मनोज त्यागी
12 जून की शाम को यात्री रुद्रप्रयाग से श्रीनगर पहुँचे और गोला बाजार चौराहे पर जन सभा की। 13 की सुबह श्रीनगर के रामायण धर्मशाला में ही सारे स्थानीय पत्रकार एकत्र हो गये और यात्रियों की बाते सुनीं, अखबारों में काफी स्थान मिला। यहाँ से नई टिहरी जाना था और बीच में वह पुरानी टिहरी भी पड़ती है जो अब टिहरी बाँध की झील में समा गयी है। टिहरी बाँध के खिलाफ चले लम्बे संघर्ष में सभी यात्री शामिल रहे थे। टिहरी की यादें अन्तर्मन से निकलकर बाहर आ गयीं। बाँध के कारण ऐतिहासिक टिहरी शहर, सैकड़ों गाँव जल प्लावित हो गये। भागीरथी एक मृत नदी के रूप में बाँध से बाहर निकलती दिखायी दी। देखकर मन कसैला हो गया, पर साथ ही यह संकल्प दृढ़ हो गया कि ऐसी दुर्दशा अन्य नदियों की नही होने दी जायेगी।
नई टिहरी में चेतना आन्दोलन के त्रेपन सिंह चौहान और पत्रकार रमेश कुड़ियाल मौजूद थे। शाम को टिहरी के चौक पर सार्वजनिक सभा हुई। अगले दिन सवेरे पार्क में हुई प्रेस कान्फ्रेंस देखने लायक थी। सभी अखबारों और चैनलों के प्रतिनिधि मौजूद थे। बैठक में धूम सिह नेगी, विजय जड़धारी जैसे पुराने संघर्षशील साथियों के साथ बीना सजवाण जैसे जन प्रतिनिधि भी मौजूद थे। सभी ने उत्तराखण्ड में फिर से आन्दोलन खड़ा करने का इरादा जाहिर किया। नई टिहरी एक अलग किस्म का शहर है। यहाँ पहाड़ की जीवन्तता अनुपस्थित है। विस्थापितों के इस शहर में संस्कृति जड़ से उखड़ी हुई नजर आती है। नई टिहरी की बसाहट स्तरीकृत है, उच्च तबके के लोग ऊँचे हिस्सों में, मध्य तबके के लोग बीच के हिस्सों में और निम्न तबके के लोग नीचे के हिस्सों में रहते हैं। पहाड़ों में पर्यटन के नाम पर कई तरह का प्रदूषण आया है, पर्यावरणीय, आर्थिक और सांस्कृतिक। वह सब नई टिहरी में स्पष्ट दिखायी पड़ता है। टिहरी बाँध की झील महज कुछ ही दूरी पर नीचे की तरफ है, पर नई टिहरी पीने की पानी की किल्लत से जूझ रहा है।
नई टिहरी से त्रेपन सिंह भी यात्रा में जुड़ गये। वे जीवट के व्यक्ति हैं। कैंसर से पीड़ित इस नौजवान ने भिलंगना घाटी में जल, जंगल और जमीन की लड़ाइयाँ सफलतापूर्वक लड़ी हैं। फलिंडा जल विद्युत परियोजना को लेकर अभी भी लड़ रहे हैं। चेतना आन्दोलन का विस्तार उन्होंने देहरादून तक कर दिया है। वहाँ दिहाड़ी मजदूरों का संगठन खड़ा कर रहे हैं। कई नौजवान इस काम में शामिल हैं। भिलंगना घाटी में स्थानीय लोगों की प्रोड्यूसर कम्पनी बनाकर पनबिजली घर का निर्माण करने और गाँव के लोगों द्वारा उसे स्वयं चलाने का प्रयोग भी करने का इरादा चेतना आन्दोलन के साथियों का है। प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय समुदायों की मिल्कियत हो और वे अपने उपयोग में उन्हें ला सकें, यह विचार प्रोडयूसर कम्पनी के पीछे है और त्रेपन तथा उनके साथी इसमें लगे तो उत्तराखण्ड में वैकल्पिक विकास के मॉडल को खड़ा करने की ठोस शुरुआत हो जायेगी। त्रेपन सिंह चौहान के साथ जन यात्रा चमियाला पहुची और वहाँ 3 घण्टे पहले से ही जमा हो चुके पुरुष-महिला साथियों के साथ बैठक हुई। पहाड़ में विस्थापन का दर्द झेल रहे स्थानीय समुदाय की जीती जागती कहानी सभा में मौजूद जोशी जी ने सुनाई। पर फिलहाल जनयात्री उन्हें दिलासा ही दे सकते थे।
