सरकार की नजरों में महत्वाकांक्षी कही जा रही ‘भारत साक्षर परियोजना’ की संभावनाओं का आकलन करने से पहले जरूरी है बीते दो दशक के इतिहास को समझा जाये। भारत सरकार की इमदाद से उत्तर प्रदेश के जमाने में इस पर्वतीय भूभाग में भी करोड़ों की लागत में संपूर्ण साक्षरता अभियान संचालित किया गया। महज अल्मोड़ा जिले में इस अभियान के अन्तर्गत 1.67 करोड़ रुपये फूके गये। तत्कालीन आठ पर्वतीय जिलों में लगभग 15 करोड़ रुपये यह अभियान डकार गया। इसके बाद भी निरक्षर साक्षर न हो सके। फिर सरकार लेकर आई उत्तर साक्षरता कार्यक्रम। यहाँ भी खर्च करोड़ों में और निरक्षर बचे रहे। अब इस ‘साक्षर भारत कार्यक्रम’ के लिए 75 प्रतिशत की इमदाद भारत सरकार दे रही है।
25 प्रतिशत खर्च उत्तराखंड वहन कर रहा है। सरकारी आँकड़ों ने बयाँ किया है कि राज्य के पाँच जिलों में महिला साक्षरता की दर पचास प्रतिशत से कम है और महिला साक्षरता वाले इन पांच जिलों, क्रमशः बागेश्वर, चंपावत, उधमसिंह नगर, टिहरी एवं हरिद्वार में 15 वर्ष से ऊपर की आयु का कोई निरक्षर न रहे। इसके लिए जल्द ही शुरू होने जा रही इस परियोजना के अंतर्गत मार्च 2012 तक 61 करोड़ 87 लाख रुपये की धनराशि बागेश्वर (1.83 करोड़), चंपावत (1.32 करोड़), उधमसिंह नगर (1.38 करोड़), टिहरी (4.58 करोड़) एवं हरिद्वार (1.46 करोड़), यानी कुल 10 करोड़ 58 लाख 81 हजार 7 सौ रूपये की प्रथम किस्त अवमुक्त हो चुकी है।
इतनी भारी भरकम धनराशि खर्च होने के बाद क्या इस बात की इस बार गारंटी होगी कि इन पाँच जिलों में अब कोई निरक्षर नहीं बचेगा। दूसरा सवाल कि क्या राज्य के शेष 8 जिलों में क्या कोई निरक्षर नहीं है ?
इन सवालों के आलोक में एक और जो महत्वपूर्ण सवाल उभर कर आ रहा है वह है कि इस छोटे से राज्य में, जहाँ पर लगभग हर पंचायत में न्यूनतम एक अदद प्राथमिक विद्यालय मौजूद हैं (अपवाद स्वरूप कई पंचायतों में दो से तीन विद्यालय भी हैं) के बावजूद निरक्षरों की इतनी बड़ी संख्या कहां से निकल आई ? इस महत्वपूर्ण सवाल का उत्तर तलाशे बिना इस तरह की योजनाओं का संचालन बेमानी साबित होगा। सरकार यदि वास्तव में शिक्षा, साक्षरता और स्वावलंबन की हिमायती है तो वह अपने औपचारिक शिक्षा तंत्र को सुदृढ़ करे। स्कूलों में शिक्षकों की यथा आवश्यकता तैनाती करे। स्कूलों में पठन-पाठन का रुचिकर माहौल तैयार करे। इस बात पर भी नजर दौड़ाए कि राज्य के हर पंचायत तक शिक्षण संस्थानों की व्यापक उपलब्धता के बाद भी राज्य में निरक्षर कैसे रह जा रहे हैं। या फिर सरकारी संस्थानों में मानक से कम छात्र संख्या कैसे हो रही है और इन संस्थानों के इर्द-गिर्द खुल रहे पब्लिक स्कूल क्यों इतनी भारी तादाद में पनप रहे हैं। इन सवालों की पड़ताल यदि सरकार नहीं करती है तो इसमें उसके निहित स्वार्थ हो सकते हैं। और यदि पड़ताल करती है तो इससे सफलता का मार्ग प्रशस्त हो सकता है।






















it seems a fashion to criticize the govt policy by certain people just to be in the news. it would be better if these people before criticizing the govt on every issue ,find out the reality. now this case of money being wasted on education. one must first find out what the money allotted is for. is it for pay/books/school building/furniture. in case the amount shown for each district is for all that i have mentioned, then in my opinion it is 5% of the requirement.
these people who criticize do not even know how much it costs to run a school properly. the govt has to adhere to certain laid down guide lines and any deviation from the guidelines invites audit and other problems.
criticism is good and healthy but to criticize for the sake of it is unhealthy and there is always a personnel angle to it.