उत्तराखण्ड के लगभग सभी जिलों में घूमी दस दिनी ‘जन यात्रा’ से यह बात स्पष्ट होकर उभरी कि पहले से उत्तराखण्ड आन्दोलन का गम्भीर हिस्सा रहे लोग यदि संघर्ष और निर्माण का समयबद्ध कार्यक्रम बना कर उस पर अमल कर सकें तो उत्तराखण्ड आन्दोलन के पीछे छूट गये लक्ष्यों को हासिल किया जा सकता है। आजादी बचाओ आन्दोलन, लोकायत और जन आन्दोलनों की पहल पर बनी ‘जन ससंद’ के उत्तराखण्ड के जन सगंठनों के साथ जुड़ाव से इस कार्यक्रम को चलाने मदद मिल सकती है।
5 जून को आल्मोड़ा से शुरू होकर चम्पावत, लोहाघाट, पिथौरागढ़ मुनस्यारी, बागेश्वर, गरुड़, बैजनाथ, गुप्तकाशी, फाटा, अगस्त्यमुनि, बसुकेदार, रुद्रप्रयाग, श्रीनगर, टिहरी, घनसाली, चमियाला, उत्तरकाशी, ऋषिकेश होते हुए देहरादून में 15 जून को समाप्त हुई इस जनयात्रा के दौरान प्रतिबद्ध समाजकर्मियों, पत्रकारों, बुद्धिजीवियों और आन्दोलनकारी समूहों की तरफ से जो आत्मीयता मिली, उससे यह सिद्ध हुआ कि जनयात्रा के नेताओं पर अभी भी इस प्रदेश के सक्रिय व्यक्तियों का विश्वास कायम है। ‘जन यात्रा’ की पूर्व तैयारी तो नाम मात्र की थी। बस कुछ साथियों को फोन से सूचना दे दी गयी थी। मगर यात्रा के दौरान तत्काल करने पर भी प्रेस कान्फ्रेंस, नुक्कड़ सभा, सार्वजनिक सभा, अनौपचारिक बातचीत, रुकने और भोजन आदि की व्यवस्था जिस सुचारु ढंग से होती गयी, उससे यात्रियों का हौसला बढ़ा। अधिकांश स्थानों में पत्रकारों में अधिकतर उत्तराखण्ड आन्दोलन के बाद की पीढ़ी के युवा थे, पर वे भी यात्रियों के बारे में कुछ न कुछ जानते थे और बातचीत करके कुछ अधिक भी जानना चाहते थे। स्थानीय स्तर पर अखबारों ने जनयात्रा को खासा महत्व दिया।
आन्दोलन की धारा की गहराई से पहला साक्षात्कार हुआ चम्पावत के पुल हिण्डोला में, जहाँ महिला समाख्या की सभा में 100 महिलायें 4 घण्टे से इन्तजार कर रही थीं। जब जनयात्रा वहाँ पहुँची तो भारी बारिश हो रही थी पर सभी महिलाएँ कक्ष में बैठी गीत गा रही थीं। हमने अपने साथी मनीष सुन्दरियाल से निवेदन किया कि बैठक शुरू करने के लिए गीत गायें। उन्होंने गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’ का गीत गाना शुरू किया। पहली ही लाइन से गीत महिलाओं ने पकड़ लिया और फिर सारी महिलाओं ने ढोलक की थाप पर जिस जोश के साथ वह गीत गाया उसने मेरे सारे शरीर की खाल के बाल खड़े कर दिये। ‘गिर्दा’ आम जन-जीवन में कितने घुल चुके हैं, यह अनुभव उस बरसात भरी शाम को पुल हिण्डोला में हुआ। इन महिलाओं की प्रमुख समस्या पानी की थी और उस समस्या से निपटने के लिये वे कुछ भी करने को तैयार थीं।