14 जून की रात को उत्तरकाशी में भागीरथी के किनारे हिमालयी पर्यावरणीय शिक्षा संस्थान मातली के सुरेश भाई के आश्रम में पहुँचे। सुरेश भाई सर्वोदय से जुड़े है, नदी बचाओ आन्दोलन में सक्रिय हैं और हिमालयी पर्यावरणीय शिक्षा संस्थान के माध्यम से पहाड़ों के प्राकृतिक संसाधनों के अध्ययन और शोध का काम कर रहे हैं। वे एक एन.जी.ओ. चलाते हैं पर आन्दोलनकारियों से उनके घनिष्ठ रिश्ते हैं। लेकिन उत्तरकाशी में उत्तराखंड महिला मंच की पुष्पा चौहान जबर्दस्त ऊर्जावान लगीं। यहाँ पूर्व तैयारी तो न के बराबर थी पर पुष्पा चौहान का हौसला और जोश देखकर सारी कमी पूरी हो गयी। सबेरे 10 बजे उत्तरकाशी के निस्तब्ध पड़े चौक बाजार में बिना श्रोताओं के हम कुछ यात्रियों के साथ जब उन्होंने चैलेंजर माइक पकड़ कर बोलना शुरू किया तो समझ में आ गया कि यदि यह महिला जुट जाये तो अकेले अपने दम पर भी आन्दोलन खड़ा कर सकती है।
उत्तरकाशी से देहरादून का रास्ता लम्बा था। 6 घण्टे की यात्रा करके जब देहरादून की अग्रवाल धर्मशाला में पहुँचे तो 7 बज रहे थे। कमला पंत, राजीव लोचन साह, कवि वीरेन डंगवाल और पी.यू.सी.एल. उत्तराखंड के अध्यक्ष कालिका प्रसाद काला आदि हम जनयात्रियों, प्रो. बनवारी लाल शर्मा, डॉ. शमशेर सिंह बिष्ट, पूरन चन्द तिवारी, डॉ. दयाकृष्ण काण्डपाल, बसन्त खनी, रामसिंह, मनीष सुन्दरियाल, उत्तराखण्ड सांस्कृतिक मंच के संयोजक नारायण सिंह रावत के अनुभव सुनने के लिये इन्तजार कर रहे थे। 2 घण्टे बैठक चली। केदारघाटी बचाओ आन्दोलन को राष्ट्रीय मोर्चा बनाने और अक्टूबर में देश भर के साथियों के साथ बड़ा जन संसद का सम्मेलन करके उत्तराखण्ड आन्दोलन को नये सिरे से परवान चढ़ाने का फैसला सभी साथियों ने लिया। बैठक में जो निर्णय हुए उन्हें इस क्रम में रखा जा सकता है-
- उत्तराखण्ड में जगह-जगह चल रहे स्थानीय आन्दोलनों को जोड़कर एक प्रदेशव्यापी आन्दोलन खड़ा किया जाय। इसके लिये प्रत्येक आन्दोलन मोर्चा से एक प्रतिनिधि तथा अन्य प्रमुख सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों की एक संचालन समिति गठित की गयी। इस समिति की संयोजक कमला पंत को चुना गया और देहरादून में उनका कार्यालय इस मोर्चे का कार्यालय होगा।
- पहले चरण में कार्यालय के खर्चा के लिये दस शहरों से 100-100 रुपये की सहयागे राशि तय हुई। हर शहर से इस काम के लिये एक प्रतिनिधि भी तय हुआ।
- उत्तराखण्ड में कृषि भूमि नही बिकेगी, इस आशय का प्रस्ताव ग्राम पंचायतों और जिला पंचायतों से पारित करने का अभियान शुरू होगा। इन प्रस्तावों के आधार पर विधान सभा में एक बिल पेश किया जायेगा।
- जहाँ-जहाँ संघर्ष के मोर्चे चल रहे है वहाँ कार्यकर्ताओं (देश के भी और प्रदेश के भी) की टीमें समर्थन देने जाती रहेंगी।
- अक्टूबर के अन्त में जन संसद का राष्ट्रीय अधिवेशन केदारघाटी में आयोजित होगा।
जन संसद का पहला अधिवेशन अगस्त 2010 में अल्मोड़ा में हुआ था और वहाँ उत्तराखण्ड का मुद्दा प्रमुखता से चर्चा में था। उत्तराखण्ड की जमीनों को बचाने के लिये तथा निजी पन बिजली परियोजनाओं के शिंकजे से नदियों को निकालने के आन्दोलन की रूप-रेखा वहाँ बनी थी। ‘जन यात्रा’ पहला कदम था। स्थानीय साथियों की अन्यत्र व्यवस्तताओं के चलते ‘जन यात्रा’ के आयोजन में देरी हुई। यात्रा के दौरान भी ऐसा महसूस हुआ कि स्थानीय साथी भले ही खुलकर न कह पा रहे हों पर वे कहना चाहते हैं कि देर मत करिये। उनकी भावनाओं का सम्मान करने की जरूरत होगी। ‘जन यात्रा’ से पहल हो गयी है। तमाम संकटों के बावजूद आन्दोलनकारी समूह इस पहल को आगे बढ़ाने के लिये प्रतिबद्ध हैं, देहरादून बैठक में यह अहसास हुआ।
‘जन यात्रा’ में उत्तराखण्ड लोक वाहिनी के साथी, आजादी बचाओ आन्दोलन से जुड़ा मैं, पूना की संस्था लोकायत के जीतेन्द्र तथा वरद पूरी यात्रा के दौरान साथ थे। 11 जून से जन संसद के राष्ट्रीय संयोजक प्रो0 बनवारी लाल शर्मा भी शामिल हो गये और फिर समाप्ति तक साथ रहे।