर अराजकता की स्थिति है। विधानसभा का सत्र ही नहीं चल पा रहा है। हमारे विधायक समझ रहे होंगे कि जब संसद के उच्च सदन, राज्य सभा में ‘महिला आक्षरण विधेयक’ को लेकर तमाम पार्टियों के प्रतिनिधि शर्मनाक हरकतें कर रहे थे तो उन्हें भला क्यों पीछे रहना चाहिये। विधायिका में घपले करते रहना अब हमारे जन प्रतिनिधियों का स्थायी धर्म हो गया है। क्योंकि ऐसे लोग कानून निर्माता बनने जाते हैं, जिन्हें कानून-वानून से कोई मतलब ही नहीं होता। पढ़ने-लिखने, बात-बहस से जिनका कोई वास्ता नहीं होता। सच कहा जाये तो उस तरह की क्षमता ही नहीं होती। सिर्फ एक ही ध्येय होता है कि अपने कार्यकाल में कैसे अधिक से अधिक पैसे बटोर लिये जायें ताकि अपना और अपनी भावी पीढ़ियों का भी खर्च चले और अगले चुनाव के लिये पर्याप्त बच भी जाये। संसद में शायद अभी कुछ बचा हो, विधान सभाओं में तो विधायक अब प्रस्तावित कानूनों का मसौदा भी शायद ही पढ़ते हों। उत्तराखंड की विधानसभा तो इन सबमें सबसे बढ़ कर दिखाई देती है, जहाँ पिछले आठ वर्ष में उ.प्र. के दर्जनों कानून छिटपुट बदलाव के साथ पारित कर दिये गये, उन्हें उत्तराखंड की जरूरतों के अनुसार ठीक करने की जरूरत ही नहीं समझी गई। क्योंकि यदि इन कानूनों पर सही तरीके से बहस की जाती तो उसके लिये कई रातों तक जग कर पढ़ना पड़ता और फिर हफ्तों तक विधानसभा में बहस करनी पड़ती। जबकि इन विधायकों का मुख्य कार्य ठेके लेना, गांव स्तर तक फैले अपने कार्यकर्ताओं तक ठेके दिलवाना और दलाली खाना है। प्रधानमंत्री नरसिंहाराव के जमाने से सांसद निधि और विधायक निधि के रूप में इस ठेकेदारी को वैधानिक रूप भी दे दिया गया है। आज से ठीक 100 साल पहले जब महात्मा गांघी ने अपनी पुस्तक ‘हिन्द स्वराज’ में ‘पार्लियामेंट’ को ‘बाँझ’ और ‘बेसवा’ जैसे कठोर शब्दों से परिभाषित किया था, तो उन्हें आजाद भारत के ये बेशर्म नुमाइन्दे साफ-साफ दिखाई दे रहे होंगे, जिनकी प्रतिबद्धता कभी भी अपने मतदाता के प्रति नहीं होती।

























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