मुनस्यारी का महिलाओं का आन्दोलन संघर्ष और निर्माण की अनूठी दास्तान है। अपनी शैशवावस्था में चल रहा यह आन्दोलन उत्तराखण्ड की तकदीर बदलने की क्षमता रखता है। उत्तराखण्ड महिला मंच की संयोजक, प्रतिबद्ध सामाजिक कार्यकर्ता मलिका विर्दी और उनके पति राम ने मुनस्यारी के आसपास 85 गाँवों में महिला शक्ति के जागरण का अनूठा प्रयोग किया है। मुनस्यारी में नुक्कड़ सभा करके शाम को टीम मलिका बहन के यहा पहुँची। मलिका थोड़ी देर पहले ही पिथौरागढ़ से लौटी थीं कुछ महिलाओं की जमानत करा कर। अगले दिन फिर सुबह उन्हें कुछ अन्य महिलाओं की जमानत के लिये पिथौरागढ़ भागना था। मुनस्यारी से पिथौरागढ़ अपनी गाड़ी से आने-जाने में ही 8 घण्टे लगते हैं। मलिका के साथ बातचीत का बहुत कम समय मिला। लेकिन इसकी क्षतिपूर्ति कर दी सरमौली जैंती गाँव की उन महिलाओं के साथ जनयात्रियों की बातचीत ने जिनके घर रात को दो-दो साथियों के रुकने और खाने की व्यवस्था थी। गाँवों में इतनी सुन्दर व्यवस्था, वह भी पहाड़ के दूरस्थ बर्फीले इलाके में, मैने अपनी जिन्दगी में पहली बार देखी। पता चला कि यह पूरा गाँव ‘इको-टूरिज्म’ का केन्द्र है। यहाँ प्रत्येक घर में ‘होम स्टे’ के नाम से एक बहुत ही घरेलू किस्म का पर्यटन कार्यक्रम चल रहा है। लोग बाहर से आते हैं, घरों में रुकते है, घर की रसोई का बना खाना खाते है, घर के सदस्यों से बातचीत करते है, किसानी खेती के गुर सीखते है, घर के नौजवान उन्हें पर्वतारोहण कराते हैं। 500 रुपये प्रतिदिन के खर्चे पर यह सारा उपक्रम चलता है। महिलाएँ पर्यटकों का रजिस्टर और हिसाब-किताब रखती हैं। रजिस्टर पर पर्यटकों की प्रतिक्रियाएँ दर्ज हैं। इस गाँव के लगभग सभी घर इस इको-टूरिज्म से जुड़े हैं। मलिका और उनके साथी महिलाओं को प्रशिक्षित करते हैं। इको-टूरिज्म की जानकारी इन्टरनेट पर देश विदेश भेजते है। घर बैठे अच्छी खासी आमदनी और महिलाओं में जीवन जीने की ललक। इससे भी बड़ी बात है कि ये महिलायें मिलकर शराबखोरी के खिलाफ आन्दोलन चलाती हैं। मुनस्यारी के आसपास विशाल निजी पन बिजली परियोजनाएँ आ रही है, खासकर गोरी नदी पर, जिनको इन साहसी महिलाओं ने आन्दोलन करके रुकवा दिया है। आखिर नदियाँ और पहाड़ उनका जीवन है, उन्हें वे कैसे उजड़ने दे सकती हैं ? इन परियोजनाओं के पक्ष में स्थानीय प्रभुत्वशाली लोग, सरकारी अफसर, नेता, ठेकेदार हैं पर उनकी नही चल रही। राम ने गहरा अध्ययन करके परियोजनाओं के फर्जीवाड़े को उजागर किया है। उनकी वीडियो फिल्म यात्रियों ने देखी और अपना ज्ञान बढ़ाया। सरमोली जैंती गाँव की महिलाओं के साथ जनयात्रियों की बैठक हुई। उनके अनुभव सुने गये और इस प्रयोग को उत्तराखण्ड के अन्य पर्यटक स्थलों पर कैसे लागू किया जा सकता है, इस पर विचार हुआ। जरूरत है कि इस प्रयोग को आगे और क्षेत्रों में विस्तार दिया जाये।
बागेश्वर में नन्दाबल्लभ भट्ट शहर के बाहर ही इन्तजार कर रहे थे। उनके साथ कचहरी रोड पर यात्रियों ने रैली निकाली और चौक पर सभा की। अगले दिन सबेरे बागेश्वर के टाउन हाल में बड़ी प्रेस कान्फ्रेंस हुई और उत्तराखण्ड के प्राकृतिक संसाधनों को बचाने के संघर्ष को तेज करने की चर्चा साथियों के साथ हुई।
गोपेश्वर आन्दोलनों का केन्द्र रह चुका है। चण्डीप्रसाद भट्ट जैसे समर्पित गांधीवादियों के साथ लोग लड़ाई लड़ चुके हैं। गैरसैंण को उत्तराखण्ड की स्थायी राजधानी बनाने के सवाल पर गोपेश्वर के लोग भावनात्मक रूप से गहरे तक जुड़े हुए हैं और आज भी वे इस उद्देश्य के लिये कोई भी काम करने को तैयार हैं। यात्रा के नेता और उत्तराखण्ड लोक वाहिनी के अध्यक्ष डॉ. शमशेर सिंह बिष्ट से वे आगे ठोस कार्यक्रम की रूप रेखा जानना चाहते थे। डॉ. बिष्ट ने घोषित किया कि आगामी चुनाव में लोग उन्हीं प्रतिनिधियों को चुनें जो चुने जाने के बाद गैरसैंण में विधान सभा की सदस्यता की शपथ लेने की घोषणा कर वहीं बैठ कर विधायी कार्य करने का संकल्प ले। उन्होंने याद दिलाया कि चमोली जिले के लोगों ने उत्तराखण्ड आन्दोलन में सबसे ज्यादा कुर्बानियाँ दी थीं और सबसे ज्यादा दमन सहा था। उनका बलिदान बेकार नही जायेगा और हर हाल में उत्तराखण्ड के सपनों को साकार करने के लिये संघर्ष किया जायेगा। युवा बेरोजगार संगठन के नेता मनीष सुन्दरियाल ने बताया कि 25 जुलाई 1992 को उत्तराखण्ड के आन्दोलनकारियों ने वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली के नाम से चन्द्रनगर गैरसैण में राजधानी का शिलान्यास कर दिया था, उनका यह संकल्प आज भी मौजूद है।
11 जून की रात्रि को जनयात्री ऐतिहासिक स्थल बसुकेदार में आशीष सेमवाल की शादी के समारोह में पहुँचे। वहाँ पहले से ही केदारघाटी बचाओ संघर्ष समिति की जुझारू नेता सुशीला भण्डारी इन्तजार कर रही थीं। उनके वरिष्ठ सहयोगी एडवोकेट गंगाधर नौटियाल फाटा में ही यात्रियों को मिल गये थे। उन्होंने केदारघाटी में चल रही विनाशकारी पनबिजली परियोजनाओं के लिये बन रही सुरंगों से हो रही विनाशलीला दिखायी और यात्रियों के साथ रात में बसुकेदार में स्थानीय कार्यकर्ताओं की बैठक की। केदार घाटी दुनिया की सुन्दरतम घाटियों में एक है पर लेंको पॉवर और एल-टी की विशाल परियोजनाओं के चलते आज इसका अस्तित्व संकट में है। घाटी के बीचोंबीच बहती मंदाकिनी नदी पर फाटा से ब्योंग तक 9 किमी. लम्बी पहाड़ के अन्दर सुरंग लेंको कम्पनी तथा सिनहौटी भटवाड़ी में एल-टी द्वारा 12 किमी. लम्बी सुरंग बनायी जा रही है, जिससे इस नदी का अस्तित्व संकट में पड़ गया है। उत्तराखण्ड में बनने वाली 558 पन बिजली परियोजनाओं में से ये दो परियोजनायें नितान्त अवैध और गैर कानूनी ढगं से बनायी जा रही हैं। ग्राम सभाओं और वन पंचायतों की बिना अनुमति के एल-टी कम्पनी ने हजारों वृक्ष काटकर सड़कें बना दी हैं और सुरंगें बिछा दी हैं तथा बिना किसानों की अनुमति के उनकी जमीनों पर कब्जा कर लिया है। पुलिस की मदद से कम्पनियों के गुंडे गाँववासियों पर दमन चक्र चला रहे हैं। आतंक का वातावरण बना रहे है। महिलाओं को भी नहीं बख्शा गया है। इन परियोजनाओं के खिलाफ स्थानीय लोगों का जुझारू संघर्ष चल रहा है। अभी सुशीला भण्डारी और जगमोहन 65 दिन की जेल काट कर बाहर आये हैं। आजाद हिन्दुस्तान में ऐसा शायद पहली बार हुआ कि कोई महिला बिना किसी आरोप के 65 दिन जेल में रही। सुशीला ने जमानत लेने से इन्कार कर दिया था। उन्होंने जज महोदय से कहा था कि जब उन्होंने कोई अपराध किया ही नहीं तो जमानत लेने का सवाल ही नहीं उठता। और उनका साहस देखिये कि उन्हें जब पता चला कि उनके पति कम्पनी के साथ मिल गये हैं तो उन्होंने जेल में उनसे मुलाकात करने से भी मना कर दिया।
ऐसे साहस और समर्पण को जनयात्रियों ने प्रणाम किया और अरखण्ड गाँव में चल रहे धरनास्थल पर पहुँच कर जन संसद के राष्ट्रीय संयोजक प्रो. बनवारी लाल शर्मा ने घोषणा की कि केदारघाटी को बचाने का यह आन्दोलन अब राष्ट्रीय आन्दोलन है। अरखण्ड गाँव जाने के रास्ते कम्पनी के गुण्डों और पुलिस ने बन्द कर रखे हैं। सुशीला भण्डारी के वहाँ जाने पर रोक है। पर जनयात्री वहाँ पहुँचे और आन्दोलन को अपना नैतिक समर्थन दिया। अगले कुछ महीनों में यहाँ सर्वे करने के लिये आई.आई.टी. कानपुर के अध्यापकों और छात्रों की टीम, टाटा समाज विज्ञान संस्थान मुम्बई और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय दिल्ली के युवा शोधकर्मियों की टीमें भेजी जायेंगी। यहाँ हो रहे मानवाधिकारों के उल्लंघन की जाँच करने के लिये पीयूसीएल की टीम भी आयेगी और अक्टूबर में देश भर के समाजकर्मी और आन्दोलनकारी साथियों के साथ उत्तराखण्ड के आन्दोलनकारी और स्थानीय लोग मिलकर परियोजनाओं के विरोध में बड़ा कार्यक्रम करेंगे। गंगाधर नौटियाल जी, सुशीला भण्डारी जी, चन्दन सिंह जी और अन्य साथियों ने देशभर के जन आन्दोलनों के साथ जुड़कर आगे की लड़ाई का निश्चय किया। यह आन्दोलन आगे बढ़ता है और परियोजनाओं का निर्माण रुकता है तो उत्तराखण्ड में जल, जंगल, जमीन को बचाने की लड़ाई परवान चढ़ेगी। इन कार्यक्रमों की घोषणा अगले दिन रुद्रप्रयाग में हुई प्रेस कान्फ्रेंस में जनयात्रियों ने की। स्थानीय कार्यकर्ताओं ने जनयात्रियों के प्रति जो विश्वास प्रदर्शित किया उससे एक बार फिर यह सिद्ध हुआ कि उत्तराखण्डी लोग बड़े आन्दोलन के लिये तैयार है।
……जारी है